Thursday, December 29, 2011

excerpts from one of my writings

एक  दो  रोज़  में  हर  आँख  ऊब   जाती  है ;
दिल  को  मंजिल  नहीं  रस्ता  समझने  लगते  हैं ;
जिनको  हासिल  नहीं  व्हो  जान  देते  रहते  हैं ;
जिनको  मिल  जाऊं  व्हो  सस्ता  समझने  लगते  हैं .

कुमार  विश्वास  की  ये  पंक्तियाँ  इससे  सटीक  पहले  कभी  नहीं  बैठी . इन  अंधेरों  की  गर्मी  में  करवटें  बदलते  हुए  यूँ  प्रतीत  होता  है  मानो  इतिहास  दोहराया  जा  रहा  है ...या  फिर  वही    कथा  फिर  से  कोई  बांच  रहा  है  जो  अतीत  के  दरवाज़ों  को  आधा  खोल  देता  है ...न  अन्दर  का  पूरा  दिखाई  देता  है  न  बाहर  का . ये  आपकी  समझ  में  शायद  न  आये .

हम  बहुत  से  काम  अक्सर  ऐसा  करते  हैं  जिससे  दूसरे  को  दुःख  न  हो ....या  शायद  वह  खुश  रह  सके .... बचपन  में  ये  अच्छा  लगता  था ....बड़े  होते  होते  ऐसा  लगने  लगा  मानो  ये  कोई  त्याग  है ...किसी  दूसरे  का  हमारे  प्रति . और  अब  जब  एक  बार  फिर  से  बच्चा  बनने  का  जी  चाहता  है  तो  ये  एक  उपकार  लगता  है ...और  नींदों  में  मैं  चीखता  रहता  हूँ . 'मुझपर  उपकार  मत  करो '...मैं  कोई  ठहरी  हुई , लाचार   सी  वस्तु  नहीं ...मैं  कोई  भंवर  में  फंसी  नाव  नहीं ...कोई  डूबता  नाविक  भी  नहीं ....

मैं  भी  एक  अस्तित्व  हूँ ...एक  आकार...  अपने  अवगुणों  समेत  ..माना  की  मेरा  ढांचा  शायद  बेढंगा  है ...पर  सपने  मैं  भी  बुनता  हूँ ...हँसता  हूँ ...रोता  हूँ .... मेरा  अपना  शरीर  है  हाड़  मांस  का ...कटने  पर  अब  भी  लहू  रिसता  है ....इसका  भी  रंग  सुर्ख  है ...मेरा  भी  अपना  एक  चाँद  है ...उस  बादल   की  ओट  में ...धुंधला  ही  सही ...पर  अपना ...अलग  सा .

Wednesday, December 28, 2011

पता ही नहीं चलता....

कब बदल जाती है दिशा, हवाओं की,
कब बदल जाती है अहमियत, कुछ भावों की,
बदल जाती है कब महक फसलों की,
कब बदल जाती है शक्ल, हमशक्लों की,
पता ही नहीं चलता....

कब बदल जाता है वेग इन लहरों का,
कब बदल जाता है मौसम इन शहरों का,
बदल जाता है कब, महल कुछ सपनों का,
कब बदल जाता है अरमां कुछ अपनों का,
पता ही नहीं चलता....

कब किन्ही एहसानों की मियाद बदल जाती है,
कब अंधेरों में घुटन की सांस बदल जाती है,
बदल जाती है कब पहचान खारे पानी की,
कब बदल जाती है  हुंकार जवानी की,
पता ही नहीं चलता....

कब स्याह केशों का रंग बदल जाता है,
कब पिता और सेहत का संग बदल जाता है,
बदल जाता है कब धैर्य माँ के घुटनों का,
कब बदल जाता है संसार मेरे अपनों का,
पता ही नहीं चलता....

Wednesday, December 21, 2011

कागज़ का टुकड़ा

इस झोंपड़ी में,
आज एक मेमसाब आई,
समाजसेविका का गहना ओढ़कर,
बड़ी सी कार में,
आँखों का चश्मा सर पर डाले,
खुशबुओं का झोंका साथ लेकर,
बुढ़िया के पास पीढ़े पर बैठी,
साड़ी संभालकर,
हील नहीं दिखनी चाहिए,
बुढ़िया से नमस्ते किया,
फोटो खिंचवाई,
और पांच हज़ार का चेक दिया,
बुढ़िया कुछ न बोली,
ताकती रही उस कागज़ के टुकड़े को,
अब यही कागज़ का टुकड़ा,
उसकी दवा लाएगा,
यही दो जून की रोटी,
यही साग लाएगा,
यही झोंपड़ी में,
लालटेन जलाएगा,
यही टूटी खाट में,
नेवाड़ बुनाएगा,
ये कागज़ का टुकड़ा नहीं,
कीमत है एक बेटे की,
जिसे वक़्त ने नशेड़ी बनाया था,
ज़हरीली शराब ने जिसे,
मार कर जगाया था,
मेमसाब का काम ख़त्म हुआ,
झुक कर झोंपड़ी से निकली,
पर्स में से छोटा सा आइना निकाला,
थोड़ा चेहरे को संवारा,
और जैसे ही ऐनक,
सर से उतार कर ,
आँखों पर फैलाया,
पड़ोस का,
पांच साल का बालक,
जोर से चिल्लाया,
"तेले मस्त मस्त दो नैन,
 मेले दिल का ले दये तैन "

Tuesday, December 20, 2011

जादू

कागजों से फूल लाया,वाह क्या करतब दिखाया,
एक सिक्के से तो देखो सैकड़ों सिक्के बनाया,
इसको काटा, उसको जोड़ा, बदल दी कैसे काया,
वाह जादूगर जी तुमने दर्शकों को क्या लुभाया;

पर ये भ्रम पैदा किया है, आँखों की कमजोरियां हैं,
असल जादू तो तुम्हारे और मेरे अन्दर भरा है,
खोज पाओ यदि कभी तो, सृष्टि भी छोटी जगह है,
वरना यूँ ही जायेगी कट, जीने में फिर क्या धरा है;

ज़िन्दगी की जंग में  झेल सकता क्रूर शोले,
कठुर तृष्णा को अपनी सहृदयता में संजो ले,
मात्र मन की रोशनी से तिमिर में द्वार खोले,
वह ही सच्चा जादू है  सर पर चढ़ कर बोले;
न उन सरसरी निगाहों में, न ही रेशमी रुमालों में,
वो जवाब जो न मिल सके, छुपे बैठे थे सवालों में,
अब तो गुज़र चुका है मंज़र, ज़रा देर हो गयी 'नीरज',
वो संवरते रहे हकीकत में, हम बिखरते गए ख्यालों में ;

Friday, December 16, 2011

इस जाड़े के शाम की सहमी धूप अब गुज़र जाना चाहती है I गार्डेन पाम के वृक्ष सीधे खड़े हैं;  बिलकुल मौन जैसे निस्तब्धता को सार्थक कर रहे हों I बिजली के तारों पर बैठी चिड़ियाँ न जाने क्या आने या जाने की प्रतीक्षा कर रही हैं I लान में जबरन फैलाई गई हरी घास ओस से मिलन की आस में रात की बाट जोह रही हैं I अहाते की फेंसिंग पर लगे नारंगी फूल अब भी नारंगी ही दिखते हैं I बरगद की झूलती जडें धरती से चार फीट ऊपर ही रहती हैं I सब कुछ तो रोज़ की तरह ही है; बस एक और दिवस है जो भाग जाना चाहता है I मुझसे, तुझसे, हम सब से दूर.....कहीं और उजाला होगा; कहीं और कुछ हसरतें खुमारी आँखों में जगेंगी; कुछ रेशमी सी किरणें कहीं बर्फ पर पड़कर चांदी सी चमकेंगी; कहीं और दुनिया सजेगी; कहीं और जिंदगी चलेगी....

Thursday, December 15, 2011

भटकती प्यास

अचानक आँख खुली, रात अभी बाकी थी,
हवा में  झूलते सपन की गर्द अभी बाकी थी,
सरक रहा था लिहाफ बदन से क्यों आहिस्ता,
जब मेरी दालानों में सर्द अभी बाकी थी;

कभी कभी किस्मत कुछ इस तरह लजाती है,
ठंडी हथेलियों में जैसे ओस सिमट जाती है,
लांघ कर आँगन की डयेढी, लांघ ऊँची ये दीवारें,
ये भटकती प्यास है, ये कहाँ कहाँ जाती है,

Tuesday, December 6, 2011

एक कश्ती

उस पहाड़ के पीछे,
अब भी एक नदी बहती है,
वहीँ पर...चुपचाप,
किनारे पड़ी एक कश्ती है,
जिसकी बोझिल होती सी,
अपनी एक हस्ती है,
वह अपलक देखती है... दूर,
जहाँ नाविकों की बस्ती है;

अब वो इंतज़ार नहीं करती,
घूरती है रेंगते केकड़ों को,
अब ये नदी,
उससे प्यार नहीं करती,
शनैः   शनैः
इसकी उम्र ढल जायेगी,
लकड़ी ही है,
एक दिन पानियों में गल जायेगी;

Tuesday, November 29, 2011

मूक सी चलती हैं सुइयां घड़ियों की,
मूक रहती है कहानी परियों की,
मूक है मुझको 'मेरा' कहने वाला,
मूक रहता है तेरे घर का ताला,
सब है रहते मूक इस जादूगरी में,
पर किसी का अक्स है जो बोलता है
रोज़मर्रा जिंदगी का ये पिटारा,
कैसे कैसे राज़ देखो खोलता है,

Sunday, November 20, 2011

जाड़े का कुहासा

वो बागों के सुनहरे वृक्ष नहीं जो दीखते हैं,
आँखों का नहीं है भ्रम, ये जाड़े का कुहासा है,
जो नयनों से छलकते थे कभी ख्वाबों में घुल कर के,
बड़े सूखे से बैठे हैं, कि जैसे जल ही प्यासा है,
कि यूँ खामोशियों के दलदलों में डूबते क्यों हो,
अभी तो रात बाकी है अभी से क्या निराशा है,
नहीं ग़मगीन रखना दिल, रहे वीरानियाँ जितनी,
जो रेतों में रहोगे तो ही जानोगे पिपासा है,
हवाओं के समंदर में नज़र जो ऋतु नहीं आती,
अभी जिंदा हैं साँसों में, अभी नयनों में आशा है....

Friday, November 18, 2011

ज़रा सा छेड़ दो तो ये कहाँ चुपचाप सहती हैं,
ज़रा बिखरी, ज़रा जिद्दी, ज़रा मशरूफ़ रहती हैं,
कसक हैं ये मियादों की, ये इक मुद्दत की यादें हैं,
मेरे दिल के घरोंदों में बड़ी महफूज़ रहती हैं,
वीरान रातों में दिये नहीं टिमटिमाते,
जुगनू अब जैसे दिन में निकलते हैं,
सोचा था कभी तो तन्हा होऊंगा पर,
ये सन्नाटे हमशक्ल से, साथ चलते हैं.....

मर्यादा

यही करना है,
इससे डरना है,,
इतना ही ठीक है,
ज्यादा से बचना है,
आगे बढोगे,
तो मुहं की खाओगे,
लक्ष्मण रेखा से आगे,
और कहाँ जाओगे...

कल लोग जान जायेंगे,
क्या मुहं दिखाओगे,
कहीं गुमनाम अंधेरों में,
अपने दिन बिताओगे,
गैरों के चक्कर में,
अपने भी छोड़ देंगे,
जिन आइनों की बात करते हो,
दिलों से तोड़ देंगे,
कुछ अच्छा सोचो और करो,
खुद से नहीं तो,
कम से कम समाज से डरो...

हमने कितने नियम बनाये हैं,
कुछ बस सुनते हैं,
कुछ अपनाए हैं,
ये गलत है, ये सही है,
पर ये बात किसने कही है,
ये धर्म है, ये अधर्म है,
इनमे उलझा,
हमारा कर्म है,
बहुत कुछ ऐसा है,
जो सोच सकते हो,
क्योंकि विचारों का आना,
कैसे रोक सकते हो,
उसके आगे और कुछ नहीं,
यहीं उनका अंत है,
लेकिन आम आदमी आदमी है,
कहाँ संत है ...

ये दिलों के ज्वार हैं,
बाहर से दिखता सादा है,
एक बार ज़िक्र कर दो तो,
पता लगता है,
सीमाओं से कितना ज्यादा है,
हर इन्सान ने जैसे,
इच्छाओं का,
ओढा एक लबादा है,
पूरे की ख्वाहिश में,
कोई जिंदा आधा है,
ये कैसी मर्यादा है...

Sunday, November 13, 2011

जड़ें

बरगद की झूलती लताएं धरती का स्पर्श चाहती हैं,
बोलती नहीं, पर आस लिए नीचे को बढ़ती हैं.
वहां जहाँ इनके अस्तित्व की जड़ें रहती हैं,
क्या हम अपनी जड़ें पहचानते हैं?
या बस सुनते हैं और मानते हैं.......

Friday, November 4, 2011

परिवर्तनशील जिंदगी

कमरे में  कुर्सियों की पहचान बदल जाती है,
दूधवाले भैया की मुस्कान बदल जाती है,
चिड़ियों के सुरों की तान बदल जाती है,
रोज़मर्रा के चीज़ों की दुकान बदल जाती है,

बदल जाती है सरसराहट नल के आने की,
बदल जाती आवाज़ दरवाज़ा खटखटाने की,
बदल जाती जगह अखबार को पाने की,
बदल जाती है खिड़की रोशनी अन्दर आने की,

घर खुला रखने की परेशानी बदल जाती है,
किसी के घर में होने की निशानी बदल जाती है,
महज़ एक मकान बदल लेने से,
हमारी कितनी जिंदगानी बदल जाती है,

दोस्तों, यूँ तो बदलाव की अपनी मीठी थकान है,
पर हमारा जीवन भी एक किराए का मकान है,
ठहराव है, बदलाव है, रोज़ नया आयाम है,
परिवर्तनशील जिंदगी, तुझे मेरा सलाम है.

Wednesday, November 2, 2011

अधूरा मन

कितना अजीब है,
हम मिलते हैं, यूँ ही ज़माने में,
कुछ हकीकत में, कुछ अनजाने में,
फिर जुदा हो जाते हैं,
कुछ खोने में, कुछ पाने में,
और तब,
बस ख्याल रहता है,
जो नहीं हो पाया,
उसका मलाल रहता है...

पर ये यहाँ ख़त्म नहीं होता,
इस तकनीकी दुनिया में,
सच मानो,
किसी मिलन का अंत नहीं होता,
वर्षों पश्चात,
दूसरे हालातों में,
कभी जवाबों में,
कभी सवालातों में,
कभी पहचानों में,
या  नेटवर्किंग के इंसानों में,
हम फिर मिलते हैं.....

तब दुनिया अलग होती है,
पुरानी पहचानों के बावजूद,
हमारी चेतना,
सजग होती है,
तब हम परिणाम सोचते हैं,
कितना खुलें,
इसका अंजाम सोचते हैं,
कहते हैं बहुत सा पानी बह गया,
कुछ तूफ़ान आये थे,
अरमां भी उनके संग गया,
कहते हैं तुम आगे निकल गए,
हमारे रास्ते में फिसलन थी,
बहुत कोशिशें की,
पर फिसल गए........

दोस्तों...
किसी न किसी रूप में,
ये हम सब के साथ होता है,
तब थोड़ा सा दिल जगता है,
और दिमाग सोता है,
वह कितना अच्छा समय था,
जब एक अलगाव,
हमेशा के लिए होता था,
कुछ समय तक मलाल रहता था,
पर वक़्त कहाँ सोता था,
धीरे धीरे सब ठीक हो जाता था,
जब दूसरा नज़र ही न आये,
तब सब अपना हो जाता था,
....लेकिन,
दोबारा मिलना भी,
कोई दोष नहीं है,
वक़्त की अनुकम्पा है,
अब कोई बेहोश नहीं है,
जा बाँट सकते हो बाँटो,
जो नहीं, उसे छांटो,
छोटी सी दुनिया हो गयी,
उससे भी छोटा जीवन,
क्या करोगे ले जाकर,
मरने पर, अधूरा मन......





Monday, October 31, 2011

फेर हुआ ऐसे कैसे

पीली सरसों थी यूँ फूली,
जैसे प्रियतम का तेज़ मिला,
प्यासी माटी थी यूँ उपजी,
ऊसर में जैसे धान खिला,
बिखरा था इत्र हवाओं में,
जैसे मनमोहक ज्ञान मिला,
कैसे वह सीना तान चले,
तगमे का जैसे मान मिला,
फिर फेर हुआ ऐसे कैसे,
क्या कोई सुनामी आया था,
क्या कांपी थी धरती मनवा,
या फिर बैरागी आया था,
ये वेग चला और पेंग बढ़ा,
झूले पर काबू नहीं मिला,
पलकें आंधी में यूँ झूली,
 नयनों में सोता स्वप्न हिला..

