ये गर्मियों की शाम जैसे कहीं और होकर यहाँ आती है; एक अनबुझी सी प्यास
लेकर, अनकही सी बात लेकर, अनजानी सी सौगात लेकर, अनसुलझे से जज़्बात लेकर /
कुछ कहते कहते जैसे रुक जाती है; कुछ देते देते जैसे थम जाती है; कुछ पास
आते आते जैसे अचानक खो जाती है / ये सकुचाई सी शाम रोज़ कुछ पूरा करना
चाहती है किन्तु रोज़ कुछ अधूरी ही रह जाती है / कुछ है जो इसे पूरा नहीं
होने देता; एहसास, वनवास, संकोच, हया, भय, लज्जा....कुछ तो है जो इसके
अधूरेपन को अधूरा ही रखता है / गुज़रती, थकी हुई धूप के अवशेष शनै शनै शीतल
होती पवन को रास्ता देते हैं; दिन भर तपन की गोद में बैठी धरती को छाया का
आँचल मिलता है; दूर जाता रवि मुस्कुराता हुआ सोते हुए शशि को जगाता जाता है
/ दोनों हाथ फैलाकर भी इस शाम को समेट पाना मुश्किल है, पर कुछ तो है जो
इसकी मुट्ठियों में बंद है, जिसे ये खोलना चाहती है, कुछ लेकर आई है जिसे
देना चाहती है; ये हथेलियाँ इसे रोपना चाहती हैं पर वह मुट्ठी खुलते खुलते
रह जाती है / ये गर्मियों की शाम जैसे कहीं और होकर यहाँ आती है /
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