Saturday, June 30, 2012
अब दृष्टि कुछ कमज़ोर हो चली है; सूक्ष्म अक्षर बिना चश्मे का नहीं दीखते /
लगातार कंप्यूटर का साथ एक बोझ की तरह मन मस्तिष्क में थकान की सतह के ऊपर
सतह बनाता जा रहा है / कुर्सियों पर देर तक बैठा आलस्य कमर के इर्द गिर्द
इकठ्ठा होने लगा है / कभी कुछ सीढियां चढ़नी पड़ जाए तो सांस फूल जाती है;
शारीरिक परिश्रम करना पड़े तो जीभ बाहर को निकल आती है / घर पहुँचते ही पहले
बिस्तर दिखता है ; कभी कभी टाँगे पसार कर या अधलेटा होकर टेलीविज़न के
स्पोर्ट्स चैनल कुछ दूर तक साथ निभाते हैं; कुछ याद दिलाते हैं / चंद
रोटियों और आयुर्वेदिक औषधियों के पश्चात् रात आती है और अचानक ही चली जाती
है / ये कभी इतनी छोटी न हुआ करती थी / सुबह के तौलिये में शीशा दिखता है;
मैं अपने 'मैं' को पहचानने की कोशिश करता हूँ / अब तो उसकी याद भी धूमिल
हो चली है ; कितना दूर निकल आये हैं, अपनों से दूर, अपने से दूर / क्या ये
ज़रूरी था ? क्या ये ज़रूरी है ?
Tuesday, June 26, 2012
Wednesday, June 20, 2012
सब खामोश हैं...
बरगद के नीचे का बोलता चौपाल,
और शोखियों पर डोलती चहचहाहट,
रुक रुक कर बजती घंटियाँ,
और स्कूल से भागने की हडबडाहट,
सब खामोश हैं...
रात गुज़रती ट्रेन की सीटी,
पुल के नीचे पानी की कलकलाहट,
मंदिर के मंजीरों की सरगम,
सरकती उन जुगनुओं की जगमगाहट,
सब खामोश हैं....
सड़कों पर भागते इंजन,
मदिरालय में कांच की खनखनाहट,
मेघों का उफनता गर्जन,
गली में रेंगते कुत्तों की गुर्राहट,
सब खामोश हैं...
विचरता मन, संवरता दर्पण,
वह बहकती रेशमी सी फुसफुसाहट,
ठहरे हुए यौवन का समर्पण,
दिल की चौखट पर क़दमों की आहट,
सब खामोश है...
कभी कभी कुछ बना हुआ टूट जाता है,
भावों का हाथ फिसल कर छूट जाता है,
तब ह्रदय अपने ही आगोश में गुज़र जाता है,
और रोज़ का शोर भी खामोश नज़र आता है,
पर ये महज़ ख़ामोशी है, गूंगापन नहीं है,
समय कुछ अकेला है, सूनापन नहीं है,
बेतहाशा चीखें केवल नींद से जगाएँगी,
पर ये खामोशियाँ ही अँधेरे दूर भगाएँगी;
और शोखियों पर डोलती चहचहाहट,
रुक रुक कर बजती घंटियाँ,
और स्कूल से भागने की हडबडाहट,
सब खामोश हैं...
रात गुज़रती ट्रेन की सीटी,
पुल के नीचे पानी की कलकलाहट,
मंदिर के मंजीरों की सरगम,
सरकती उन जुगनुओं की जगमगाहट,
सब खामोश हैं....
सड़कों पर भागते इंजन,
मदिरालय में कांच की खनखनाहट,
मेघों का उफनता गर्जन,
गली में रेंगते कुत्तों की गुर्राहट,
सब खामोश हैं...
विचरता मन, संवरता दर्पण,
वह बहकती रेशमी सी फुसफुसाहट,
ठहरे हुए यौवन का समर्पण,
दिल की चौखट पर क़दमों की आहट,
सब खामोश है...