Sunday, October 30, 2011

दिवाली

धमाकों का शोर शांत हुआ,
दीयों ने छोड़ा दिल जलाना,
हुई हैं रातें फिर से अपनी,
वही है जलता बल्ब पुराना,
क्या सोचा था, बदल जाएगा !
इक त्योहार से तेरा फ़साना ?


अब भी गरीब की बेबसी दिखती है,
जहाँ जहाँ भी नज़र गयी,
पर देखो कितनी मासूमियत से,
एक दिवाली और गुज़र गयी;

Thursday, October 20, 2011

असमंजस

जीवन में कुछ ऐसे भी बेबस से लम्हे आते हैं,
जब प्यारे से रिश्ते भी असमंजस बन जाते हैं,
जब आशंका की बदरी, अपना पुरज़ोर पकड़ती है,
तो साँसों की पुरवायी भी, कुछ थम थम कर चलती है,

ऐसे मौकों पर प्यारे तुम मायूसी में मत सोना,
थोड़ा कष्ट रहेगा पर तुम अपना संयम मत खोना,
सदा रहेगा साथ तुम्हारे, दिल से जिसका नाता है,
ऊँगली में यदि लगे चोट तो हाथ न काटा जाता है,

Friday, October 14, 2011

सब कुछ खो जाने पर भी

कल अपना था, आज पराया,
जब ये पचा न सको,
लाख कोशिशों के बाद भी,
जब कुछ बचा न सको,
तब भी बोझिल मत होना,
बेशक थोड़ा रो लेना,
पर साँसों को मत खोना,
जीवन में ऐसे मौके,
बस आते जाते रहते हैं,
रोज़ खिले हैं फूल यहाँ,
रोज़ कुम्हलाये रहते हैं,
जो आता है, जाएगा भी,
जो खोता है, पायेगा भी,
जो होनी है सो होनी है,
तब खोना कैसी अनहोनी है,
ऊपर बैठा करे तमाशा,
सारी श्रृष्टि रचा करता है,
पर सब कुछ खो जाने पर भी,
एक भविष्य बचा रहता है,

Wednesday, October 12, 2011

पतझड़ की तरह

वह सर्वस्व लुटा कर भी ऐतबार करता है,
कैसे कोई पतझड़ की तरह प्यार करता है,

ये आवाज़ भी यूँ रूह तक पहुँचती है,
जैसे कोई हमशक्ल इंतज़ार करता है,

जब वह न मिला तो उसका ग़म ही सही,
ऐसा इंसाफ़ भी परवरदिगार करता है,

ये फ़कत मौसम हैं, एक से नहीं रहते,
वो उम्मीदों में अपना श्रृंगार करता है,

ये कमजोरी नहीं, समझौता है 'नीरज',
किसी के दर से कोई क्यों गुहार करता है,

वो मिले, न मिले, या सवालों में रहे घिरकर,
जवाबों में क्या है, वो तो यूँ ही हिसाब करता है,

जब लुत्फ़ मिलने लगे सर्वस्व लुटाने में,
जान जाओगे कोई क्यूँ प्यार करता है...

Monday, October 3, 2011

कुछ तो कम है

जब भीड़ में भी आँखें शून्य ही निहारती हैं,
जब रातों की भागी नींद दिनों में सताती  है,
जब यादों में यादें ही बेबस पहचान भुलाती हैं,
जब पहचानी सी पदचापें अनायास रुलाती हैं,
तब कुछ तो ग़म है,
तब कुछ तो कम है !!!

Wednesday, September 28, 2011

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

आज फिर एक सांझ की है आने की तैयारी,
प्राकृतिक अंधेरों पर होगा कृत्रिम प्रकाश भारी,
चाहे अलौकिक कर दो या दे दो तिमिर उधारी,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

क्या मेरे झुकने से ही होती है जीत तुम्हारी,
हैं भारी आँखें हरदम कोमल पलकों से हारी,
नशा हार का मुझको, बाज़ी हो या लाचारी,
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

पर जलता रहेगा दीपक, रातें हों चाहे बयारी,
जो दिल में फूल खिले हैं, हम सींचेंगे वो क्यारी,
चाहे नयनों में पिघलो, या मेघ बनो मल्हारी,
कुछ बात है  कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

Sunday, September 25, 2011

ढूँढने का आगाज़

कोई कहता है इनमे उदासी है,
कोई कहे विश्वास है,
कोई कहे एक आशा है,
कोई कहे उल्लास है,
किसी ने कहा अंतरभावना है,
किसी ने, अच्छा प्रयास है,
किसी ने सवालों का जवाब बताया,
किसी ने जवाबों पर सवाल उठाया,
किसी ने आत्मीय बताया,
कोई बस मुस्कुराया,
विविध प्रतिक्रिया मिलती है,
आभार है आप सब का,
मेरी कलम तो बस लिखती है;
बहुत से मौके आयेंगे,
जब मेरे भाव सब को नहीं भाएंगे,
माफ़ कर दीजियेगा,
मैं कोई कवि या लेखक नहीं हूँ,
कोई विदूषक नहीं हूँ,
एक अदना सा ठहराव हूँ,
असल जिंदगी में ज़रा घबराता हूँ,
इसलिए भाव,
कागज़ पर दर्शाता हूँ,
लेखन मेरा शौक ही नहीं है,
आप तक पहुँचने का ज़रिया भी है,
खुद को ढूँढने का आगाज़ है,
वरना डूबने को और दरिया भी है;

Friday, September 16, 2011

ये कैसी पहचान

उसके पास बहुत सी भौतिक वस्तुएं नहीं हैं,
साज़ो सामान, ऐशो आराम नहीं है,
यूँ तो एक संतुष्ट जीवन यापन के साधन हैं,
पर संतुष्टि की समुचित सीमाएं नहीं हैं,

अब वह अधेड़ हो चला है,
अब भी उससे सब की बहुत आशाएं हैं,
वह कोशिशों में बहुत समय बिताता है,
पर उसकी अपनी समस्याएं हैं.

उसने देखा है फिसलते इन हथेलियों से,
मछलियों की तरह रिश्तों को,
पकड़ता रहता है उन्हें वह उधार की तरह,
जैसे भरता हो हर महीने किश्तों को,

खट रहा है वह उस चक्की की माफिक,
जिसमें तेल निकलता है सरसों से,
क्या हुआ की वह अब भी आम है,
वह नौकरी कर रहा है बरसों से,

सब कहते हैं कि वह काबिल है,
पर कहीं दूर भटकता उसका मन है,
जो है, वह उसकी प्रतिभा से कम है,
जो नहीं, वह उसका अधूरापन है,

और इन सब की उधेड़बुन में,
आज उलझ गया उसका जीवन है,
क्यों कहते हो; यदि नहीं बुला सकते,
वहां से, जहाँ भटका इसका मन है,

वो कोई शीशा नहीं है,
कि उसमे अपना प्रतिबिम्ब देखोगे,
कोई मेज़ पर रखा गिलास भी नहीं,
कि आधा भरा या खाली देखोगे,

वो कोई विद्वान नहीं, धनवान नहीं,
कोई देव नहीं, दानव भी नहीं,
कोई रजा, रंक, भिखारी नहीं,
कोई सर्व गुण संपन्न मानव भी नहीं,

वो इक अदना सा इंसान है,
उसके भी कुछ अरमान हैं,
पर क्या कुछ भौतिक कमजोरी ही,
अब उसकी पहचान हैं,

ठीक है वह दर्शाता नहीं है,
पर वह भी तो ऐतबार करता है,
उसको जताने का ढंग शायद नहीं आता,
पर वह भी तो प्यार करता है,

किस्मत पर उसका ज़ोर नहीं है,
पर कोशिशें हज़ार करता है,
सुख का, साज़ो सामान, ऐशो आराम का,
वह भी तो इंतज़ार करता है,

उसकी भी दिली तमन्ना है,
वह जैसा है, अपनाया जाएगा,
उसके अपने भी अपने रहेंगे,
वह भी पहचाना जाएगा,

इसीलिए उसकी विनती है,
वह जैसा भी है स्वीकार करो,
एक मनुज के मनोभाव का,
यूँ ही न तिरस्कार करो,

जिस दिन वह जाड़े में बिखर जाएगा,
उसकी सिहरन से सब कांपोगे,
प्रतिभा को भौतिकता से,
मेरे आका; कब तक नापोगे.

Friday, September 9, 2011

दिल है तो धड़केगा भी

बड़ा लंबा सफ़र है,
धूप है, मेड़ों की,
छांव है, पेड़ों की,
कुछ सुस्ता लो,
पांव फैला लो,
यात्रा है ये,
कोई रेस नहीं है,
ज़रा रुक जाओगे,
तो कोई क्लेश नहीं है,
हौसला है तुम्हारा,
बढ़ेगा तो थकेगा भी,
और स्थिर है तो चलेगा भी;

किसे पुकारते हो,
क्यों पुकारते हो,
अधिकतर मायावी हैं,
क्यों दुलारते हो,
पहले खुद की तो सुनो,
कुछ और उम्मीदें बुनो,
चाहे कुछ देर बेमन से जियो,
पर एक प्याला और पियो,
उस तक बात जायेगी,
कहानी लौट आएगी,
समझेगा तो चुनेगा भी,
सोच है तो सुनेगा भी;

अब भी याद आता है,
कोई बात नहीं,
बिछड़ा दर्द कहाँ जाता है,
पर इसमें इसका,
कसूर नहीं है,
ये बस एक ठहराव है,
नासूर नहीं है,
कुछ समय और याद आएगा,
फिर दराजों में,
दफ़न हो जाएगा,
भीगा है तो फूलेगा भी,
याददाश्त है तो भूलेगा भी;

क्यों चेहरा लाल करते हो,
एक उलझन और इतना गुस्सा,
कमाल करते हो,
आँखें बंद हैं तो काली दिखती है,
खिडकियों को खोलो,
अब भी पूरब की लाली दिखती है,
ये दिल के मामले हैं,
दिलों से सुलझेंगे,
लहू भड़केगा,
तो और उलझेंगे,
आँधियों में खड़केगा  भी,
दिल है तो धड़केगा भी;

Thursday, September 8, 2011

मौत के बीच रहती है

विरह की औ मिलन की पालकी अब साथ चलती है,
कि अब खामोशियाँ, खामोशियों के साथ पलती है,
ये कैसा है नियम, तब्दीलियों का ऐ मेरे मौला,
कहीं पर दिन निकलता है, कहीं पर सांझ ढलती है;

ये कैसा आ गया है वक़्त कि अब तक़दीर कहती है,
तुम्हारी रूह है मज़बूत सभी दुःख सुख को सहती है,
कहीं पर हों धमाके या कहीं पर जश्न की हो रात,
ये कैसी जिंदगी है, मौत के जो बीच रहती है;

Monday, September 5, 2011

इतना वादा है

तमाम उम्र हवाओं में उड़ने की सज़ा,
ज़मीनी रिश्तों से कटने की मिली,लिए गम तलाशते रहे जिसे उम्र भर,
वो न मिला तो क्या, धूल गलियों की मिली;
न तब गुनाह था, न अब गुनाह है,
उसमे भी ख़ुशी थी, इसमें भी सबब है,
और ये लम्हे कितने भी बेदर्द लगें,
इनके गुजरने में एक हसीन अदब है;
आसान सी लगती, पर कहानी अजब है,
कमज़ोर सा चेहरा पर नूर गज़ब है,
बड़ा आसान है, बड़ा सादा है,
बातों में कम दिल में गम ज्यादा है,
कुछ और फुर्सत में हो लें ज़रा,
रहूँगा साथ, इतना वादा है....



Saturday, September 3, 2011

पहुँचने का ज़रिया

कोई कहता है इनमे उदासी है,
कोई कहे विश्वास है,
कोई कहे एक आशा है,
कोई कहे उल्लास है,
किसी ने कहा अंतरभावना है,
किसी ने, अच्छा प्रयास है,
किसी ने सवालों का जवाब बताया,
किसी ने जवाबों पर सवाल उठाया,
किसी ने आत्मीय बताया,
कोई बस मुस्कुराया,
विविध प्रतिक्रिया मिलती है,
आभार है आप सब का,
मेरी कलम तो बस लिखती है;
बहुत से मौके आयेंगे,
जब मेरे भाव सब को नहीं भाएंगे,
माफ़ कर दीजियेगा,
मैं कोई कवि या लेखक नहीं हूँ,
कोई विदूषक नहीं हूँ,
एक अदना सा ठहराव हूँ,
असल जिंदगी में ज़रा घबराता हूँ,
इसलिए भाव,
कागज़ पर दर्शाता हूँ,
लेखन मेरा शौक ही नहीं है,
आप तक पहुँचने का ज़रिया भी है,
खुद को ढूँढने का आगाज़ है,
वरना डूबने को और दरिया भी है;

Tuesday, August 30, 2011

तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो

हर पल एहसास बने फिरते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

बत्ती हो दिमाग़ की जो जल नहीं पाती,
या बौर हो आमों की जो फल नहीं पाती,
या हो सांस गरीब की जो चल नहीं पाती,
या बर्फ हो रकीब की जो गल नहीं पाती,

कतरा कतरा रोज़ गिरते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

एक सुन्दर बंगला, या कोई मोटर कार हो,
खूँटी हो दालान की, या खाट की नेवाड़ हो,
इक अदद हो नौकरी या रोकड़े की धार हो,
कैद जो न रख सके क्या ऐसा कारागार हो;

रोज़ इक नया पैबंद सिलते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

महुआ हो जाड़े का जो रुक नहीं पाया,
या शिखर हो प्रेम का जो झुक नहीं पाया,
क्या नींद हो पहरेदार की जो सुत नहीं पाया,
या हो फूल पलाश का जो गुँथ नहीं पाया,

देख नहीं पाता कब खिलते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

मदहोश की हो भावना या होश का आधार हो,
ऋषियों की हो साधना या मनुज का अवतार हो,
या हो चंदा की अमावस, बेबसी का हार हो,
जो न प्रेमी बन सका, क्या तुम उसका प्यार हो,

पवन है शांत फिर भी हिलते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;
हर पल एहसास बने फिरते हो,
तुम कौन हो जो नहीं मिलते हो;

Sunday, August 28, 2011

आशा की किरण

सिआचेन ग्लेशियर से कुछ हज़ार फुट ऊपर,
ये एक फौजी चौकी है,
एक टेंट है, अधलेटा हुआ,
और उसमे है बैठा लांस नायक राम अधार,
हाथ में दूरबीन, बगल में रखी लोडेड इंसास रायफल,
सौ राउंड्स, एक स्लीपिंग बैग, स्नो बूट्स, एक स्टोव,
एक हाई फ्रिक्वेंसी रेडियो सेट, कुछ बर्तन, मिटटी का तेल,
कुछ काजू, बादाम भी, और कुछ बर्फीले कपड़े,
ये सब सजते हैं इस छोटे से टेंट में,
आज अट्ठाईस दिन हो गए नहाए हुए,
दाढ़ी किसी बाबा कि तरह बढ़ चुकी है,
बस तीन दिन और...
और फिर समतल ज़मीन दिखेगी,
वह एक अगस्त से ड्यूटी पर है,
बर्फ और बर्फ...सब तरफ बर्फ,
सूर्य यहाँ कभी क्यों नहीं दिखता,
अपने बटुए में से एक मुड़ी सी फोटो निकालता है,
और देखता रहता है अपलक,
बूढ़े माँ बाप, छोटी बहन, आँखों में प्रार्थना लिए पत्नी,
और एक फूल सी बच्ची,
सब हैं इस फोटो में,
अब आँखों में ज्वारभाटा नहीं आते,
बस चिंता सताती है,
कोई खबर नहीं आई,
दस दिन पहले हेलीकाप्टर आया था,
ऊपर से थैला गिराया था,
पर उसमे कोई चिट्ठी न थी,
बस काजू थे, और बिस्कुट थे,
दो डब्बे भी थे; भोजन के,
और एक डब्बा लड्डुओं का,
पंद्रह अगस्त का बड़ा खाना था वह,
पर चिट्ठी नहीं थी,
वह सब ऐसे ही पड़ा है,
उसे यहाँ भूख नहीं लगती,
बस चिंता सताती है....
माँ की आँख में मोतियाबिंद,
ऑपरेशन होना था,
शहर ले जाना था सरकारी अस्पताल में,
कैसे गए होंगे,
पिता के घुटनों का दर्द चलने नहीं देता,
गाँव से एक सरकारी बस चलती तो है,
पर अक्सर नहीं आती,
और अस्पताल में कर्मचारी,
कहते थे पाँच सौ दो,
तभी बेड मिल पायेगा,
कैसा सरकारी अस्पताल है....
अगले साल वो उन्हें जम्मू लाएगा,
और मिलिट्री अस्पताल में इलाज़ कराएगा,
क्या पिताजी को राशन मिल पाया होगा,
या फिर राशन वाले ने उल्टा बोला होगा,
और दो किलो चीनी कम तोला होगा,
क्या बहन का स्कूल अब भी बंद होगा,
या टीचर आ रहे होंगे,
कितना शौक है उसे विज्ञान का,
क्या वे उसे पढ़ा रहे होंगे...
और उसकी प्यारी सी बीवी,
क्या दिन भर चौका ही करती होगी,
क्या उसे अब भी गिला होगा,
जब मनीआर्डर मिला होगा,
क्या उसने बिटिया को टीका लगवाया होगा,
उसके लिए तो डॉक्टर,
गाँव में ही आता है हर शुक्रवार,
पर गाँव के सरकारी दवाखाने में,
अक्सर नर्स नहीं रहती,
कभी उसका इंतज़ार रहता है,
कभी दवाई नहीं रहती,
क्या पिता को ज़मीन की नक़ल मिली होगी,
कहते थे पटवारी दारु की बोतल मांगता था,
क्या बरसात होती होगी,
बीज, खाद, यूरिया...क्या सब मिला होगा,
या सहकारी दुकानों में,
बस ताश का दौर ही चला होगा,
क्या वकील ने मुकद्दमे की,
नई तारीख ली होगी,
या पट्टीदार से ही मिलकर,
कोई नई चाल चली होगी,
क्या ऐसा हुआ होगा...क्या वैसा हुआ होगा..
क्या...क्या...क्या....
ये 'क्या' की जिंदगी है,
क्यों कुछ भी निश्चित नहीं है,
क्यों आम जिंदगी रोज़ तकलीफ में पलती है,
और कितनी भी कोशिश कर लो,
क्यों सरकार की व्यवस्था नहीं चलती है...
वह फोटो वापस बटुए में रख देता है,
दूरबीन से टेंट की खिड़की से दूर तक देखता है,
कोई दुश्मन नहीं है...कहीं भी इस बर्फ के सिवा...
पर आज कुछ अलग है शायद,
ये आसमां कुछ खुला खुला सा है,
एक हलकी सी रोशनी....
ये कैसी सुबह है...कहीं सूर्य है शायद,
एक किरण कहीं से फूट कर बर्फ पर पड़ती है,
और बर्फ चाँदी की तरह चमकती है,
उफ़ ! कितनी ख़ुशी...सूर्य की एक किरण..और इतनी आशा,
ख़ुशी में अपना रेडियो सेट खोलता है,
आज वह पहले कोई गाना सुनेगा,
खुले मौसम में श्रीनगर स्टेशन पकड़ता है,
आज वो रिपोर्टिंग बाद में करेगा,
कोशिश करने पर रेडियो घर्राता है,
कोई शोर में कुछ समाचार बताता है,
कहता है, आज जनता जीती है,
सरकार झुकी है,
अब अच्छी हुकूमत का,
इंतज़ार बस थोड़ा है,
कोई अन्ना हजारे है,
जिसने अनशन तोड़ा है,


