Sunday, August 16, 2020

कुछ इस तरह से चल रही है लेखनी जैसे,
किसी ने फिर भर दी हो स्याही दावात में,

दिन में भी लगातार गिरता है पानी जैसे,
बरस न पायी हों आँखे समूची रात में,

ज़ख्मों का दर्द भी सिमट न पाया धरा तक,
तभी रो रहा है देखो अम्बर आघात में,

हम समझते रहे वो शक्ल हमारी थी पर,
संवर रहा था सिर्फ दर्पण ज़ज़्बात में,

अब तो लगता है कसक मुकम्मल तब होगी,
जब फिर हो मुलाकात, पर दूसरे हालात में,

यूँ ही ये मौसम मददगार नहीं होते नीरज,
कुछ तो गयी बात होगी इस बरसात में।

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