Monday, August 31, 2020

जो लम्हे न हुए कैद उन हया सरीखी बातों में,
रहे साथ वो एक समय तक उजली पिघली रातों में,
सूख गए हैं पवन वेग से मिले हुए आघातों में,
टांग दिए थे दिन जो हमने बेमौसम बरसातों में,

Saturday, August 29, 2020

मैं तुमसे पहले आया था,
तुमसे ज्यादा चला भी,
चल रहा हूँ अब भी.... 
तुम बाद में आये बहुत,
और रुके रहे अक्सर,
रुके हुए हो अब भी,

मुझ पर खर्च हुआ थोड़ा,
पर मुझे इस्तेमाल किया ढेर सारा,
जब जिसका मन किया  ....
तुम पर खर्च हुआ ढेर सारा ,
पर तुम्हे इस्तेमाल किया थोड़ा
जब सबका मन किया,

मेरा रख रखाव भी आसान है,
एक कपडे से झाड़ कर,
कभी कहीं भी रख दिया  ....
तुम्हारा रख रखाव आसान नहीं,
एक निश्चित जगह रहे तुम,
और तकनीकी लोग रहे तुम्हारी सेवा में,

जब कि एक ही घर परिवार घराना,
फिर क्यों है ये भेद करते सभी,
मेरी शिद्दत में तो कोई कमी नहीं,
फिर जाना कि मैं शीतल नहीं,
तुम्हारी तरह,
बस यही कसूर है मेरा,

अब सुकून है ज़िंदगी में,
हमारा अपना स्वभाव है,
अपनी किस्मत भी,
तभी तो तुम बन गए,
स्प्लिट ए सी,
और हम रह गए पेडस्टल फैन ....

Tuesday, August 25, 2020

मेले में कितने झूले हैं,
कुछ को हाथ बढ़ा छू ले हैं,
कुछ की देख अजब सी काया,
अपने हाथ पाँव फूले हैं,

कुछ तेज़ी से ऊपर जाते,
पर फिर लौट धरा को आते,
कोशिश करते रहते हैं पर,
ऊपर ज्यादा टिक न पाते,

कुछ झूले हैं गोल घुमाते,
चक्कर उसपर बहुत हैं आते,
जब वो आखिर में रुक जाता,
उतर देर तक हम पछताते।

कुछ झूले लेकिन सादे हैं,
उनके नहीं बड़े वादे हैं,
उनपर वो चुपचाप बैठते,
जिनके पास सिर्फ यादें हैं।

हर झूले की अपनी मति है,
पर कुछ से अपनी सहमति है,
समझा झूलों के अनुभव से,
हर झूले की अपनी गति है।

सबकी है नाव तलैया में,
अंतर है महज़ रवैया में,
चला गया कोई छला गया,
मेलों की भूल भुलैया में। 

Sunday, August 16, 2020

कुछ इस तरह से चल रही है लेखनी जैसे,
किसी ने फिर भर दी हो स्याही दावात में,

दिन में भी लगातार गिरता है पानी जैसे,
बरस न पायी हों आँखे समूची रात में,

ज़ख्मों का दर्द भी सिमट न पाया धरा तक,
तभी रो रहा है देखो अम्बर आघात में,

हम समझते रहे वो शक्ल हमारी थी पर,
संवर रहा था सिर्फ दर्पण ज़ज़्बात में,

अब तो लगता है कसक मुकम्मल तब होगी,
जब फिर हो मुलाकात, पर दूसरे हालात में,

यूँ ही ये मौसम मददगार नहीं होते नीरज,
कुछ तो गयी बात होगी इस बरसात में।

Thursday, August 13, 2020

वक़्त से थी कामनायें,
थी बहुत सी योजनायें,
वक़्त खुद ही रूठ बैठा,
वक़्त को कैसे मनायें। 

चुक गयी बातें हमारी,
जो इकट्ठी की थीं सारी,
अब नहीं है भोर आती,
है पलक पर रात भारी।

ये नज़ारे वो नहीं हैं,
ये फुहारें वो नहीं हैं,
कैद है बूंदों में सावन,
ये बहारें वो नहीं हैं।

अब नहीं कोई कसर है,
इन दिनों हम बेअसर हैं,
अब सही से है ये जाना,
बेअसर में भी बसर है।

आज कुछ ज़िद्द पर अड़ी है,
पर ये केवल इक घड़ी है,
वक़्त ने ही था बताया,
ज़िंदगी कितनी बड़ी है।

आज बेशक दिवस खाली,
पर जगेगा जल्द माली,
जब नए प्राची के पट पर,
फिर दिखाई देगी लाली।