Friday, August 26, 2011

बारिश का ठहरा पानी है

ये छिटके पोखर जो दिखते,
मौसम की महज़ रवानी है,
आँखों की कोई कहानी नहीं,
बारिश का ठहरा पानी है;

भावों में अक्सर बहकर,
हम दुःख को बहुत जताते हैं,
उंगली इस पानी पर रखकर,
आँखों से बहा बताते हैं;

सही समझ शुभचिंतक भी,
कुछ दयाभाव दिखलाते हैं,
पर वो भी सोचें इसके दुःख,
क्यूं बारिश में ही आते हैं;

ऐसा अधिक नहीं चलता है,
एक समय वह आता है,
आँखों का बहता दरिया,
तब बारिश ही कहलाता है;

इसीलिए मेरे प्यारे जन,
व्यर्थ न ऐसे काम करो,
सहानभूति कि लालच में,
आँखों को न बदनाम करो;

Wednesday, August 24, 2011

छोड़ो अब चिंता दर्पण क़ी

अब भी विश्वास नहीं होता,
कि इतने वर्ष व्यतीत हो गए,
कल तक जो तुतली लोरी थे,
आज सुनहरे गीत हो गए;

अब भी संचार करे सावन,
अब भी एहसास करे है तन,
पाया हमने चाहे जितना,
अब भी कुछ आस करे है मन;

छोड़ो अब चिंता दर्पण क़ी,
या हाथ छोड़ते यौवन क़ी,
घटते या उजले केशों क़ी,
छोड़ो अब चिंता भेषों क़ी;

अब व्यर्थ न हाहाकार करो,
बस मन का अपने श्रृंगार करो,
तुम अब भी वही धुरंधर हो,
बस इस जीवन से प्यार करो...

Monday, August 22, 2011

गिर कर संभलती है

मेरे कानों से घुलकर जो कभी छम छम सरकती थी,
तेरे पायल की आहट, अब ज़रा दब कर निकलती है;

हया है, या है गम, या शायद इल्म है मेरे इरादों का,
जो थी मदहोश सांसें, अब ज़रा घबरा के चलती है;

जो बातें गेसुओं सी, राह में सरगम लुटाती थीं,
सुरों को खोजती सी, अब ज़रा खामोश रहती है;

मिलन के आस की बदरी, सांझ अक्सर भिगोती थी,
विरह की ज़ुल्म बारिश, अब ज़रा खुलकर बरसती है;

निकल जाती थी आँखों से जो पल में बिजलियों सी,
पलक पर रात भारी, अब ज़रा रुक कर गुज़रती है;

मेरी किस्मत है ऐसी, या समय मजबूरियों का है,
जो गाती थी दिशायें, अब ज़रा छिप कर सुबकती हैं;

मगर ये भ्रम न रखना, आइनों सा टूट जाऊंगा,
बड़ी जिद्दी शक़ल है, अब ज़रा फिर से संवरती है;

बहुत देखी हैं रातें, गम बहुत सा पी लिया नीरज,
मेरी फ़ितरत है ऐसी, अब ज़रा गिर कर संभलती है;


Thursday, August 18, 2011

on anti corruption movement led by anna hazare

बेफिक्र हम सोते रहे, और गालियाँ देते रहे;
सोचते थे कि एक दिन कोई रहनुमा आएगा,
अब तो जागो वरना गालियाँ भी न दे पाओगे,
कोई अन्ना रोज़ तुम्हे जगाने नहीं आएगा....
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न समय विराम का है, न समय विश्राम का है,
धूल उड़ती दिख रही है, ये समय संग्राम का है;
कोसते थे जिस प्रथा को, आज वह दुबकी पड़ी है,
हौसलों के सामने वो सहमी सी औंधी गिरी है,
चूक अब होने न पावे, बाँध लो अपनी कमर तुम,
भूल अब होने न पावे, कर दो मौके को अमर तुम,
दिख रहा है एक मंजर, संघर्ष आम इंसान का है,
खो लिया जितना था खोना, अब समय परिणाम का है.

Friday, August 12, 2011

आज फिर सूरज नहीं निकला

आज फिर सूरज नहीं निकला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,

कहीं भी न गरीब कि गुहारें दिखीं,
जहाँ तक देखा रेशमी फुहारें दिखीं,
कहीं तो न फ़िक्र कि उसका भीगता जूता है,
कहीं टीन की छत से अब भी पानी चूता है,
कहीं पर भीगा कोई अब भी सपन रोता है,
कहीं कोई बारिशों में ओढ़ चादर सोता है,
कहीं कोई छतरियों की ओट में निकला,
कहीं कोई चढ़ शिखर पर अंत में फिसला,

आज फिर सूरज नहीं निकला,
जैसे रह गया हो हिसाब कोई पिछला,



Wednesday, August 10, 2011

आधा ही हमने पाया है

बार बार ख्याल आता है,
कि कितना आधा हूँ मैं...
आधा मिथ्या,
आधा सत्य,
आधा ख्वाब,
आधा तथ्य,
आधा बच्चा,
आधा बड़ा,
आधा झुका,
आधा खड़ा,
आधा जवान,
आधा बूढा,
आधा अँधा,
आधा बहरा,
आधा अमीर,
आधा गरीब,
आधा खुश,
आधा दुखी,
आधा प्रेम,
आधा द्वेष,
आधा सफल,
आधा क्लेश,
आधा प्राप्त,
आधा हरण,
आधा जीवन,
आधा मरण,
किसी न किसी रूप में,
हम सब आधे हैं,
कोई जाने या न जाने,
हम जानते हैं,
किसी से कहें नहीं,
पर हम मानते हैं,
हमारी आज कि,
गतिविधि आधी है,
चाहे दोनों आँखों से देखें,
या दोनों कानों से सुनें,
पूरे का आभास देती,
ये दुनिया आधी है,
इसे आधी भी हमने बनाया है,
संस्कार और इच्छाओं के बीच,
सामंजस्य हमने बैठाया है,
जो अच्छा लगे वह अच्छा,
जो बुरा लगे झुठलाया है,
जो परेशान है करती,
यथार्थ नहीं वो काया है,
आधे के हैं भोगी हम,
आधा ही हमने सोचा है,
आधे को बस मन में रख,
आधा ही हमने पाया है...

Monday, August 8, 2011

कैसा न्याय है विधाता

लगातार बत्ती जलती रही,
छाया रहा अँधेरा,
पता ही न लगा,
कब भोर,
कब रात हुई,
जब भी आँख खुली,
बाहर बरसात हुई....

आसमां कैसा है,
पनाह देता है बादलों को,
और देखता है,
तरल होती है धरती,
हरी होती है परती,
आसमां कुछ नहीं पाता,
कैसा न्याय है विधाता....

ऐसा ही जीवन है,
किसी को निचोड़ देता है,
तो कोई सोख लेता है,
किसी पर गरजता है,
तो किसी पर बरसता है,
और कोई सबकुछ देकर,
उम्र भर तरसता है.....

प्रतीक्षा (written on 30-12- 1992)

एक चिथड़ा भी कितना बड़ा सुख हो सकता है यह मैंने उस रात जाना था I उस रात जब निर्मल वर्मा की उस किताब से मैं पल भर भी आँखें नहीं उठा सका था I सुबह उठा तो अनायास ही एक बेचैनी मन में समा आई थी I बाहर सब सफ़ेद था; वह आमों का बाग़, स्कूल जाने वाली पगडण्डी, लाल टीन की छत वाला मकान, कुछ भी नहीं दिखाई देता मकान के छज्जे से I सब तरफ कोहरा; सफ़ेद, धुंधला तैरता हुआ सा बेचैन कोहरा I कितना आश्चर्यजनक था कि जब मैं सोता रहा, तो कोहरा धीरे धीरे सिमटता रहा धरती कि छाती पर I
 'दृष्टि' अदृश्य वस्तुओं को देखने कि कला है, जिसका मेरे अन्दर सदा अभाव रहा है I कहीं से सूर्य कि एक किरण चीर देती है कोहरे को; लाल तीन कि छत कि रुपरेखा बह आती है वातावरण कि ढलान पर I बगल का कुआं अभी भी अदृश्य है; मौन, निश्तब्ध क्योंकि बाल्टियों कि खडखडाहट कहीं से भी सुनाई नहीं पड़ती I आज भी वह छोटी लड़की खड़ी होगी फुटपाथ पर, बस्ता लेकर साथियों कि प्रतीक्षा में; 'प्रतीक्षा' अंतहीन और निरंतर......!
कोहरा शायद थक गया है क्योंकि भागने लगा है; थकने के बाद भागना मुझे मुश्किल प्रतीत होता है I जो दूसरों के लिए आसान होता है वो सदा मुझे मुश्किल क्यों प्रतीत लगता आया है ? गेहूं के हरे पौधों पर ओस कि बूंदें एक मृगतृष्णा सा भ्रम देती हैं आँखों को; ....फिर वह नज़र आती है जिसे मैं रोज़ देखता हूँ कुएं पर; वह मुझे छज्जे पर खड़ा देखती है और आँखें नीची कर पानी भरने लगती है I अचानक लगता है जीवन फिर चलने लगा है; उत्सुक परन्तु थोड़ा सा आतंकित.....! बच्चों की भीड़ पगडण्डी पर उतर आती है; ये अब स्कूल जायेंगे और रास्ते में आंवले की बाग़ से भरपूर आंवले तोड़ेंगे; कुछ को खायेंगे, कुछ से खेलेंगे I कोई दांत दे तो गाली अलग से सुने I तब वह काया उतर आती है कुएं के चबूतरे से; कमर में गगरी और एक हाथ में बाल्टी; एक दौड़ती सी नज़र ऊपर आती है और फिर गड़ जाती है ज़मीं पर, मगर खिसकती रहती है I पानी और शर्म के बोझ तले वह निगाह सरकती जाती है और मुझे पुनः इंतज़ार रहता है अगली सुबह का I
जाड़ा...और जाड़ा ! रात भर का सिकुड़ा शरीर जब सुबह थोड़ा फैलता है तो अदभुत जान पड़ता है; कैसे सिकोड़ लेते हैं हम इतने बड़े शरीर को चंद चीथड़ों में; शाम होते ही...सवेरे तलक I जाड़े की धूप से प्यारी वस्तु शायद आशायुक्त असफलता ही होती है,; ऐसा मेरा सोचना है I हल्की सी धूप अलसाई आकृतियों पर उभर आई है; फिर वह तीन मिटटी के घड़े दिखाई देते हैं ; लटके हुए आम के पेड़ पर...प्रतीक्षा करते हुए I आज भी इन्हें ऐसे ही झूलते रहना है I कल इन्हें फोड़ दिया जाएगा और साथ ही समाप्त हो जायेगी तीनो बेटों की डयूटियां मरे हुए पिता के प्रति I वह व्यक्ति जो बहुत बड़ा पहलवान हुआ करता था, कितना बेबस था मृत्यु के समय ! आँखें सब गीली थीं; कुछ चिंता से, कुछ राहत से I कभी कभी किसी के मर जाने से कितनी राहत मिलती है, यह मैंने उस दिन महसूस किया था I  अग्नि में समा गया था वह हड्डियों का ढांचा नब्बे सावन झेलने के बाद :   बिना किसी प्रतिरोध के, मानो इसी की प्रतीक्षा थी I
अचानक दिन भागने लगा है; खेत सींचता वह किसान, घास काटती वह लड़की और उपले बनती वह स्त्री, सब देखते हैं इस भागते हुए दिन को I मैं छज्जे से उतर आटा हूँ पर सोचता रहता हूँ उन लटके हुए मटकों के बारे में; और उस सरसराती निगाह के बारे में जिसका मुझे पुनः इंतज़ार रहेगा I
भूल जाता हूँ उस जाड़े की रात जब एक किताब लेकर कई घंटे लालटेन को कष्ट पहुँचाता रहा और फिर उसे यूँ बुझा दिया जैसे यह मेरा हक़ था; बरबस, क्रूरता से I
दिन चढ़ आया है और मैं उन कारीगरों और मजदूरों को देखता हूँ, जो मेरा मकान तैयार कर रहे हैं I उनके लिए हर दिन एक सा है ; ईंट, सीमेंट, रेत और मिटटी; और उनके बीच दबी दो रोटी और अचार, या शायद एक प्याज....I इनकी प्रतीक्षा रोटी की बुनियाद पर तैरती है I ईंट से ईंट जुड़ते देखता हूँ और वर्षों से कहीं दिल में छिपी प्रतीक्षा को मुस्कुराते देखता हूँ I हर ईंट पड़ोसियों के कलेजे पर भी पड़ते देखता हूँ और बरबस एक दुःख मिश्रित हंसी होठों को घेर लेटी है I सब बेकार लगता है; बाजरे की फसल की तरह जो खेतों में ही सूख रही है और जिसे अब भी प्रतीक्षा है कट जाने की I  कब तक ! आखिर कब तक इंतज़ार रहेगा; सुबह तो रोज़ आएगी; कभी धुंधली तो कभी भीगी हुई I  अनायास पुनः सब भागने लगता है; आँखों के सामने I कुँए पर बाल्टियों की खडखडाहट, कोहरे को चीरता वह आमों का बाग़, लाल टीन की छत, वह छोटी लड़की, फुटपाथ पर खड़ी हुई, बस्ता संभाले....प्रतीक्षा करती हुई............I  
Neeraj   30 December 1992

Sunday, August 7, 2011

तुम मेरे दोस्त हो शायद

तुम मेरे दोस्त हो शायद,
दोस्त ही होगे...
वरना तुम क्यों बार बार मेरा हाल पूछते,
क्यों मेरी उखड़ी साँसों को सींचते,
क्यों तुम अपना नहीं बताते,
क्यों मेरा सुन कर पछताते,
क्यों आँखों से मेरे बहते,
क्यों नींदों में मेरे जगते,
क्यों तुम मुझको देते दिलासा,
जब तुमको भी नहीं थी आशा,
क्यों तुम इतना समय गंवाते,
संग मेरे बच्चे बन जाते,
क्यों तुम मुझ पर गुस्सा करते,
दूर चले जाओगे, कहते,
पर तुम कहीं नहीं जाते हो,
नैन बंद, नज़र आते हो,
जब की लहू भिन्न है मुझसे,
सोचूं क्या रिश्ता है तुझसे,
तुम मेरे दोस्त हो शायद,
दोस्त ही होगे...

