Wednesday, June 20, 2012

सब खामोश हैं...

बरगद के नीचे का बोलता चौपाल,
और शोखियों पर डोलती चहचहाहट,
रुक रुक कर बजती घंटियाँ,
और स्कूल से भागने की हडबडाहट,
सब खामोश हैं...

रात गुज़रती ट्रेन की सीटी,
पुल के नीचे पानी की कलकलाहट,
मंदिर के मंजीरों की सरगम,
सरकती उन जुगनुओं की जगमगाहट,
सब खामोश हैं....

सड़कों पर भागते इंजन,
मदिरालय में कांच की खनखनाहट,
मेघों का उफनता गर्जन,
गली में रेंगते कुत्तों की गुर्राहट,
सब खामोश हैं...

विचरता मन, संवरता दर्पण,
वह बहकती रेशमी सी फुसफुसाहट,
ठहरे हुए यौवन का समर्पण,
दिल की चौखट पर क़दमों की आहट,
सब खामोश है...

कभी कभी कुछ बना हुआ टूट जाता है,
भावों का हाथ फिसल कर छूट जाता है,
तब ह्रदय अपने ही आगोश में गुज़र जाता है,
और रोज़ का शोर भी खामोश नज़र आता है,

पर ये महज़ ख़ामोशी है, गूंगापन नहीं है,
समय कुछ अकेला है, सूनापन नहीं है,
बेतहाशा चीखें केवल नींद से जगाएँगी, 
पर ये खामोशियाँ ही अँधेरे दूर भगाएँगी;  

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