Wednesday, May 9, 2012

सरलता बहुत भोग लिए हैं

इस शहरातू जीवन में,
जब सूरज सर पर तपता है,
और गर्मी प्यास उगाती है,
तब कूलर और फ्रिज का पानी,
या पेप्सी, कोला की बोतलों,
में कितना भी डूबो,
प्यास नहीं जाती है !!!
तब याद आता है,
कुएं का एक लोटा ताज़ा पानी,
और एक भेली देसी गुड़,
बेल का रस,
कच्चे आमों का पना,
क्या आपको है मना ?
नहीं न !!
पर ये सब यहाँ शहर में,
नहीं बिकता,
मेरा विश्वास कीजिये,
अब ये गाँव में भी नहीं मिलता ;
वहां भी हमने,
कृत्रिम उपाय खोज लिए हैं,
अब हम जटिल होना चाहते हैं,
सरलता बहुत भोग लिए हैं;
और ये सिर्फ प्यास तक,
सीमित नहीं है,
हमारी भूख भी अब जटिल है,
नियमित नहीं है,
चाहे पानी हो या खाना,
या दुःख सुख का आना जाना,
या रिश्ता कोई पुराना,
या हो यूँ ही मुस्काना,
इन सब में भी बहाना ?
तरक्की की दिखावट में,
हमने कितने अनचाहे रोग लिए हैं,
अब हम जटिल होना चाहते हैं,
सरलता बहुत भोग लिए हैं;

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