Thursday, August 4, 2011

सपनों से सपनों तक

मुझे आज भी नहीं भूलें हैं चंडीगढ़ के वे दिन जब पिताजी मुझे गाँव से वहां ले गए I उद्देश्य था मेरी शिक्षा I यूँ तो मैं गाँव की पाठशाला में भी कुछ दिन पढ़ा था, पर उसकी यादें अब काफी धूमिल पड़ चुकी हैं I एक तख्ती, दुद्धी (सफ़ेद स्याही) और सन की बनाई कलम लेकर क, ख, ग पढना सीखा था मैंने गाँव में I पर मेरे पिताजी घर में सदा ए, बी, सी पढाया करते I एक नन्हा सा दिमाग अचरज करता कि पाठशाला और घर की पढाई में ये अंतर क्यों है ? गाँव की पाठशाला में हमें दोपहर को कुछ खाने को मिलता I मुझे ठीक से याद तो नहीं कि वो क्या था पर उसकी शक्ल कुछ कुछ साबूदाने सी थी I हम बच्चे कतार में बैठ कर अपनी रूमाल या कोई कपड़ा या  कभी कभी बनियान सामने बिछा देते I फिर एक बंद मुट्ठी उस पर खुल जाती और हम बड़े चाव से उन दानों को खाते I एक दिन मैं रूमाल भूल गया और उस चाइनीज़ डिश को अपनी छोटी सी अंजुलि में लेते वक़्त उसके कई दाने नीचे गिर गए, जिसका मुझे काफ़ी दिनों तक अफ़सोस रहा I  एक दिन मेरी तख्ती किसी ने चुरा ली और मैं और दीदी दोनों रोते हुए घर लौटे I शायद हम वस्तुओं कि कीमतें आंकना जानते थे उन दिनों I ख़ैर इसके सिवाय मुझे कुछ याद नहीं I

हमने पाठशाला भी कहा, विद्यालय भी और स्कूल भी, जो भी आसान सा लगे I चंडीगढ़ आने के पश्चात् मुझे पता चला कि मुझे स्कूल में पढने जाना पड़ेगा I सुबह सुबह जब मैं पार्क में फिसलन पट्टी पर झूलता, तो सोचता कि यदि एक ऐसा झूला गाँव में होता तो क्या मज़ा आता I मैं छोटे बड़े बच्चों को एक सी पोशाक पहन बस्ता लिए स्कूल जाते देखता और सोचता कि इनकी पाठशाला में निश्चय ही कुछ अच्छा खाने को मिलता होगा I बचपन में पढाई के मायने अलग होते हैं I एक दिन पिताजी मुझे काफ़ी समझा बुझा कर एक स्कूल में ले गए I मेरा एडमिशन टेस्ट होना था I उस स्कूल की सारी दीवारें लाल थीं, हर खिड़की पर चमकीले शीशे लगे हुए थे, और इतने सारे फूल लगे थे की मन करता कि इन सब को तोड़कर गाँव में सरसों के खेतों में फेंक  दूँ I फिर उसमे भी रंग बिरंगे फूल हो जायेंगे; उन अनगिनत पीले फूलों के बीच I मुझे गाँव कि पाठशाला याद आई जहाँ एक बड़े पेड़ के नीचे हम सभी अधनंगे बच्चे बैठकर  क ख ग इतनी ज़ोर से चिल्लाते थे मानो लगता था आकाश धरती पर आ जाएगा I सहसा मेरे इंटरव्यू का नंबर आ गया और मुझे एक कमरे में धकेल दिया गया जहाँ स्लीवलेस ब्लाउज और चमकदार साड़ियाँ पहने दो महिलाएं बैठी थी जिन्हें टीचर कहते हैं I वो काफ़ी देर तक मुझसे प्रश्न करती रहीं और मैं चुपचाप खड़ा उनकी अवहेलना करता रहा I न मुझे उनकी भाषा समझ आती, न उन्हें मेरी I अजीब स्थिति थी; ख़ैर मैं उस  इंटरव्यू  में फेल हो गया और पिताजी ने अपना सर पीट लिया I औलाद न होने से बदतर है नालायक औलाद होना I उस समय मैं कोई पांच वर्ष का था I

कुछ दिनों बाद ही मेरा एडमिशन केंद्रीय विद्यालय सेक्टर ३१ में हो गया I यह कैसे हुआ ये तो मुझे याद नहीं पर इतना अवश्य था कि बिना नर्सरी और  के.जी पढ़े मैं सीधा पहली कक्षा में जा बैठा था I आजकल ऐसा होना अत्यंत दुर्लभ है I ज्ञान अर्जित करने हेतु कितना अधिक कम्पटीशन है ; लोअर के.जी से लेकर पी.एच. डी तक I स्कूल में जाते ही मेरी कायापलट हो गयी I पहले दस दिनों तक तो पता ही न चला कि क्या हो रहा है I मेरी ग्रामीण माँ रोज़ प्रातः मुझे नहला कर, साफ़ कपडे, काले चमकते जूते पहनाकर, ढेर सारा काजल लगाकर और मुहं पर पाउडर पोतकर स्कूल भेजती और गर्व करती कि मेरा लड़का कितना सुन्दर और साफ़ है I जब जब मैं अपनी पहली कक्षा कि ग्रुप फोटो देखता हूँ, बरबस एक हंसी आ ही जाती है I मैं एकदम आगे बैठा हूँ, तनकर, क्योंकि वह कैमरा मेरे लिए कोई जादू के पिटारे से कम आश्चर्यजनक वस्तु न थी I बिलकुल छोटे बाल जैसे उनके बढ़ने पर टैक्स लगा हो; काजलयुक्त आँखें, और एक चेहरा जिसका यदि कोई 'तेज़' है तो पाउडर ने ढक रखा है I ऊपर से उज्जवल, साफ़ पोशाक I यदि माँ का वात्सल्य तस्वीरों में झलकता है तो यह फोटो एक सजीव उदाहरण है I क्या हुआ जो उस माँ ने कभी स्कूल नहीं देखा या कभी शहर में नहीं रही ; अपने सीमित दिमाग से उसने अपने बेटे के लिए जो भी सोचा और किया वह स्वयं में एक बहुत बड़ी उपलब्धि न होते हुए भी अत्यंत मर्मस्पर्शी व वात्सल्यपूर्ण है I मन तो करता है कि उस फोटो को माँ के सामने रखूं और कहूँ कि ; माँ ये मैं नहीं तुम हो I पर मैं ऐसा नहीं करता क्योंकि अपने आसपास के लोगों कि बातों से मैं महसूस करता हूँ कि अब मैं बड़ा हो गया हूँ I पर क्या माँ से भी बड़ा हो गया हूँ !

चंडीगढ़ में मैं तीन साल पढ़ा I मेरे घर के सामने मेरे ही क्लास कि एक लड़की रहती थी; उर्मिला I कभी कभी जब खिड़की के पास बैठकर मैं होमवर्क करता तो वो मुझे अपने घर की खिड़की से चिढ़ाया करती I मुझे बहुत गुस्सा आता और मैं उसे गाली देता; 'साली' ! शहर में सीखी यह मेरी पहली गाली थी I सात बरस की उम्र में मैंने यह लफ्ज़ कहाँ से सीखा, यह तो मुझे याद नहीं पर उस समय यह एक गन्दी गाली हुआ करती थी I स्कूली बच्चों के बीच इस गाली का एक ख़ास महत्व था I आजकल गालियों में भी काफ़ी उन्नति हो गयी है I परिवर्तन प्रकृति का नियम है I फिर चाहे वह अच्छा हो या बुरा; हमें इससे क्या ? हम तो सहज भाव से कह देते हैं; ज़माना बदल गया है I इतनी बड़ी कर्त्तव्यहीनता क्या किसी और प्राणी में देखी जा सकती है ?

तीसरी कक्षा में मैं स्कूल में प्रथम स्थान पर रहा I यह एक चमत्कार से कम कुछ भी नहीं था I मेरे माता पिता बहुत खुश थे I अपने बेटे के उज्जवल भविष्य के सपने का पहला सकारात्मक कदम महसूस किया था उन्होंने I बीस साल तक माँ बाप यूँ ही सपनों को टूटते और जुड़ते देखते रहते हैं I बाद में यदि सपना साकार हो जाता है, तो बेटा कमाने विदेश चला जाता है, या लव  मैरिज कर कहीं सेटल हो जाता है I यदि सपना टूट जाता है तो बाप खिलाता है बेटे को, जब तक बाप की हड्डियाँ गल नहीं जाती I कितना सरल है यह सब I

चंडीगढ़ से मेरे पिताजी का स्थानांतरण हैदराबाद हो गया I चौथी, पांचवी और छठी कक्षा मैंने एयर फोर्स अकादमी से उत्तीर्ण की I इस स्कूल की यादें हालाँकि इतनी ताज़ी नहीं है, लेकिन फिर भी यहाँ बिताया समय मेरे आने वाले जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा I चंडीगढ़ छूटने के साथ ही मेरा क्लास में प्रथम स्थान भी छूट गया I मैं क्लास में पांचवे या छठे स्थान पर रहता और संतुष्ट भी रहता I दयनीय है वह विद्यार्थी जो अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट रहता है I यहीं पर मैंने क्रिकेट खेलना शुरू किया I हर छुट्टी में मैच खेलते; अक्सर जीतते, हारने लगते तो झगडा कर लेते I हार से बचने के लिए कोई अच्छा बहाना तो चाहिए ही था I यहीं मैंने अपने जीवन का पहला नाटक किया I स्कूल के प्रोग्राम में वह नाटक खेला गया और उसमे मेरा छोटा सा रोल था I एक परिवार का स्कूल जाने वाला एक बच्चा जिसे स्कूल ड्रेस की नेकर नहीं मिल रही I वह और उसके सात भाई बहन इकलौती माँ को परेशान कर रहे हैं; अपनी अपनी समस्याओं से I मुझे वह नाटक इसलिए अच्छा लगा क्योंकि उसमे कई बच्चे थे और बहुत हल्ला गुल्ला था I तब मुझे फॅमिली प्लानिंग के माने पता नहीं था I

इसी स्कूल में मैंने एन सी सी ज्वाइन की I उस समय बड़ा मज़ा आता जब परेड करने के बाद समोसे खाने को मिलते I हैदराबाद में मुझे जो सबसे अच्छा काम लगता था, वह था पतंग लूटना I वहां पतंगें खूब उड़ती और कटती I लगभग दस दिन असफल होने के बाद एक पतंग मेरे हाथ लग गयी और मैं उसे दो दिनों तक उड़ाता रहा I कहीं अगल बगल यदि पतंग उड़ते देखता तो फ़ौरन अपनी पतंग नीचे उतार लेता, इस डर से की कहीं मेरी पतंग कट न जाये I दस दिनों की मेहनत पर यूँ ही पानी नहीं फेरना चाहता था मैं I फिर एक दिन मैंने दो लड़कों के साथ मिलकर मांजा बनाया I कांच को पीसकर लेई के साथ मिलाकर धागे पर उसका लेप किया I अब मैं पतंग उड़ाने के लिए तैयार था I पहली ही लड़ाई में मेरी पतंग कट गयी और अपलक मैं देखता रहा अपनी मेहनत और ख्वाबों को लुटते हुए I उसके बाद मैंने पतंग कभी नहीं उड़ाई I हाँ, अक्सर बैठकर पतंगों को कटते और काटते देखता रहा I हिम्मत और मेहनत कहीं दुबकी पड़ी थी और इसका मुझे एहसास था I

यहाँ मैंने कई खेल खेले I गिल्ली डंडा, कंचे से लेकर क्रिकेट और फुटबाल तक I एक बार फुटबाल मेरे पेट पर लगी और कुछ पल के लिए मेरी सांस ही बंद हो गयी I मुझे लगा की यही अंत है ; मुझे वहां जाना है जहाँ धरती और अंबर मिलते हैं ; जहाँ धरती समाप्त हो जाती है I पर ऐसा न हुआ I मैं जीवित रहा और मैंने कई उम्मीदों को जीवित रखा I यहीं मैंने साईकिल चलाना भी सीखा I कई दिनों तक अपनी इस उपलब्धि पर मैं गर्व करता रहा I एक दिन मैं साईकिल समेत गिरा और अपनी उन चोटों को घर में छिपाने की असफल चेष्टा करता रहा जो एक अँधा भी पहचान सकता था I फिर यहाँ तो मेरी माँ थी; मेरे खुशहाल जीवन की शुभचिंतक I मैं चोटें खाता रहा और माँ उन्हें ठीक करती रही I फिर एक दिन मैं वह स्कूल, पतंग, एन सी सी सब छोड़ कर अपने माँ बाप भाई बहन के साथ बागडोगरा आ गया I

बागडोगरा बंगाल में एक छोटी जगह है सिलीगुड़ी के पास I अपने आप में यह छोटी जगह एक समूचा विश्व है; अनोखा और चमत्कारिक I यहाँ की तीस प्रतिशत जनसँख्या नेपालियों की है I किसी भी गली मोहल्ले से गुजरते वक़्त यदि बैंजो वाद्ययंत्र की धुन कानों को छेड़ दे तो निश्चित ही वहां नेपाली रहते होंगे I मुझे वहां दाखिला मिला केंद्रीय विद्यालय बेंगडुबी में, जो की एयर फोर्स स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर दूर था I आरम्भ के पांच छः महीने हम एयर फोर्स स्टेशन के बाहर रहे, किराये के मकान में I एक कमरा और किचन समेत समेत बंगला था वह जिसमे हम पांच प्राणी अडजस्ट करते थे I यह मकान पूरी तरह से लकड़ी का बना हुआ था और उसे ठोंक बजाकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता था की इसकी मरम्मत अगले हफ्ते करनी होगी या अगले महीने I जो भी हो यह हम बच्चों की चिंता का विषय नहीं था I मैं वहां खुश था I मकान मालिक के यहाँ नया नया टी वी आया था और माँ के मना करने के बावजूद मैं अक्सर चोरी छिपे खिड़की के परदे को थोड़ा सा हटाकर उस अद्भुत मानवीय आविष्कार को देखा करता जो आज निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों का फैमिली मेम्बर बन चुका है I हमारे घर के पीछे एक छोटी सी नदी थी; मेरी उत्सुकता का प्रमुख केंद्र I अक्सर मैं उसमे नहाता और मछुआरों को बड़े बड़े जालों में मछलियाँ पकड़ते देखता I वहां जीवन बहुत शांत और स्वच्छ था; उस नदी के शांत बहते पानी की तरह I
स्कूल ले जाने के लिए रोज़ एयर फोर्स की बस आती I यह स्कूल काफ़ी बड़ा था और इसकी बिल्डिंग बहुत ही आकर्षक I इस स्कूल में गुज़ारा समय मैं कभी नहीं भूल सकता I यहाँ मुझे पूरी छूट थी I घर स्कूल से बहुत दूर था I अक्सर हम सहपाठी मध्यान की घंटी बजते ही बाहर भाग जाते और पास ही के सिनेमा हॉल में पिक्चरों के पोस्टर देखते I या फिर घास पर बैठ कर लंच करते; और उन चीलों को भी कराते जो हमारे सर पर मंडरा रहे होते I मजाल थी की कोई रोटी का टुकड़ा ऊपर फेंक दो और वह वापस धरती पर आ जाये; यदि न्यूटन ने देखा होता तो पागल हो जाता I सातवीं कक्षा में मैं तीसरे स्थान पर रहा और खुश होकर मेरे क्लास टीचर मिस्टर मालिक ने मुझे एवं दो और विद्यार्थियों को पुरस्कार स्वरुप एक एक फोंटेन पेन दिया I वह पेन काफ़ी दिनों तक मेरे साथ रहा I कुछ सालों बाद एक बार संगम पर नाव में सैर करते वक़्त वह पेन पानी में गिर गया और उसके साथ ह बह गयी वो यादें जो एक शिक्षक ने छोड़ रखी थी एक विद्यार्थी के दिल में I इस स्कूल में मैंने कई खेल खेले; पर हमारा मन पसंद खेल था गैलरी I यह खो खो से मिलता जुलता एक खेल है पर यह स्कूलों को छोड़ कर और कहीं नहीं खेला जाता I इस स्कूल में मैं आठवीं कक्षा तक पढ़ा I बागडोगरा की यादें मेरे अन्दर अभी तक ताज़ा है I ढेर सारे पहाड़ी पिकनिक स्थल, छोटी छोटी पहाड़ी नदियाँ, उनमे से पकडे हुए केकड़े, धारा के बहाव के उल्टा तैरती हिल्सा मछलियाँ, नेपाल के रास्ते का वह जंगल और उसमे रहता हाथियों का झुण्ड, वो चीता जिसे आदिवासियों ने पकड़ कर स्कूल के आस पास घुमाया था, सब याद है मुझे I बागडोगरा का वह हाट (बाज़ार) जहाँ एक रुपये में तीस नीम्बू मिलते थे और इतने ही पैसे देने पर सात अन्नानास के फल, क्या कभी भुलाया जा सकता है I कुल मिलाकर वह एक ऐसी जगह थी जिसके बारे में  लिख पाना मेरे लिए अत्यंत मुश्किल है I  कुछ जगहों को मात्र अनुभव किया जा सकता है और बागडोगरा उनमे से एक है I फिर एक दिन वह सब छूट गया I ट्रेन में बैठा हुआ मैं हरी घाटियों को पीछे छोड़ता गया I बेचैन मन यह महसूस कर रहा था की वे नदियाँ अब भी बह रही होंगी, दोस्त अब भी केकड़े पकड़ रहे होंगे, नीम्बू रुपये में तीस बिक रहे होंगे या शायद उससे भी ज्यादा, हाथी अब भी झुण्ड में निकलते होंगे; बस मैं उन सब को देख नहीं पाउँगा I मैं बहाव के उल्टा जा रहा था; हिल्सा मछली की तरह I उदास मन से मैं तब तक बागडोगरा के विषय में सोचता रहा, जब तक मैं उस नयी जगह नहीं पहुँच गया I उस जगह को देखते ही मुझे पता चल गया की यहाँ मेरा भविष्य लिखा जाएगा I माँ बाप के सपने भी शायद यहीं टूट जाएँ I और भी शायद बहुत कुछ यहीं होगा I जगह का नाम कुछ अटपटा सा था; ' कलाईकुंडा '  I  

