Monday, February 27, 2012

फिर से भला होगा


कभी तो सिल्लियों पर बर्फ की, कोई गला होगा,
कभी तो जुगनुओं की आग में कोई जला होगा,
ये अक्सर सोचता हूँ कीमतें जीने की हैं कैसी,
कभी बिन आसरे के भी तले कोई पला होगा;

कहीं उल्लास है, कश्ती कहीं पर डगमगाती है,

कहीं की रात भी इस दिन से ज्यादा जगमगाती है,
ये कैसा है नियम कुदरत का तेरे ऐ मेरे माझी,
कहीं पर पौ फटी है पर कहीं पर दिन ढला होगा;

ये कैसा है लहू जो खुद को खुद से सींचता है,
ये कैसा जांत है जो सांस की जौ पीसता है,
तेरी चौखट पे अब सर झुकाने से भी क्या होगा,
तू है सब जानता, बस दे दुआ, फिर से भला होगा;

Saturday, February 25, 2012


जो पाया वह सब भूलकर, कितना कुछ किया, जताते हैं,
जब वक़्त नहीं हो साथ तब रिश्ते भी हिसाब बताते हैं;

Thursday, February 23, 2012


हमारा साथ चला पथ,
बिन मौसम बरसात में,
कुछ भीग गया है;
सड़क से लगा,
वह इमली का पेड़,
अकेला रहना सीख गया है;
जुदा कुछ भी न हुआ,
सब यही समझते हैं,
शहर कमाने मीत गया है;

Monday, February 20, 2012

जो झरोखे सोचते थे बंद हैं, वो ज़रा सा चरमरा कर हिल गए,
एक झीनी झिलमिलाती आंच में, ये अँधेरे रौशनी से मिल गए,
उम्र भर रह कर सरोवर, जो नहीं फूले थे नीरज,
एक झीनी रौशनी की ताप में, रेत में भी लहलहा कर खिल गए;





Thursday, February 16, 2012

कल तक सोचते थे,
बस वहाँ पहुँच जाएँ,
फिर चैन से ज़िन्दगी बिताएँ;
सोचते सोचते, प्रयासों के पश्चात,
बदल गए अपने हालात,
लगता था सब खिला खिला,
पर चैन अब भी नहीं मिला;
कोई कैसी कहानी लिखता है,
आगे अब और कुछ दिखता है,
फिर सोचते हैं, करते हैं प्रयास,
कभी न ख़त्म होती है आस,

इसीलिए बस मानव हैं हम,
कोई साधू संत नहीं हैं,
चलते रहते रुक कर, थक कर,
इस सफ़र का कोई अंत नहीं है;

Tuesday, February 14, 2012

ये दिन


अब तो दिनों की बौछार हो गयी,
कहाँ तो सुनते थे जन्मदिन या फिर बड़ा दिन,
अब तो हैं माँ, भाई, बहन, बाप का दिन,
बेटा, बेटी, प्रेयसी और यार का दिन,
हँसने हँसाने का दिन, पढ़ने पढ़ाने का दिन,
जवानी का दिन, तम्बाकू छुड़ाने का दिन,
बूढ़ों का दिन, डायबिटीस से लड़ने का दिन,
जनसँख्या का दिन, एड्स में न पड़ने का दिन,
विज्ञान का दिन, विकलांगों का दिन,
बदलते मौसम, जंगलों को संवारने का दिन,
कंजूस बनने का दिन, खर्च करने का दिन,
बहरों का दिन, हर्ज़ करने का दिन,
अधिकारों का दिन, खाद्य उत्पादन का दिन,
पर्यावरण का दिन, धरती सम्पादन का दिन, 
शहीदों का दिन, सैलानियों का दिन ,
रीति रिवाजों का दिन, किताबों का दिन,
महिलाओं का दिन, उनके गुलाबों का दिन,
कभी खुशियों का दिन, कभी हताशाओं का दिन,,
पहले क्यों नहीं था इन दशाओं का दिन,
क्या उन्ही पुराने दिनों पर नए दिन चढ़ गए,
या हमारे बड़े होने से हमारे दिन भी बढ़ गए,
क्या हम पहले इन भावनाओं के बिन थे,
नहीं, शायद इनसे भरे हमारे सब दिन थे,

हम कैसे 'दिन' में 'दिनों' को खोने लगे,
अब प्यार बाँटने के भी 'दिन' होने लगे;

Thursday, February 9, 2012

मेरी गर्मजोशी पर लिहाफों का बोझ भारी है,
फरवरी बीच में है पर शीतलहर ज़ारी है,
रोज़ कहता हूँ कल सुबह कर दूंगा पर,
आँख खुलती नहीं, कल की फिर बारी है;

Wednesday, February 8, 2012


क्या दिक्कत है जो आँखें दिनों में ऊँघती हैं,
खाली मकानों में तो आवाजें यूँ भी गूँजती हैं,

Monday, February 6, 2012


तुम क्यों समझते हो कि गायब सूरज होता है,
तेरा जो है पच्छिम वो किसी का पूरब होता है;

why do you believe the sun vanishes in the evenings,
your west is someone's east;

Saturday, February 4, 2012

चलो कुछ बंधन जोड़ें,
कुछ रस्में तोड़ें,
कुछ सूखे फलों को,
फिर निचोड़ें, 
कुछ अपनी मानें,
कुछ उनकी जानें,
कुछ छिपे हुए को,
फिर पहचानें;

ये कोई बंदिश नहीं,
कोई मिन्नत भी नहीं,
बस बहकी सी बात है,
किसी से रंजिश नहीं,
गुज़ारिश भी नहीं,
बस एक ख़यालात  है;

Wednesday, February 1, 2012

इन दफ्तरों के,
ये शीशे के दरवाज़े,
अपने न होने का एहसास देते हैं; 
पर खड़े रहते हैं,
और चिपका रहता है,
उनपर एक हैंडल,
जैसे लटका हो हवा में;

होकर भी न होने का एहसास,
कुछ अजीब लगता है,
रहे कितना भी पास मेरे,
कहाँ करीब लगता है;
यह तो हैंडल है एहसासों का,
जो दिखता है,
वर्ना शीशा तो,
बाज़ार में भी बिकता है.......