Saturday, June 2, 2012

बस संवरना चाहता है

किसी के पूछने पर कि कैसे हो,
कह देते हो कि अच्छा हूँ;
पर कभी कभी,
कुछ चुनिन्दा लोगों के साथ,
यह उत्तर,
खुद को ही अधूरा लगता है,
कुछ कहते कहते गला अटक जाता है,
कहाँ पूरा लगता है;
असमंजस की स्थिति होती है,
कहूँ न कहूँ !
सवाल रहता है,
फिर समय निकल जाता है,
बस मलाल रहता है ;

कभी बड़े ओहदे वाले,
फटकार लगा कर ही कोसते हैं,
गुस्सा तो बहुत आता है,
पर हम पहले अंजाम सोचते है,
फिर चुपचाप  ठहरते हैं,
वापस घर आते हैं,
और फिर किसी न किसी बहाने,
घरवालों पर बरसते हैं ;

कभी लोग तुलना करके,
हमें नीचा दिखाते हैं,
हम फिर भी शांत रहते हैं,
जैसे नहीं सुना, जताते हैं ;

पर हमारी इन चुप्पियों के पीछे,
एक निश्चित निवारण होता है,
व्यक्तिगत या व्यवसायिक,
या सामाजिक कारण होता है;

पर कभी कभी चुप्पियाँ,
इन सब से अलग होती हैं,
थोड़ा सा कह कर रुक जाते हैं,
पर इन्द्रियाँ सजग होती हैं,
जितना बाहर निकल पाता है,
उतने में ही बताना होता है,
जो अन्दर रह जाता है,
वह असल खज़ाना होता है;

ये कोई कमजोरी नहीं होती,
अभिव्यक्ति का,
एक और ज़रिया होता है,
जो दिखाई और सुनाई नहीं देता,
पर अन्दर जागता सोता है;
न निकलना चाहता है,
न ठहरना चाहता है,
कुछ अधबुने एहसासों में,
बस संवरना चाहता है;


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