बंगाल में ही खड़गपुर से लगभग बारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है एयर फोर्स स्टेशन कलाईकुंडा I यूँ तो यहाँ देखने लायक कुछ नहीं है पर वह व्यक्ति जो दृष्टि रखता है, उसके लिए यह जगह किसी रोम, परिस या लोस अन्जेलिस से कम नहीं है I दृष्टि, जैसा की मैंने अपने किसी लेख में लिखा था, अदृश्य वस्तुओं को देखने की कला है I गार्ड रूम से शुरू होती सड़क, जिसे हम माल रोड कहते थे, दूसरे छोर तक जाती है I इसी के अगल बगल घर, सिनेमा हॉल, स्विम्मिंग पूल, ऑडिटोरियम, अस्पताल, दुकानें सब हैं I यह माल रोड शिमला की माल रोड से किसी भी मायने में कम नहीं है I इसके किनारों पर व्याप्त जीवन हर समय और ख़ास कर के शाम को उमड़ पड़ता है इस सड़क की लम्बाई पर I गार्ड रूम से बाहर भी घर हैं, काली मंदिर की तरफ, या फिर आशु कैंप, छोटे से रेलवे स्टेशन से चिपका हुआ; सब तरफ फौज़िओं का वास है I गार्ड रूम से निकलते हुए ही स्कूल है I यहाँ दो स्कूल हैं; एक कैंप के बाहर और दूसरा अन्दर I बाहर वाले स्कूल में मेरा एडमिशन नवीं क्लास में हो गया I स्कूल की बिल्डिंग काफ़ी पुरानी थी, पर साथ में एक नई बिल्डिंग भी लगभग तैयार हो गयी थी I ये अलग बात है की उसमे पढने के लिए दो साल का इंतज़ार करना पड़ा I

इस जगह ने मुझे सब कुछ दिया; दोस्त, सफलता, असफलता, दुःख, सुख, आशा, निराशा और प्यार I यहाँ बिताये दिन मैं कभी नहीं भूल सकता I आज यदि किन्ही लम्हों को पुनः जीने की आकांशा उठती है, तो निश्चित ही यहाँ गुज़ारे पल हैं I जंगलों में घुस कर बेर तोड़ना, किसी के घर में लगे आम या अमरुद उड़ा लेना, पढने के बहाने जाकर क्रिकेट खेलना या देखना अथवा सब्जी बाज़ार से गन्ने या नारियल चुरा लेना; आज अपने आप में ये कार्य कितने ही तिरस्कृत क्यों न लगें, एक समय था जब मैं इन्हें पूरी निष्ठां और लगन से किया करता था I और उस समय मैं खुश रहता था I काम चाहे अच्छा हो या बुरा, सफलता मिलने पर ख़ुशी होना स्वाभाविक है I यही कारण था कि चाहे किसी के पेड़ के पपीते कच्चे ही क्यों न हों, हमें बड़े मीठे लगते I

स्कूल भी अजीब था I  अभी कुछ ही दिन हुए थे कि स्कूल में हड़ताल हो गयी I प्रिंसिपल व किसी टीचर में झगड़ा हो गया था I महिना भर स्कूल बंद रहा और हम बच्चों कि किस्मत खुली रही I फिर एक दिन अचानक पता चला कि समझौता हो गया है और स्कूल खुलने वाला है I मेरे लिए अब तक सुनी सब से बुरी ख़बरों में यह एक थी I नवीं कक्षा पास करने के बाद मेरे कई दोस्त बने इआज उनमे सुकेश, राजेश और सुपर्णा ही हैं जो उन दिनों कि याद को ताज़ा कर पाते हैं I यूँ तो और भी हैं जो अब तक संपर्क जोड़े हुए हैं, पर उनमे वो गुज़रे दिन नहीं झलकते I शिखा हालाँकि आज भी शुभचिंतक और निश्चल है पर उसे मात्र पत्रों के ज़रिये महसूस करना मुश्किल है I विज़ु बाईसवीं सदी कि लड़की है और मुझे दुःख है कि समय से पूर्व इस प्राचीन दुनिया में उसकी आधुनिकता का टेलेंट वेस्ट हो रहा है I अमित, सुब्रोतो, ज्योति, अर्पण, दिनेश, राकेश, जयश्री ऐसे न जाने कितने नाम रास्ते में ही खो गए I जब पुनः कोई मिला भी तो हमारे रास्ते अलग दिशाओं में जाते थे I

दसवीं कक्षा में मैं स्कूल में तीसरे स्थान पर रहा और मेरे माता पिता और टीचरों ने भी मेरे अन्दर एक उज्जवल भविष्य देखा I कुछ तो इस हद तक कह गए कि यह लड़का अद्वितीय है I पढाई और खेल के अलावा भी एक सम्पूर्ण मानव में जो खूबियाँ होनी चाहिए वो इसमें हैं I या तो वे सब मूर्ख थे जो ऐसा कह गए, या मैंने अपने गुणों को उस कोण से नहीं देखा जहाँ से वे देखते थे I आने वाले दो सालों में मेरे दो प्रेम प्रसंग हुए I यूँ शुद्ध हिंदी में इन्हें लव अफैर्स कहते हैं I आज ये मेरे लिए पुरानी बातें हैं, पर उन दिनों ये मेरी साँसे थीं I हो सकता है वो धीमी और उखड़ी हुई ही साँसें हों, पर निश्चित रूप से मैं उनमे जी रहा था I अस्सी योनियों के बाद भी यदि मुझे पुनः मानव आकृति प्राप्त हुई तो मैं उन घड़ियों को अनगिनत बार जीना चाहूँगा I चाहे प्रत्येक बार इसी तरह असफल क्यों न होना पड़े I कम से कम उतने समय एक आशा तो थी; हलकी सी ही सही पर विश्वास कि मज़बूत बुनियाद पर टिकी हुई I

बाराहंवी क्लास तक पहुँचते पहुँचते मेरी पढाई चौपट हो चुकी थी I नतीजा यह हुआ कि बारहंवी कक्षा में मैं एक विषय में फेल हो गया I स्कूल कि रिज़ल्ट की भाषा में इसे 'कम्पार्टमेंट' कहते हैं I 'फेल' और 'पास' के बीच का वह सत्य, जिसमे न प्रोत्साहन है और न ही सहानुभूति, और जिसे धोने के लिए पुनः उसी विषय का इम्तिहान देना पड़ता है, जो इस रिज़ल्ट का कारण है I यदि मैंने जीवन को बहुत पास से देखा है तो अवश्य उन दिनों ही था I माँ चुप रहती जैसे मौन व्रत हो, पिताजी की अवस्था अचानक ही बीस साल अधिक लगने लगी, टीचर ऐसी त्रिअस्कृत निगाहों से देखते मानो उनका प्रमोशन मेरे कारण रुक गया हो, दोस्त वहां थे ही नहीं, जो थे उनकी पहचान हो गयी I कोई यह न कहता की क्या करो; सब यही कहते की क्या कर दिया ; और समय लगता था तब रुक गया हो I चार साल का आनंद एक ही पल में याद आ गया मुझे I दोस्त, सफलता, असफलता, दुःख, सुख, आशा, निराशा, प्यार सब खोखले लगने लगे I मुझे लगा की मुझे स्वयं से घृणा हो गयी है I जब सपने टूटते हैं तो आवाज़ नहीं करते; और शायद इसीलिए ज्यादा चोट करते हैं I मुझे वह समय भी याद आया जब एक तख्ती लेकर उस पर काला रंग पोतता रहता था ताकि सफ़ेद स्याही और सफ़ेद दिखे I वहां से यहाँ तक का सफ़र काफ़ी लम्बा था पर मुझे अफ़सोस रहा कि इतना लम्बा रास्ता तय करने के बाद भी मैंने स्वयं को वहीँ खड़ा पाया जहाँ तेरह साल पहले खड़ा था I यदि यह स्थिरता का उदहारण नहीं है तो विश्व में कुछ भी स्थिर नहीं है I

आज यदि मुझे अपनी इस स्कूल लाइफ के अंतिम चरण को पुनः जीने का मौका मिले तो मैं निस्संकोच जिऊंगा I ऐसा इसलिए कि उस समय मैंने एक कायरता का परिचय दिया था जिसे मैं सुधारना चाहता हूँ I मैंने किसी तरह  बाराहंवी पास कि थी और वायु सेना में भारती हो गया था I हार कर नहीं, झुंझला कर I यूँ कहने को तो मैंने नौकरी कर ली थी पर आज भी साधे पांच साल बाद मैं यह जानता हूँ कि मैं तब भाग खड़ा हुआ था जब मुझे टिक कर लड़ना था I

लगभग एक महीने पश्चात् मेरा विवाह होना तय हुआ है I कुछ समय बाद मैं भी अपने बच्चों के लिए सपने देखूंगा ; वैसे ही जैसे मेरे माता पिता मेरे लिए देखते आये हैं I 'सपनों  से सपनों  तक' के इस सफ़र में यदि मैं स्वयं से प्रश्न करता हूँ कि मैंने क्या पाया तो उत्तर मिलता है 'कुछ नहीं' I पर शायद मुझसे उम्मीद रखने वालों ने बहुत कुछ खो दिया है I या तो मैं दोषी हूँ या फिर उम्मीद करना एक पागलपन है I यदि दूसरी बात सत्य है तो इसमें कोई शक नहीं कि यह दुनिया एक बहुत बड़ा पागलखाना है , जहाँ सब उम्मीद में जीते हैं I आशा और शंका के बीच सिकुड़कर I श्रृष्टि क्रम टूटे नहीं इसलिए इस सफ़र को यूँ ही चलना है I " सपनों से सपनों तक " I

                             
                                               neeraj tripathi (written on 03 May 1993, about a month before my marriage)
                                                                              

Monday, August 1, 2011

कोई भी नहीं बेदाग़ यहाँ

क्यों टूट गया कोई धागा, भाषा में क्या कड़वाहट थी,
बोझिल नैनों में क्यों जागा, परिचित सी कोई आहट थी,
अब भी पदचाप सुने है मन, अब भी सिसकारी भरता है,
रहते हैं जिंदा स्वप्न मगर, एहसास रोज़ इक मरता है,
इस कलयुग में द्वापर युग के तुम भाव कहाँ से लाओगे,
अब रोज़ हरण होती सीता, तुम कितने राम बनाओगे,
नकली चेहरों के दर्पण से, गाते हैं नित इक राग नया,
पर सच कहता हूँ उनमे से कोई भी नहीं बेदाग़ यहाँ,
दिल ढूंढे है फिर उनको ही जो प्रेम सुधा बरसाते थे,
बेशक वो थोड़े गूंगे थे पर गीत हमारे गाते थे,
वह कितने निश्चल रिश्ते थे, खुद ही  बन जाया करते थे,
तब भाव हमारे सच्चे थे, हम ह्रदय से गाया करते थे,
देखो कुछ दिल के कोनों में, अब भी जीवित हैं भाव वही,
कुछ त्यागो मोह, विलासा को, कुछ जी लो जीवन कभी कभी.


Sunday, July 31, 2011

ज़रा मुश्किल है

ज़रा मुश्किल है,
पर संभव है,
भटके वादों में,
बिखरी यादों में,
उलझे रस्तों में,
बंद पड़े बस्तों में,
सूखी आँखों में,
बुझती साँसों में,
बहकी बातों में,
जगती रातों में,
खिलखिलाकर हँसना,
ज़रा मुश्किल है,
पर संभव है.

inspired by Neeraj Mala Sharma's creation,चलना ही है काम निरंतर.

तुम चलते हो तेज़ मैं आगे धीरे थोड़ा बढ़ता हूँ,
तुम पहुंचे फुनगी पर, मैं डाली डाली चढ़ता हूँ,
तुझमे मुझमे थोड़ा सा स्वाभाविक है गति का अंतर,
चलना ही है काम निरंतर.

न ही कविता सार बचा अब, न ही बचा कोई भवसागर;
जब से चलना सीखा तूने, छलकाती जाती है गागर,
मेरे क़दमों में बांधा था काल ने कोई जैसे बाधक,
पर तेरी खनकाती पायल बना गयी मुझको इक साधक,
चलता हूँ मैं धीरे क्योंकि नहीं जानता कोई जंतर,
चलना ही है काम निरंतर..

चलते चलते नया है पाया, किन्तु पुराना खोता आया,
जिस पनघट की डगर कठिन है, वहीँ मोक्ष था हमने पाया,
प्राची का पट खुल न पाया, तम की लम्बी इतनी काया,
किन्तु हमारे प्रबल स्वरों ने, नया सूर्य कोई उगवाया,
कठिन सहज सब एक सा लगता, दूर हुए थे सारे अंतर,
चलना ही है काम निरंतर...

करूँ वंदना कैसे तेरी, तुम सुलझे हो, समझाओगे,
पर मैं भी इक ऐसा पागल, जैसा कहीं नहीं पाओगे,
अपनी अपनी रातें हैं ये, अपना ही है कोई सवेरा,
जब सब कुछ ही छोड़ है जाना, फिर तेरा क्या, क्या है मेरा,
पर जब तक जिंदा हूँ माते, मेरा भी है एक दिगंतर,
चलना ही है काम निरंतर...

Thursday, July 28, 2011

गज़ब निकली

सांझ की बरसात गज़ब निकली,
तुम जगे तो रात गज़ब निकली,
अरमानों की बातें करते हुआ सवेरा,
फिर मुरादों की बारात गज़ब निकली;

क्या हुआ की कसक अब भी बाकी है,
राख में दबी आग अब भी बाकी है,
एहसान तेरा फिर भी रहेगा मुझपर,
तेरे सौगातों की तादाद गज़ब निकली;

रहो या न रहो तुम, ये राहें रहेंगी,
चमकेंगे जुगनू, फिजायें रहेंगी,
बेशक चले साथ पल भर ही नीरज,
उस पल भर की झंकार गज़ब निकली...

अरमां कहाँ से लाओगे

कई दिनों से घर के अन्दर खटिया तोड़ रहा हूँ,
कुछ अनसुलझे प्रश्नों को मन ही मन जोड़ रहा हूँ,
रह रह कर के आशंकाओं के मच्छर मंडराते हैं,
फेंक किनारे उनको, मैं फिर ख़्वाबों को मोड़ रहा हूँ;

पहले कैसे भाग दौड़ में दिन यूँ ही कट जाते थे,
अच्छे और बुरे कर्मों को जांच कहाँ हम पाते थे,
अब चिंतन का समय मिला तो ग्लानि निरंतर होती है,
कितनी बुरी जगह थी वह, रोज़ जहाँ हम जाते थे;

कभी कभी ये व्यस्त सा जीवन सीख नई सिखलाता है,
जब चिंतन का समय न हो तो खटिया कोई दिखाता है,
वक़्त रहे तुम संभल लो प्यारे वरना फिर पछताओगे,
जब कल दिल ही नहीं रहेगा, अरमां कहाँ से लाओगे...



Tuesday, July 26, 2011

लहरों का पानी

बड़े अरसे से हवाओं में समंदर डोलते थे,
भिगो जाती थी लहरें, चक्षु पानी सोखते थे,
दिलों में टीस बनकर रेत की मानिंद यादें,
गुज़र जाती थी ज्यों ही मुट्ठियाँ हम खोलते थे;

नहीं अब कुछ बचा कि आया शायद ज़लज़ला होगा,
कहीं रेतों कि गहराई में औंधा मन दबा होगा,
किनारों से गुज़रती हैं हवाएं अब भी ऐ नीरज,
मगर लहरों का पानी आँख से शायद बहा होगा...

