Thursday, May 31, 2012

Inspired by a poem of Lisel Mueller

जब पूछा जाता है,
क्यों लिखते हो, कैसे शुरू किया;
तब मैं उपेक्षित स्मृति की बात करता हूँ,
उदासीनता में जो ज़रा अधूरी रह गयी,
उस अनोखी प्रकृति की बात करता हूँ;

बिछड़ने के तुरंत बाद के दिन,
गर्मियों का आगमन था,
सब कुछ खिला खिला था,
क्या था जो नहीं मिला था;

भूरे पत्थर की  बेंच जहाँ बैठा था मैं,
उस प्यार से रोपे बागीचे में,
एक दिवस के लिए वह फूली कुमुदिनी,
मौन और बहरी सी थी,
जैसे नींद में बहरा हो जाता कोई,
मदिरामय मदमस्त शराबी;
और गुलाब अपने ही अन्दर,
वापस मुड़ते दीखते थे,
कुछ काला न था, कुछ टूटा न था,
न कोई चेहरा, न कोई पत्ता,
धूप असीमित पड़ती थी उन अवकाशों में;

उस भूरे पत्थर की बेंच पर बैठा मैं,
उत्सुक, अधीर,
गुलाबी, उजले रंगों में भोले से चेहरे,
मुझमे थे रह रह कर उतरते,
तब मैंने भाषा का था मुहं खोला,
और उसमें उड़ेल कर वेदना सारी,
यह माना था,
क़ि नहीं शोक में रहूँ अकेला जीवन भर मैं,
साथ यह मेरी भाषा होगी अब हरदम !!

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