कभी कभी कुछ बना हुआ टूट जाता है,
भावों का हाथ फिसल कर छूट जाता है,
तब ह्रदय अपने ही आगोश में गुज़र जाता है,
और रोज़ का शोर भी खामोश नज़र आता है,
पर ये महज़ ख़ामोशी है, गूंगापन नहीं है,
समय कुछ अकेला है, सूनापन नहीं है,
बेतहाशा चीखें केवल नींद से जगाएँगी,
पर ये खामोशियाँ ही अँधेरे दूर भगाएँगी;
Monday, June 11, 2012
Wednesday, June 6, 2012
हर लफ्ज़ तेरा बयां है
हर सफे पे तेरा नाम हैं
तू ही आसमां, तू ज़मीन है
इक तू ही मेरा यकीन है
इक तू ही तो आगाज़ था
इक तू ही बस अंजाम है
by manjula saxena
आसमां भी तू, ज़मीं भी तू, यकीं भी तू,
दिल और होठों की मिश्रित हंसी भी तू,
आगाज़ भी तू, अंदाज़ भी तू, अंजाम भी तू,
तू ही लफ्ज़, तू ही पहचान और नाम भी तू,
जब हर लम्हा, हर एहसास तुझसे ही आया है,
तो ये कौन है जिसने गलत सही बनाया है !!
-neeraj
Saturday, June 2, 2012
बस संवरना चाहता है
किसी के पूछने पर कि कैसे हो,
कह देते हो कि अच्छा हूँ;
पर कभी कभी,
कुछ चुनिन्दा लोगों के साथ,
यह उत्तर,
खुद को ही अधूरा लगता है,
कुछ कहते कहते गला अटक जाता है,
कहाँ पूरा लगता है;
असमंजस की स्थिति होती है,
कहूँ न कहूँ !
सवाल रहता है,
फिर समय निकल जाता है,
बस मलाल रहता है ;
कभी बड़े ओहदे वाले,
फटकार लगा कर ही कोसते हैं,
गुस्सा तो बहुत आता है,
पर हम पहले अंजाम सोचते है,
फिर चुपचाप ठहरते हैं,
वापस घर आते हैं,
और फिर किसी न किसी बहाने,
घरवालों पर बरसते हैं ;
कभी लोग तुलना करके,
हमें नीचा दिखाते हैं,
हम फिर भी शांत रहते हैं,
जैसे नहीं सुना, जताते हैं ;
पर हमारी इन चुप्पियों के पीछे,
एक निश्चित निवारण होता है,
व्यक्तिगत या व्यवसायिक,
या सामाजिक कारण होता है;
पर कभी कभी चुप्पियाँ,
इन सब से अलग होती हैं,
थोड़ा सा कह कर रुक जाते हैं,
पर इन्द्रियाँ सजग होती हैं,
जितना बाहर निकल पाता है,
उतने में ही बताना होता है,
जो अन्दर रह जाता है,
वह असल खज़ाना होता है;
ये कोई कमजोरी नहीं होती,
अभिव्यक्ति का,
एक और ज़रिया होता है,
जो दिखाई और सुनाई नहीं देता,
पर अन्दर जागता सोता है;
न निकलना चाहता है,
न ठहरना चाहता है,
कुछ अधबुने एहसासों में,
बस संवरना चाहता है;
कह देते हो कि अच्छा हूँ;
पर कभी कभी,
कुछ चुनिन्दा लोगों के साथ,
यह उत्तर,
खुद को ही अधूरा लगता है,
कुछ कहते कहते गला अटक जाता है,
कहाँ पूरा लगता है;
असमंजस की स्थिति होती है,
कहूँ न कहूँ !
सवाल रहता है,
फिर समय निकल जाता है,
बस मलाल रहता है ;
कभी बड़े ओहदे वाले,
फटकार लगा कर ही कोसते हैं,
गुस्सा तो बहुत आता है,
पर हम पहले अंजाम सोचते है,
फिर चुपचाप ठहरते हैं,
वापस घर आते हैं,
और फिर किसी न किसी बहाने,
घरवालों पर बरसते हैं ;
कभी लोग तुलना करके,
हमें नीचा दिखाते हैं,
हम फिर भी शांत रहते हैं,
जैसे नहीं सुना, जताते हैं ;
पर हमारी इन चुप्पियों के पीछे,
एक निश्चित निवारण होता है,
व्यक्तिगत या व्यवसायिक,
या सामाजिक कारण होता है;
पर कभी कभी चुप्पियाँ,
इन सब से अलग होती हैं,
थोड़ा सा कह कर रुक जाते हैं,
पर इन्द्रियाँ सजग होती हैं,
जितना बाहर निकल पाता है,
उतने में ही बताना होता है,
जो अन्दर रह जाता है,
वह असल खज़ाना होता है;
ये कोई कमजोरी नहीं होती,
अभिव्यक्ति का,
एक और ज़रिया होता है,
जो दिखाई और सुनाई नहीं देता,
पर अन्दर जागता सोता है;
न निकलना चाहता है,
न ठहरना चाहता है,
कुछ अधबुने एहसासों में,
बस संवरना चाहता है;
Subscribe to:
Posts (Atom)