Sunday, July 17, 2011

क्यों ज़ुदा देखा

देखने को तो एक ही मंज़र था,
तेरी आँखों ने क्यों ज़ुदा देखा;

अपनी रातों की बात करते हो,
हमने दिन का भी फासला देखा;

ऐसा लगता था लौट आये हो,
घूम कर हमने आइना देखा;

आज़ दीवारें भी नहीं सुनती,
हमने फिर से नया मकां देखा;

जिंदगी एक सी नहीं रहती,
वक़्त ने वक़्त का सिला देखा;

Saturday, July 16, 2011

बूंदों का बहना स्वीकार करो.

फुहारों में रिमझिम बरसती,
या पेड़ों के,
मादक पत्तों से,
रिस रिस कर गिरती,
ये पानी की बूँदें हैं,
इनका मौसम से,
अपना सरोकार होता है,
और ज़रा गौर करेंगे तो,
हर बूँद का,
अपना आकार होता है...

बादलों से निकलती हैं,
तो बारिश बन जाती हैं,
अनुपात में गिरें तो जीवन,
वरना बहुत कहर ढाती हैं,
अधिक होने पर,
सैलाब आता है,
और हम आप कितना भी कर लें,
धरती का दर्द,
इन्हें सोख नहीं पाता है,
और यदि ये न बरसें,
तो जीवन कुछ यूँ पलता है,
जैसे ज़मीं की दरारों में
दिन रात कोयला जलता है...

कुछ ऐसी ही बूँदें हैं,
जो लोचनों में रहती हैं,
कभी पुतलियों में छलक आती हैं,
कभी गालों से होकर,
ज़रा चुपचाप बहती हैं,
पर ये मौसमी नहीं हैं,
कभी भी,
इनका आना हो सकता है,
इसलिए क्या आँखों से बेहतर,
इनका कोई ठिकाना हो सकता है..

ये भावनाओं को समझती हैं,
और सदा तैयार रहती हैं,
ये ग़मों को और खुशियों को,
इकट्ठा कर तरसती हैं,
और जब जिगर भर जाता है,
ये पलकों से बरसती हैं,
गालों से होकर जो टपक जाती हैं,
कभी कभी शर्म से,
खुद को आंसू बताती हैं,
कभी कभी हथेलियाँ,
इन्हें प्यार से रोप लेती हैं,
और हम मानते हैं,
की ये बूंदें नहीं मोती हैं...

ये सब के पास होती हैं,
बारिश की ही तरह,
गरीब अमीर नहीं सोचती हैं,
और आँखें बंद रखो या खुली,
ये अपना रास्ता खुद खोजती हैं,
कुछ लोग इन्हें रोक लेते हैं,
दिमागी शक्ति से टोक देते हैं,
तब ये कुछ मजबूर नज़र आती हैं,
आँखों से नहीं रिसती,
पर दिल में आंसुओं का,
तालाब बनाती हैं,
अज नहीं तो कल ये तालाब भरता है,
और तब कितनी भी कोशिश कर लें,
कहाँ कोई बाँध ठहरता है...

बारिश का धरती से,
जो अटूट रिश्ता है,
वही बंधन शरीर का,
आंसुओं से दिखता है,
इसलिए इन्हें मत रोको, बह जाने दो,
ये ख़त्म नहीं होते,
ज़रा सा दर्द तो और आने दो,
इसमें कोई शर्म नहीं, यह सदा से होता है,
इस धरती पर कभी न कभी,
हर शख्श रोता है,
इसलिए इन बूंदों का,
मत तिरस्कार करो,
खुश रहने के लिए हो या,
दिल के हल्केपन के लिए,
कभी कभी इन आँखों से,
बूंदों का बहना,
स्वीकार करो.

Thursday, July 14, 2011

मिश्रण iii

"We are what we think. All that we are arises with our thoughts. With our thoughts, we make the world."
हम विचारों से ही स्वयं को संजोते हैं,
विचारों से ही जगत के बीज बोते हैं,
और कितना भी बनावटी बनना चाहें हम,
हम वही होते हैं जो वास्तव में सोचते हैं ...
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The sun refuses to shine and the clouds refuse to rain,
Its a little dark but strangely no pain,
And whatever happens, i have everything to gain.....

न ही सूरज चमक पाता है, न बादल बरस पाते हैं,
तनिक तम ही सही पर आश्चर्य है,
अब दर्द के गुबार नहीं आते हैं,
और चाहे तुम चमको या बरसो मेरे मौला,
मेरे लिए ये महज़ तारों का टूटना है,
हम जो चाहते हैं वो पाते हैं...
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ह्रदय की रोशनी है, रात में अस्त नहीं होगी,
हौसलों की धाविका है, अब पस्त नहीं होगी,
वो गुज़रे ज़माने हैं जब हम हारा करते थे,
अब जीतें या न जीतें पर शिकश्त नहीं होगी;
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 तुम जो कह दो तो हर आह वाह लगती है;
मेरे सपनों में भी इक खोयी रात जगती है....
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आज सूरज बादलों की ओट से निकला और कुछ ही देर में फिर बादलों में ही खो गया; मैं चाहता हूँ की बरस कर ये बादल छंट जाएँ,  पर अगर ये न भी बरसे तब भी मुझे एहसास है की सूरज इनके ऊपर ही है...बादलों को चीर कर आती रोशनी इसका प्रतीक है; मखमली घास पर फुदक फुदक कर कुछ चुनती वह चिड़िया मुझे साफ़ दिखाई देती है..................
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जब कुछ जले तो धुआं होता है,
जब कुछ बुझे तो धुआं होता है,
दिलों की बात जो अक्सर करते थे,
वो चुप रहें तो धुआं होता है;
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हिन्दुस्तान मेरा था

तुम्हारे दर पे वो सारा सामान मेरा था,
गली के दायें से चौथा मकान मेरा था,
और तुम जिसे कहते हो पाक़ मुल्क हुज़ूर,
पुराने वक़्त में हिन्दुस्तान मेरा था;

आज तुम मानवता की सारी मिसाल भूल गए,
पडोसी होकर के अपनी दीवार भूल गए,
हमें देखकर नुक्लिअर होना याद रहा,
हम सब का एक ही 'परवरदिगार' भूल गए;

Thursday, June 30, 2011

एक और मिश्रण

सब ने कहा सच्चे इरादों में दम होता है,
पर मुरादें सब हों पूरी, ऐसा कम होता है,
हौसला अफजाई कि बात और है'नीरज',
अक्सर घरों में एक कमरा कम होता है...
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हुजूर कहते हैं कि पाजिटिव लिखो,
कैसे समझाएं उन्हें,
एक और कमरे कि चाहत भी पाजिटिव है,
जिंदगी से समझौते कि आदत भी पाजिटिव है,
शब्दों के अर्थ हम बेशक अपने निकालें,
चाहतों कि चाहत भी पाजिटिव है....
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बादलों में शक्ल खोजते खोजते,
वो हवाओं से दूर चला जाता है,
दिशायें हैं मौन कैसे समझाऊं,
कि उसे कोई और भी बुलाता है...
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सब को सुनते सुनते ही मैं सो गया;
दिलों कि बात चुनते चुनते सो गया;
फैसलों के दरमियाँ  सोता रहा;
रास्तों को नापने में सो गया ;
कारवां था , कारवां चलता रहा;
मैं मगर फिर भी सदा सोता रहा;
अब जगाने से भला क्या फायदा;
कल था अरमां आज देखो सो गया....
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अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
सूखी दरारों में ज़मीं है,
और गहराइयाँ भी समतल हो चली हैं,
अलबत्ता कुछ चिकने से पत्थर ज़रूर हैं,
जिन पर से कभी बहुत पानी बहा होगा,
कभी यहाँ भावनाओं कि नदी होगी,
अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
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वन में हो या भवन में हो ,
आदमी, अपनी ख़ुशी खोज़ लेता है,
फिर ये कौन है जो इस भीड़ में,
न होने की कमी देता है ;
महज़ सोचने से सूखी आँखों में,
क्यों यादों कि नमी देता है;
जीने क़ी सजा ही काफ़ी थी,
क्यों दो गज ज़मीं देता है;
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बाकी सब वैसा ही है,
पुराना सा...
कुछ जाना, कुछ अनजाना सा,
कहीं पर वो है,
मगर कुछ बेगाना सा,
यहाँ पर मैं हूँ,
ज़रा सा दीवाना सा,
जो वो जब पूछ बैठे,
कि कैसे हैं हम...
हम कैसे बतलाते की,
हूँ इक अफसाना सा...
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व्याकुल सुबह, मचलता दिन और भर्राई शाम,
हँसता दुःख, रोती ख़ुशी और लवों पर नाम,
मेरा भी, तेरा भी, संदेशों का पैगाम,
कुछ गलतियों से सीख, कुछ उनका अंजाम,
कितना कुछ तो पा लिया, और क्या पायेंगे,
तुम्हारे दर से लौटे हैं अब और कहाँ जायेंगे...
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गर्मियों के उत्पीडन पर पवन की दृष्टि ज़ारी है,
बहुत सी खुशियों पर तेरा गम अब भी भारी है...
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भीड़ में और अकेले में,
एक ही इंसान में,
फर्क लाज़मी है............
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सुकून से रहो गहराइयों में ग़ालिब,
तुम्हारी ऊँचाइयों से लोग गिरे जाते हैं,
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 वो भी उसी छांव में सुस्ताते हैं,
पर कहते हैं,
हमारा नज़रिया जुदा है...
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कभी तुम भी नहीं थे,
कभी हम भी नहीं थे,
पर अब,
मुश्किलें भी,
आसानी से गुज़र जाती हैं...
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सूखी नदी,
और किनारे पसरी एक नाव,
सब को इंतज़ार है......
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किसी ने बड़े सलीके से तह करके,
दराजों में बंद किया,
और फिर खोलना भूल गया,
किसी ने ताबूत में उतारा,
मिटटी में झुकाया,
और ढंकना भूल गया,
किसी ने बड़ी बड़ी बातें की,
सपने दिखाए,
और सुलाना भूल गया,
इन सब के बावजूद जिंदा हूँ,
रात का तीसरा पहर है,
पर कोई कहता है,
इसके बाद सहर है......
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इन खूबसूरत हरी वादियों के पीछे ऊँचे पर्वत रहते हैं,
मेरे घर के कमरे में भी कुछ सुन्दर सपने पलते हैं....
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अब न कहने को, न सुनने को कुछ बाकी है,
अल्फाज़ों ने ही मारा है, अब खालीपन ही साक़ी है.
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नहीं ज़माने में ख़ुशी बिकती है,
ये तो खुद के जेहन में दिखती है,
शुक्रिया दोस्तों तुम्हारे हौसलों का,
मुझे भी रोशनाई दिखती है,
जो कुछ थमी थमी सी रहती थी,
कलम अब फिर प्रवाह लिखती है.
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इन लम्हों का,
शोर भी,
ख़ामोशी है...
कोई अंगूर नहीं,
फिर भी मदहोशी है,
इस ख़ामोशी में,
कोई जिंदगानी है,
जिसके बोलने की ताक़त..
रूहानी है,
माना कि मुलाकातों के,
लम्हे चंद हैं,
पर इन आँखों में भी
कुछ सपन बंद हैं,

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उस अलसाई सी शाख पर,
जो मेरा उल्लू बैठा था...
किसी का दिन था वो,
मेरी रातों पर ऐंठा था,
कुहासे का वो आलम,
कैसे ख़ाक हुआ,
किसी को याद करना भी,
यहाँ मज़ाक हुआ....
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 कोई कुछ भी कहे पर सदा मैंने ये माना है,
किसी को याद करना भी किसी के पास जाना है....
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ये मेघ गरज कर यूँ बरसे मैं बाकी सब कुछ भूल गया,
अपनों को रुलाना भूल गया अपनों को मनाना भूल गया,
मन भीगा, यौवन भीगा, चेहरे का दर्पण भीग गया,
बादल के पानी से देखो धरती का पानी भीग गया.
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हम समझते हैं तुम्हारी ये चुप्पी,
नासमझी की आड़ में इक मजबूरी है;
तुम जो कहते हो तुम्हे आभास है पर;
आभास का आभास भी बेहद ज़रूरी है.

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आज क्यों आँखें अचानक नम हुई,
एक दिल की आरज़ू थी, कम हुई...
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एक ही बात बार बार,
गरीब के सब्र को,
कब तक आंकोगे,
प्यास बुझे न बुझे कोई गम नहीं,
पर खाली गिलासों में,
कब तक झांकोगे....
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कोहरा अब भागने लगा है...मुझे धीरे धीरे सब दीखने लगता है,  खेत जोतता लल्लन, खूंटा तोड़ कर जैगोबिन्द की मटर चरती मोहना कुम्हार की गाय, दूकान की टीन की छत, और वो छोटी लड़की बस्ता लिए...प्रतीक्षा करती हुई...मुझे सब दिखाई देता है.

the fog struggles for its existence now....slowly i start seeing again, Lallan ploughing the fields, Mohna potter's cow that has ventured into Jaigobind's peas farm, the asbestos roof of the shop and the little girl with a school bag....waiting...i can see all now.

(it describes a winter morning in my village when the fog unsettles..sorry for the poor translation :)
.....मेरे संस्मरण से
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जो हसरत थी अधूरी, अभी भी है अधूरी,
तुम्हारी शोखियों से नहीं होती ये पूरी,
टिके रहना मगर तुम, ये जन्नत है यहीं पर,
ये अम्बर है यहीं पर, ये धरती है यहीं पर...
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इन पहाड़ों से नीचे उतरते वक़्त ऊपर खड़ी वह बच्ची काफ़ी देर तक दिखती है....हाथ हिलाती हुई.
उसका यूँ हवा में हाथ हिलाना अपने आप में एक दुनिया है....जैसे एक फौजी बाप छुट्टियों के बाद वापस जा रहा हो...अपनी दुनिया से..

---मेरे एक संस्मरण से
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खोल कर इन कागज़ों को कौन पढना चाहता है,
पर लिखावट ठीक कर लो, आखिर इसमें हर्ज़ क्या है ...
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ये तो कुछ भी नहीं,
महज़ इश्क मेरा है गरीबी से,
मेरा घर चल रहा तुमसे,
तुम्हारी खुशनसीबी से...
तो क्या हुआ कि मेरे खांसने से,
रक्त गिरता है,
तो क्या हुआ की दम मेरा,
दमे से रोज़ मरता है ...
तुम्हारे कैमरे में कैद,
ये फोटू बना लेना,
कहीं पर छाप देना,
और कहीं कविता लिखा लेना,
और फिर भूल जाना तुम,
हमें बेहद गरीबी से,
मेरा घर चल रहा तुमसे,
तुम्हारी खुशनसीबी से...
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आज का दिन भी ख़ामोशी के गर्भ से निकला था I सोमवार की सुबह भी सब मौन था; पवन का अवकाश ज़ारी था, पेड़ों के अधर भी चिपके हुए, पक्षी जैसे किसी शोक सभा में बैठे थे, सड़क अपनी मांग भरना भूल गयी थी शायद I ये सब अब मुझे जाना पहचाना सा लगता है; जैसे वर्षों से इसी ख़ामोशी में जी रहा था I पर ये ख़ामोशी अलग है I ये एक छोटे पर भागते हुए शहर की ख़ामोशी है जिसकी आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँचती I पर ये किसी और को क्यूँ नहीं दिखाई देती ?  या फिर शायद ये ख़ामोशी मेरे अन्दर है, जो वर्षों से धीरे धीरे सीने में कहीं रिसती रही है I तभी इस भीड़ में भी स्वयं को अकेला पाता हूँ और घर से दफ्तर एवं दफ्तर से घर हरी भरी सड़क से अकेला चला आता हूँ I कुछ याद नहीं रहता; कुछ याद नहीं आता I ये कैसी खामशी है जिसमे न कुछ दिखाई देता है न सुनाई देता है I

मेरे संस्मरण से...
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आज मैं जग रहा हूँ,
और रात,
बेसुध है,
मौन और निश्तब्ध,
कल अवकाश है शायद.....
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जहाँ पर गगरियों में भी लाज सिमट जाती थी,
उसी पनघट पर नींद आ जाती तो अच्छा होता,
जहाँ पर चुप्पियों में भी निगाहें लिपट जाती थी,
उसी जमघट पर शाम ठहर जाती तो अच्छा होता,
सैकड़ों हैं ख्वाहिशें ऐसी दफ़न नीरज,
फकत गौर एक हो जाती तो अच्छा होता.
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नींदों में रातें फिर थमेंगी,
जब ये पुरवाई बहेगी,
आज का अफ़सोस क्यों कर,
कल दिशायें फिर सुनेंगी
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आज फिर,
जिंदगी मुझसे ,
और मैं उससे,
कुछ मांग रहे हैं...
यकीन और हकीकत की,
दुनिया से परे,
अपनी ही सीमाएं,
लांघ रहे हैं.
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अब भी उम्मीद लगाये बैठा हूँ,
उन पहचानी सी सड़कों पर,
कोई हाथ हिलाएगा,
मैं रुक जाऊंगा .....
नादान हूँ मैं ....
इतना भी नहीं समझता,
वक़्त की बेरहम करवट है;
कब तक उम्मीदों में जी पाउँगा,
एक दिन सड़क भी,
पहचानने से इनकार कर देगी,
तब उम्मीदों में ही....
गुज़र जाऊंगा.
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जिंदा है

हुआ क्या जो हमारे हाथ छूटे बिखरी राहों में,
हथेली पर अभी तक हाथ का आभास जिंदा है;

जो रस्ते थे बहकते शाम को क़दमों की आहट से,
नशे में आज भी धुत हैं, वही मयखार जिंदा है;

गए थे दूर फिर भी आसमां न मिल पाया धरा को,
तो क्या गम है अभी तक बादलों के तार जिंदा है;

अभी भी आस जिंदा है, अभी एहसास जिंदा है,
हमारी धमनियों में जीने का अंदाज़ जिंदा है;

नहीं कुछ भी कभी खोता, अगर हम खोना न चाहें,
जो जिंदा रख सकें खुद को तो सब संसार जिंदा है.

