शाम ने फिर दर्द का रुतबा सहा था.
फिर मेरे आगोश से पानी बहा था,
बाँध बनकर वो किनारा बन गया फिर,
हौसलों को बांटकर उसने कहा था;
"रूह को सौगात में हम,
रूह से ही चुनते हैं,
दिल में हों ज़ज्बात तो,
पत्थर भी बात सुनते हैं"
फिर मेरे आगोश से पानी बहा था,
बाँध बनकर वो किनारा बन गया फिर,
हौसलों को बांटकर उसने कहा था;
"रूह को सौगात में हम,
रूह से ही चुनते हैं,
दिल में हों ज़ज्बात तो,
पत्थर भी बात सुनते हैं"
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