अब तो दिनों की बौछार हो गयी,
कहाँ तो सुनते थे जन्मदिन या फिर बड़ा दिन,
अब तो हैं माँ, भाई, बहन, बाप का दिन,
बेटा, बेटी, प्रेयसी और यार का दिन,
हँसने हँसाने का दिन, पढ़ने पढ़ाने का दिन,
जवानी का दिन, तम्बाकू छुड़ाने का दिन,
बूढ़ों का दिन, डायबिटीस से लड़ने का दिन,
जनसँख्या का दिन, एड्स में न पड़ने का दिन,
विज्ञान का दिन, विकलांगों का दिन,
बदलते मौसम, जंगलों को संवारने का दिन,
कंजूस बनने का दिन, खर्च करने का दिन,
बहरों का दिन, हर्ज़ करने का दिन,
अधिकारों का दिन, खाद्य उत्पादन का दिन,
पर्यावरण का दिन, धरती सम्पादन का दिन,
शहीदों का दिन, सैलानियों का दिन ,
रीति रिवाजों का दिन, किताबों का दिन,
महिलाओं का दिन, उनके गुलाबों का दिन,
कभी खुशियों का दिन, कभी हताशाओं का दिन,,
पहले क्यों नहीं था इन दशाओं का दिन,
क्या उन्ही पुराने दिनों पर नए दिन चढ़ गए,
या हमारे बड़े होने से हमारे दिन भी बढ़ गए,
क्या हम पहले इन भावनाओं के बिन थे,
नहीं, शायद इनसे भरे हमारे सब दिन थे,
हम कैसे 'दिन' में 'दिनों' को खोने लगे,
अब प्यार बाँटने के भी 'दिन' होने लगे;
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