Tuesday, June 28, 2011

साफ़ दिखती हैं

हमेशा से मैं आँखों के तबस्सुम खोजता था,
कहाँ कब सोचा था बाज़ारों में मुस्कान बिकती है,
जिन्हें था कल तलक नहीं ज्ञान सीधे अक्षरों का,
कलम उनकी बड़ी बेदाग़ होकर नगमे लिखती है,
जिन्हें मैं सोचता था, मेहनती हैं, आगे जायेंगे,
बड़े  ईमान से हर रोज़ उनकी हस्ती मिटती है,
जिन्हें तुमने कभी अरमानों से नींदों में पाला था,
अभी तक सो रहे हैं वो, तुम्हारी ख्वाहिश सस्ती है,
रौशनी में भी जिन्हें था देखना मुश्किल नीरज,
अंधेरों में वो चीज़ें हैं जो बिलकुल साफ़ दिखती हैं...

Saturday, June 18, 2011

हम भी मुस्कुराएंगे

तुम जो कहते थे दोस्ती है,
हमने सोचा था आजमाएंगे;

तुम हमेशा आसरा दिखाते थे,
सोचा हम भी आशियाँ लुटाएंगे;

तुम किनारे पर मगर कैसे पहुंचे,
हमने सोचा था, दोनों डूब जायेंगे;

तुम जिस गली में रहते हो,
हम वहां अब गश्त न लगायेंगे;

तुम्हारा दामन पाक रहे हरदम,
हम गुनाहों का खाम्याज़ा पायेंगे;

तुमने तोड़े थे जो पेड़ों के पत्ते,
सूख गए हैं, हम उन्हें जलाएंगे;

तुम्हारी जिंदगी, जिंदगी रहे 'नीरज',
अज़ल से पर हम भी न मात खायेंगे;

तुम तबस्सुम को सदा सजाए रखना,
अरमां रहा तो हम भी मुस्कुराएंगे;

Thursday, June 16, 2011

अब भी यकीन नहीं होता

अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;
सूखी दरारों में ज़मीं है,
और गहराइयाँ भी समतल हो चली हैं,
अलबत्ता कुछ चिकने से पत्थर ज़रूर हैं,
जिन पर से कभी बहुत पानी बहा होगा,
कभी यहाँ भावनाओं कि नदी होगी,
अब भी यकीन नहीं होता
कि कभी यहाँ कश्ती कोई चली होगी ;

Monday, June 13, 2011

आंच में ही फूलता है

आज उमस में शरीर से कुछ यूँ पसीना बहता है,
जैसे तेरी आँखों से ऐतबार बहा करता था;
मुहं से कुछ न बोलते थे लफ़्ज़ों से लेकिन,
प्यार का इक हल्का सा इकरार बहा करता था;

आज बीती बातों की बूढी कहानी हो गयी है,
लफ़्ज़ों की मासूमियत भी लफ़्ज़ों में ही खो गयी है;
ये पसीना बहते बहते आज मुझसे कह रहा है,
तुम जिसे समझे मोहब्बत, मेहरबानी हो गयी है;

हमने कितना कुछ कहा था, तुमने कितना कुछ सुना था,
फिर भी क्यों पिछला दिखाने, तुमने लम्हा वो चुना था;
उँगलियों में चोट से हम हाथ को नहीं काट देते,
ऐब कितने थे रहे पर ख्वाब तुम पर ही बुना था;

आज दिन मेरे नहीं अच्छे गुज़रते, मानता हूँ,
आज लिखने को नहीं है हाथ उठते, मानता हूँ,
पर कभी तुम भी हमारी रातों में थे जागते,
आज जगती रातों में अरमां झुलसते, मानता हूँ;

आज कुछ भी हाल होवे पर न बीता भूलता है,
इस समंदर में अभी भी लहरों सा मन झूलता है;
कोई कितना भी कहे पर है मुझे विश्वास अन्दर,
प्रेम का आटा सदा से आंच में ही फूलता है;

Sunday, June 12, 2011

राख की आग

अब रात ही रात में रात बिखर जाती है,
रोज़ अंधेरों में निकली ख्वाहिश किधर जाती है,
यूँ तो दिल बर्फीली रातों में भी हैं झुलसे,
पर राख में लगी आग से रूह भी सिहर जाती है;

अब तो जलने को भी न बचा, अब क्या सोचते हो,
क्यों भट्टियों में धमनियों का क्रोध झोंकते हो,
मुर्दे तो यूँ भी न बोलते हैं, न डोलते हैं,
तुम क्यों मेरे ताबूत में कील और ठोंकते हो;

तुम सदा मुझसे यूँ ही नाराज़ नहीं रहते थे,
गुस्सा होते थे अक्सर पर दूर नहीं रहते थे,
आज तनहाइयों का ज़ुल्म सर चढ़ा है नीरज,
वरना तनहाइयों में भी हम मजबूर नहीं रहते थे;



Saturday, June 11, 2011

दो गज ज़मीं देता है

वन में हो या भवन में हो ,
आदमी, अपनी ख़ुशी खोज़ लेता है,
फिर ये कौन है जो इस भीड़ में,
न होने की कमी देता है ;
महज़ सोचने से सूखी आँखों में,
क्यों यादों कि नमी देता है;
जीने क़ी सजा ही काफ़ी थी,
क्यों दो गज ज़मीं देता है;

Wednesday, June 1, 2011

जीवन एक डब्बा

इसमें हमारा यथार्थ है,
जो बची खुची आक्सीज़न में,
सांस लेता है,
और इसमें है कल्पनाओं का भण्डार,
जो आँख खोले है,
पर बीच बीच सोता है;
इसमें ही भावनाओं का अम्बार है,
थोड़ी हंसी है,
थोड़े हैं आंसू,
एक चहकता परिवार है;
इसमें ही मन है,
चाहतों का दर्पण है,
जिसमे शक्ल नहीं दीखती,
पर इनपे सब अर्पण है...
इसमें हमारा कल है, आज है,
और कल का मनन है,
और इसमें हम कितना ही झगड़ लें,
इसमें ही अमन है,
यूँ तो ये बहुत छोटा है,
पर इसमें कितना कुछ भरा है,
ये शायद जादुई है,
क्योंकि सच्चा है, खरा है,
ये किसकी माया है,
ये कैसे रचाया है,
कि इतने छोटे से डिब्बे में,
जीवन के हर पहलू की,
लचकती एक डाली है;
और हम कितना भी भर लें,
ये डब्बा,
फिर भी खाली है.............

पुराना सा...

बाकी सब वैसा ही है,
पुराना सा...
कुछ जाना, कुछ अनजाना सा,
कहीं पर वो है,
मगर कुछ बेगाना सा,
यहाँ पर मैं हूँ,
ज़रा सा दीवाना सा,
जो वो जब पूछ बैठे,
कि कैसे हैं हम...
हम कैसे बतलाते की,
हूँ इक अफसाना सा...

Tuesday, May 31, 2011

और कहाँ जायेंगे...

व्याकुल सुबह, मचलता दिन और भर्राई शाम,
हँसता दुःख, रोती ख़ुशी और लवों पर नाम,
मेरा भी, तेरा भी, संदेशों का पैगाम,
कुछ गलतियों से सीख, कुछ उनका अंजाम,
कितना कुछ तो पा लिया, और क्या पायेंगे,
तुम्हारे दर से लौटे हैं अब और कहाँ जायेंगे...

Monday, May 30, 2011

भूसे में दबी बोरियां

रोज़मर्रा की जिंदगी रोज़ ही मुंह बाए खड़ी रहती है I एक तरह की सुबह, एक ही तरह का दफ्तर, वहां तक पहुँचने का वही रास्ता, वही लोग, एक ही तरह का काम, उसी तरह की वापसी, वही घर, वही शाम और वही हतप्रभ सी घूरती रात I हतप्रभ सी इसलिए क्योंकि ये रात आश्चर्य करती है; कैसे गुज़ार लेते हैं हम प्रत्येक दिन एक ही तरह, किसी मशीन की तरह, भोर से अंधेर तक...और फिर भोर तक I यह मुझे अदभुत लगता है; इसलिए क्योंकि हर दिन मेरे साथ कुछ न कुछ नया होता है, अच्छा या बुरा पर कुछ अलग सा, परन्तु अगले दिन जब मैं मुड़कर देखता हूँ तो मुझे बीता दिन और दिनों की तरह ही लगता है...नियमित सा I ऐसा क्या है जो मुझे नया, नया सा नहीं दिखता; क्या है जो खो गया है; या क्या है जो अन्दर है पर दबा हुआ है, भूसे के ढेर में दबे गेहूं की बोरियों की तरह I

मेरे घर के बाहर टंगे झोले में रोज़ सवेरे चार बजे कोई व्यक्ति दूध के पैकेट्स डाल जाता है और उसी झोले में पड़े कागज़ के कूपन को निकाल जाता है I कोई पचास बरस का यह व्यक्ति पिछले सत्ताईस बरसों से यह काम लगातार कर रहा है I रोज़ तीसरी मंजिल की सीढियां चदता और उतरता है; कई अपार्टमेंट्स में; ऐसा क्या है इस कार्य में जो उससे जिंदा रखता है ? वह तो शायद कभी मन भर कर सुबह सोया ही नहीं; क्या ये महज़ पेट की आग है, या परिवर्तन की आशंकाओं का भय, या इस काम में उसे एक आनंद आता है, या कोई सुकून मिलता है I मैं नहीं जानता; मेरे गाँव में मोहना कुम्हार है जिसे आज मैं पैंतीस बरसों से चाक पर कुल्हड़ बनाते देख रहा हूँ I उसके बेटे ये काम नहीं करते और आज वो शहर जाकर कमा खा रहे हैं; मेरे पूछने पर वह कहता है कि बेटवा इही माटी से आई रहे, इही माटी में मिल जाब; सोचा इही माटी के साथे टैम निकाल लेई...माना कि ये उसका पुश्तैनी काम है पर क्या इंसान कभी ऊब नहीं जाता, या क्या उसे कभी बदलाव का मन नहीं करता, या क्या उसे इस माटी में वास्तव में वह सब कुछ दिखता है जिसे मैं दसों दिशाओं में नहीं देख पाता ?

ऐसे ढेरों सवाल रोज़ आते हैं और रात्रि को मेरे साथ बिना जवाबों के सो जाते हैं I ऐसा नहीं है कि जीवन में परिवर्तन नहीं हुए; अवस्थाएं बदली, परिवार बढे, कुछ कम भी हुए, कुछ रहन सहन बदला, नौकरी बदली, मकान बदले, मित्र बदले, यहाँ तक कि हाथ कि रेखाएं बदली ! कितने नए लोग, नई जगहें, नए आयाम मिले; कितने पुराने लोग नए अंदाज़ में मिले, कितने नए लोग पुराने अंदाज़ में बिछड़े; माता पिता, भाई बहन के परिवार के प्रति विचार बदले, अपने ही जीवन में भविष्य के प्रति चिंताएं बदली, वस्त्र बदले...शायद कुछ आत्माएं भी बदली; सब कुछ तो बदला...फिर क्या है जो रोज़ सुबह एक सा दिन मुहं बाए खड़ा रहता है और कहता है...कुछ नहीं बदला; तुम तब भी वही थे, तुम अब भी वही हो...निरर्थक...बिलकुल खाली I

गुप्त जी पंचवटी में कहते हैं,
 "परिवर्तन ही यदि उन्नति है,
 तो हम बढ़ते जाते हैं,
 किन्तु मुझे तो सीधे सच्चे,
 पूर्व भाव ही भाते हैं "
ये किन भावों कि बात कर रहे हैं? वो जो परिवर्तन से परे हैं या होने चाहिए ....ये क्या हमारे संस्कारों की बात है या उन मानवीय भावों की जिनमे अमूमन समय के साथ परिवर्तन नहीं होना चाहिए जैसे प्रेम, वात्सल्य, दया, क्रोध, द्वेष, इर्ष्या आदि ? यद्दपि इन भावों में बदलाव नहीं आये, किन्तु इनके क्रियान्वन में, या इन भावों को व्यक्त करने में अनेकों बदलाव आये हैं I फिर क्या है जो निरर्थक जान पड़ता है, जो खाली दिखता है, जिस पर उमंगें असर नहीं करती, जिस पर संदेह रहता है ?

शायद ये मेरे देखने का नज़रिया है...शायद; जब मुस्काते फूल दिखते हैं पर मुस्कराहट महसूस नहीं होती, जब व्यंजन का ज़ायका होठों पर नहीं टिकता, जब पायल का सम्मोहन चंद पलों का होता है, जब रागिनी की धुन सुनने के पश्चात गायब हो जाती है, जब भोर की किरणें धूप लगती हैं, जब सांझ की बेला भ्रम पैदा करती है, तो निश्चित ही दोष फूल,व्यंजन, पायल, रागिनी, किरण,या सांझ का नहीं है, इनको देखने वाली नज़रों का है, इन्हें महसूस करने वाली मासूमियत का है, इनको समझने वाले भावों का है.....मेरा है I

इन रास्तों पर भागते भागते कहीं बीच में कुछ गिर गया शायद...पर उसे खोजने वापस उन रास्तों पर जाने की ज़रूरत नहीं है I ये मेरे अन्दर है...हमेशा से था...हमेशा रहेगा; इसे मैं फिर उभार सकता हूँ, उन बोरियों को भूसे में से निकाल सकता हूँ, उन गेहुओं की रोटियां फिर खा सकता हूँ; ये मुश्किल नहीं है...नहीं होना चाहिए...महज़ अपने मन का डर निकालना है I अनिश्चित भविष्य की अनिश्चितता से नहीं घबराना है, जो है उसे पाना है, जो नहीं है वो कभी था ही नहीं I  कुछ पुरानी पंक्तियाँ याद आती हैं;
"बसों नगर की ऑर अगर डरते हो वन से,
घर में छुपो अगर डरते हो काले घन से,
छुप जाने की जगह नहीं सारी दुनिया में,
अगर कहीं डरते हो तुम अपने ही मन से"



Friday, May 27, 2011

आसान दिखता है

कभी तुम भी यहाँ नहीं थे,
कभी हम भी यहाँ नहीं थे,
तब भी मुश्किलें थी,
अब भी मुश्किलें हैं,
पर दो आँखों से,
...और चार आँखों से,
देखने में फर्क होता है,
ज़रा से साथ से,
मुश्किलों का अस्तित्व,
गर्क होता है.
खालीपन की पेचीदा दीवारों से,
जब बूँद बूँद दर्द का लहू रिसता है,
और फर्श पर खून के धब्बे,
अगर मुश्किल नहीं लगते,
तो सब आसान दिखता है...

Monday, May 23, 2011

मेरे चमड़े का जूता

इन गर्मियों में,
अकस्मात् छाये बादल,
कहते हैं की,
हम नहीं बरसेंगे...
तो क्या हम यूँ ही,
मोतियों को तरसेंगे....
पर मैं जानता हूँ,
की आज नहीं तो कल,
ये बरसेंगे...
क्योंकि मेरे पास,
पानियों का अभाव है,
और बरसना तो,
बादलों का स्वभाव है...

आँख मिचौली खेलती धूप,
कहती है मुझे पकड़ो,
और हर बार,
छिटक कर दूर चली जाती है,
और मेरे मायूस होने पर,
फिर पास चली आती है...
मैं जानता हूँ की,
वो मुझे चिढ़ाती है,
उसके और मेरे बीच,
दूरियां कहाँ नपनी है;
और वो कहीं भी चली जाए,
ये धूप मेरी अपनी है.....

ये आज है मेरा,
जो कल के मिलन को सरक रहा है,
ये दिल नहीं मीठा सा दर्द है,
जो ज़ोरों से धड़क रहा है...
ये कुछ बची तमन्नाएं हैं,
जो ख़ुशी से झूलती हैं,
जैसे खुली आंच पर,
घर की रोटियां फूलती हैं...
जब कल आएगा,
छिटकी चांदनी में बरसात लाएगा,
मेरी खिड़की का पट तब,
भीग जाएगा...
और गर्मियों में तपा,
बालकनी में रखा,
मेरे चमड़े का जूता भी,
भीगना सीख जाएगा...

Saturday, May 21, 2011

अदृश्य तार

एहसासों के अदृश्य तार,
बंधनों में नहीं बंधते,
कोई संकल्प, कोई वादा,
नहीं करते,
किसी को चोटिल करने का,
इरादा नहीं करते,
ये तो बस,
रूह को रूह से पिरोते हैं,
और तन बदन कितना भी हँसे,
ये भावनाओं की खातिर,
ज़रा चुपचाप रोते हैं,
महज़ जिन्दा रहना ही,
इनका मकसद नहीं,
ये बहकी हुई हवाओं को भी,
ज़रूरत पड़े तो मोड़ देते हैं,
एहसासों के अदृश्य तार हैं ये,
ये भौगोलिक दूरियों को,
पल भर में जोड़ देते हैं.

Friday, May 20, 2011

भूल गया

किसी ने बड़े सलीके से तह करके,
दराजों में बंद किया,
और फिर खोलना भूल गया,
किसी ने ताबूत में उतारा,
मिटटी में झुकाया,
...और ढंकना भूल गया,
किसी ने बड़ी बड़ी बातें की,
सपने दिखाए,
और सुलाना भूल गया,
इन सब के बावजूद जिंदा हूँ,
रात का तीसरा पहर है,
पर कोई कहता है,
इसके बाद सहर है......

Thursday, May 19, 2011

आसमां झुकता है

कभी कभी अपनी आवाज़,
किसी अनदेखे पहाड़ से,
टकरा कर,
वापस लौट आती है,
कभी कभी,
सुबह के इंतज़ार में,
रात के बाद,
फिर रात ही आती है,
जिंदगी तब,
बेईमान लगती है,
और बिलकुल नहीं भाती है;
कभी लाख कोशिशों के बावजूद,
एक राही छूट जाता है,
बहुत सँभालने पर भी,
कांच का गिलास,
टूट जाता है,
कभी अरमानों का पुलिंदा,
एक मन में,
सिमट नहीं पाता है,
और कितना भी,
खाद दो, पानी दो,
बगीचे का एक पौधा,
रोज़ सूख जाता है;
और ऐसे में,
उदास मन,
करवटों में हिलता है,
फटे हुए दिल के कपड़ों में,
कुछ पैबंद सिलता है.....

पर ये कोई टकराव नहीं,
कोई बिखराव भी नहीं,
जीवन की निशानी है,
कोई जमी हुई बर्फ नहीं,
बहता पानी है,
ये कभी मेरी कविता है,
कभी तेरी कहानी है;
रास्ते तो चलते रहते हैं,
और उन बंद मोड़ों पर,
ये पथिक,
जब चेहरा ज़रा घुमाता है,
किसी जादुई सिमसिम की तरह,
एक नया रास्ता,
पाता है;
थकन की उन शामों में,
तब फिर से हौसला,
आता है,
और  उसी मेज़ पर,
कांच के टुकड़े नहीं,
वो एक नया गिलास,
सजाता है;

ये सब मात्र नजरिया है,
उन्ही आँखों से,
दोनों समां दिखता है,
दर्द खोजोगे तो दर्द,
वरना रहनुमा,
दिखता है,
अब बंद करो रोना,
तारों का टूटना कहाँ रुकता है,
ज़रा सी कोशिशों से नीरज,
तुम्हारे आँगन में,
ये सारा आसमां झुकता है....

Wednesday, May 18, 2011

यादों की रेशम

कोई नदी नहीं है, समंदर भी नहीं है,
कोई पोखर नहीं, कोई झरना भी नहीं है,
फिर भी इक लहर है,
जो बही चली आती है,
दूर तक इक नीर की बूँद भी नहीं,
ये कैसी तन्हाई है,
जो भिगोकर चली जाती है...

ये कुछ यादों की रेशम है,
इसमें मखमल है,
इसमें एहसास है,
सिसकती शबनम है;
ये मेरे उजाले की बाती है,
कोई कुछ भी कहे,
पर मुझे अब भी,
याद आती है,
मैं इसकी कशिश को,
आहिस्ता आहिस्ता चुनता हूँ,
कोई जुलाहा नहीं हूँ,
पर बड़ी तल्लीनता से,
रेशम बुनता हूँ.....

Sunday, May 15, 2011

असमतल धरती...सरल जीवन

ये रास्ते काफ़ी दूर तक साथ चलते हैं I चीड़ों की आवारगी भी इनके साथ चलती है, और साथ चलते हैं कुछ हल्के तैरते बादल और इन पहाड़ों के लोगों की हल्की तैरती हसरतें I ये पहाड़ कुछ नहीं बोलते, बस खड़े रहते हैं; जैसे किसी निरंतरता के प्रतीक हैं I सड़क के अनगिनत मोड़ों पर मुडती गाड़ी अनायास ही चलती रहती है, मानो ये उसका नियम है; मानो वो इन सब से भली भांति परिचित है I इसी सड़क के एक मोड़ से कुछ नीचे उतर कर, और कुछ ऊपर चढ़ कर, कुछ टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से गुज़र कर, कुछ पथरीली सीढियां चढ़कर....एक घर है; जिसके गुसलखाने में एक बाल्टी में भिगोये हुए कुछ कपड़े हैं जो अपने हिस्से की धूप की प्रतीक्षा कर रहे हैं I

यह एक छोटा किन्तु बड़े ही सलीके का घर है I एक कमरा और उससे ही किसी पेड़ की डाल की तरह निकली छोटी सी रसोई और कमरे से जुड़ा गुसलखाना जिसके बाहर का दरवाज़ा बिल्ली की दया दृष्टि से बंद रहता है; बेशक अन्दर कोई हो या न हो I लकड़ी की छत, और कमरे की ही दीवार से सटी लकड़ी की सीढ़ी जो ऊपर छज्जे की तरफ जाती है I ये एक लोफ्ट है, यानि की दोछत्ति I इसी लोफ्ट से पूरब की ऑर निकलती छोटी छोटी तीन खिड़कियाँ हैं जो इन पहाड़ों की लाचारी रोज़ देखती हैं I कमरे का दरवाज़ा खोलते ही छनी हुई धूप अपने होने का आभास  देती है I

घर के बाहर निकलते ही लगभग पांच वर्ग मीटर का घास युक्त मैदान, यहाँ वहां गमलों में और यूँ ही धरती पर रोपे फूलों के पौधे, ढलान से बातें करते आडू और प्लम के हल्के से शर्मीले छोटे वृक्ष और उनमे जन्मे छोटे छोटे फल जिनके बढ़ने का इंतज़ार उन्हें भी है और इस घर के प्राणियों को भी; और अवश्य ही कुछ व्यापारियों को भी I कुमाउन की पहाड़ियों पर एक छिटके से गाँव का एकांत में खड़ा यह घर कई आशाओं को एक साथ बयान करता है I

साथ ही है जुड़ा हुआ मकान मालिक का घर जिसमे रहते हैं दो पिल्ले, एक बिल्ली, एक आदमी, उसकी औरत और उनके चार बच्चे और दो मवेशी I और एक किरायेदार...और उसकी ढेर सारी आशाएं, आकान्शाएं और शायद थोड़ी सी अपेक्षाएं I सब को प्रतीक्षा है; हर जीवन प्रतीक्षा करता है; कभी कभी तो ये भी नहीं पता लगता की ये प्रतीक्षा किसके लिए है या ये बस यूँ ही है..अनायास I
सूरज यहाँ पहाड़ों से छिप कर निकलता है, और जब तक लिहाफों के अन्दर से हम आँखें खोलते हैं, सूरज हमारे चेहरे पर होता है...जैसे ये दूर पूरब से न निकल कर इस घर के ऊपर ही उगा था I बाल्टी में भिगोये कपडे अब भी प्रतीक्षा करते हैं ; उन्हें अपने हिस्से का और पानी चाहिए...और धूप भी I

असमतल और उबड़ खाबड़ धरतियों पर चीड़ सीधे खड़े रहते हैं; प्रेरणा देते हुए की जीवन सरल रहता है यदि हम स्वयं को सीधा रख सकते हैं; इन असमतल रोज़मर्रा की मुसीबतों के बीच I पैंतालिस मिनट के लगातार चढ़ाई और ढलान के बाद एक दफ्तर है I इन रास्तों पर धीरे धीरे चढ़ते उतरते कदम बहुत दूर तक दीखते हैं; कन्धों पर पिठूनुमा बैग टाँगे हुए; कानों में इअरफोन; संगीत को अपनी इस रोज़ की आवाजाही का हिस्सा बनाते हुए I अचानक ही वो कदम दीखने बंद हो जाते हैं; शायद इस पहाड़ के दूसरी ऑर चल रहे हैं, क्योंकि उनके दिखने का आभास काफ़ी देर तक रहता है; ठीक वैसे ही जैसे किसी पक्षी को कुछ देर हथेलियों में पकड़ने के बाद हम छोड़ देते हैं; खाली हथेलियों में उसकी मौजूदगी की गर्माहट उसके उड़ जाने के बाद भी काफ़ी देर तक महसूस की जा सकती है I

शाम को वही कदम उन्ही रास्तों पर वापस आते हैं; उसी अंदाज़ में जैसे वो गए थे I उनमे सिमटी थकान कोशिशों के उपरान्त भी ज़ाहिर होती है I यहाँ शाम अचानक ही आ जाती है क्योंकि सूर्य इन ऊंची पहाड़ियों के पीछे अचानक ही खो जाता है; और शाम के उजाले में ही चाँद दिखता है; कुछ शर्मसार सा; जैसे कोई स्त्री नहाने के बाद शर्माती है, खुले केशों में I बहुत सारी हसरतों और चाय के साथ शाम का आलिंगन रात से होता है; यही वो समय है जब जीवन बहुत थोड़े समय के लिए रुकता है..एक गुज़रे दिन में झांकता है, और आने वाले कल को बंद झरोखों से देखने की कोशिश करता है I कुछ हसरतों की आग पर कटी सब्जी गीले चावलों से मिलकर भाप में पकती है; कुछ वोदका गले के नीचे उतरते हुए  एक सीने को तरल करता है; और थोड़ा व्याकुल भी I फिर बहुत सारे सपने एक साथ आते हैं और थोड़े से नशे के बीच हसरतों की इकट्ठी हुई भीड़ में से हकीकत अपना सर ऊपर उठा कर कहती है कि मुझे देखो...असलियत में मैं ही हूँ...बाकी सब तुम्हारा ख़याल है I ग्लानि और नशे का शरीर रजाइयों में सोता है; हसरतें जगी रहती हैं, और बिजली के कृत्रिम प्रकाश में भी अँधेरा साफ़ दिखता है...ऊपर लोफ्ट में एक कंप्यूटर काफ़ी रात तक चलता है I

इस रात कि सुबह कई बार आती है; रात में भी और भोर में भी I यह अजीब है क्योंकि इसमें बीते आभास की झलक दिखाई देती है I वही कल का सूरज फिर निकलता है और मेरे ऊपर हँसता है, जैसे मेरे ख्यालों को वो रात भर पढता रहा था I दो प्याले चाय, और धुंए के उपरान्त उपमा और रात के बचे चावल एक बोझिल सी शांति के बीच पेट से आलिंगन करते हैं I हमारी सामाजिकता हमारा गहना भी है और शायद मज़बूरी भी I हमारी कथनी और करनी का फर्क यह साफ़ ज़ाहिर करता है की जब तक कोई ख़ास मज़बूरी नहीं आती, हम ये गहने नहीं उतारते I क्या हो सकता था और क्या नहीं हुआ के मद्देनज़र सामान फिर से बैग में सिमटने लगता है; कपडे तह हो जाते हैं, और हसरतों के जनाजे के साथ बैग की चेन एक सरसराहट सी करती हुई बंद हो जाती है I साथ ही दो दिनों से बाल्टी में भीगे कपडे धुल कर धूप के प्रेम को पाते हैं I इन कपड़ों से रिसता पानी ज़मीन का साथ पाकर उसमे ही खो जाता है; हसरतों के विपरीत I

बच्चे बस्तों के साथ पहाड़ियां चढ़ते उतरते हैं; कहीं इन्ही पहाड़ियों में छिपा एक स्कूल मेरा भी है; अभी वो नहीं दिखता पर निश्चित ही वो मुझे पुकारता है I अपना सामान समेट कर और कन्धों पर लादे, चढ़ती साँसों के बीच मैं कहीं से दूर निकलता हूँ, थोड़ा सा और अपने पास जाने के लिए I एक असमंजस भरा पाठ और सीखता हूँ; फटे हुए चमड़े में एक टांका और लगाता हूँ, एक नए से आभास के बीच आधा दिन और निकल जाता है और उन चीड़ के पेड़ों के बीच से होता हुआ टेढ़े मेढ़े रास्तों पर गाडी फिर सरकती है I इन पहाड़ों से दूर...समतल धरती की ऑर जहाँ जीवन इतना सरल नहीं है I


Thursday, May 5, 2011

मेरा रास्ता

आज की सुबह,
एक अरसे के बाद,
सौगात लेकर आई थी,
कुछ ऐसा लगा जैसे,
रात में,
चाँद की सगाई थी,
ये छोटा सा लम्हा है,
जो तेजी से,
निकल जाता हैं,
और जब तक स्वप्न,
यकीन में बदलता है,
समय गुज़र जाता है,
पर ये किस्मत का,
तोहफा है,
जो सुबह मैंने पाया था,
बेशक थोड़ी ही देर सही,
मेरा रास्ता,
मेरे साथ आया था....

खालीपन

इन सूखे पत्तों पर,
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है,
जैसे कोई गम नहीं है,
कुछ भरा भी नहीं है,
खाली है सब,
दूर तक....सब खाली है;
और इसी खालीपन में,
तुम्हारे होठों पर मुस्कां है,
और मेरे होठों पर,
गाली है,
और कितना भी,
हम अदला बदली करलें,
दूर तक....सब खाली है...

इसी खालीपन में,
एक दुनिया है,
जो थमती नहीं है,
जो गर्मियों में,
पिघलती नहीं है,
और ठण्ड में,
जमती नहीं है,
ये किसी के वजूद को,
तरसती नहीं है,
और कितने भी बादल घिर आयें,
जब चाहिए,
तब बरसती नहीं है.
इसी खालीपन में,
कुछ परिवार हैं,
माँ बाप हैं, यार हैं,
इसी में शौहर है, बीवी है,
एक प्यारी मुनिया है,
इसी खालीपन में,
एक दुनिया है....

इसी खालीपन में,
द्वन्द में जीना है,
इसी खालीपन में,
शांति से मरना है,
इसी खालीपन में,
दराजें हैं,
जिनमे तह करके,
रखी कुछ यादें हैं,
इसी खालीपन में,
मजारें हैं,
जिनमे सांस लेते,
कुछ अनकहे, अनसुलझे,
बेचारे हैं,
इसी खालीपन में,
चाँद है, तारे हैं,
और उनको बुहारने के,
अरमां हमारे हैं,
इसी खालीपन में,
कहीं की रात,
कहीं का सवेरा है,
कितना भी हम लड़ लें,
खालीपन में,
क्या तेरा है,
क्या मेरा है....

ये खालीपन,
हमारे साथ चलता है,
बंधनों के टूटने पर,
हाथ मलता है,
ये खालीपन,
ये भी समझता है,
कि ये शख्स कुछ ख़ास होगा,
तभी यह बावला,
उससे अक्सर लड़ता है.
और यही खालीपन,
याद दिलाता है,
कि कभी कभी चाँद,
मेरी खिड़की पर आता है,
इसी खालीपन में,
कोई कहता है,
कि लिखना बकवास है,
किसी को बुरा लगता है,
ये क्या महज़ एहसास है.
इसी खालीपन में,
कुछ पहचान है,
कुछ गलतफहमियां हैं,
और उनमें उलझी,
रोज़ ज़ाले बुनती,
मेरे दीवारों की मकड़ियाँ हैं....

इसी खालीपन में,
शोखियाँ हैं, शरारे हैं,
इसी खालीपन में,
भावनात्मक दरारें हैं,
किसी रोज़,
इसी खालीपन के,
पानियों में धुल जाऊंगा,
किसी साबुन की तरह,
इसी खालीपन में,
घुल जाऊंगा,
कुछ समय तक,
झाग रहेगा,
फिर सब साफ़ हो जाएगा,
कहाँ दाग रहेगा,
और क्या कर सकता हूँ,
घुलने से पहले,
क्या ले जाऊंगा,
कुछ और दूँ न दूँ,
अपना खालीपन,
दे जाऊंगा....

अब ख्वाहिशें नहीं हैं,
नुमाइशें नहीं हैं,
इस खालीपन में,
फरमाइशें नहीं हैं,
फिर भी, अब भी,
पैरों के नीचे,
दबते पत्तों की,
आवाज़ होती है,
और इस खालीपन में भी,
मजबूरियों की,
मुमताज़ सोती है,
इस खालीपन में,
अब भी एक,
शाहेजहाँ जगता है,
इन सूखे पत्तों पर,
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है.................