इन सूखे पत्तों पर,
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है,
जैसे कोई गम नहीं है,
कुछ भरा भी नहीं है,
खाली है सब,
दूर तक....सब खाली है;
और इसी खालीपन में,
तुम्हारे होठों पर मुस्कां है,
और मेरे होठों पर,
गाली है,
और कितना भी,
हम अदला बदली करलें,
दूर तक....सब खाली है...
इसी खालीपन में,
एक दुनिया है,
जो थमती नहीं है,
जो गर्मियों में,
पिघलती नहीं है,
और ठण्ड में,
जमती नहीं है,
ये किसी के वजूद को,
तरसती नहीं है,
और कितने भी बादल घिर आयें,
जब चाहिए,
तब बरसती नहीं है.
इसी खालीपन में,
कुछ परिवार हैं,
माँ बाप हैं, यार हैं,
इसी में शौहर है, बीवी है,
एक प्यारी मुनिया है,
इसी खालीपन में,
एक दुनिया है....
इसी खालीपन में,
द्वन्द में जीना है,
इसी खालीपन में,
शांति से मरना है,
इसी खालीपन में,
दराजें हैं,
जिनमे तह करके,
रखी कुछ यादें हैं,
इसी खालीपन में,
मजारें हैं,
जिनमे सांस लेते,
कुछ अनकहे, अनसुलझे,
बेचारे हैं,
इसी खालीपन में,
चाँद है, तारे हैं,
और उनको बुहारने के,
अरमां हमारे हैं,
इसी खालीपन में,
कहीं की रात,
कहीं का सवेरा है,
कितना भी हम लड़ लें,
खालीपन में,
क्या तेरा है,
क्या मेरा है....
ये खालीपन,
हमारे साथ चलता है,
बंधनों के टूटने पर,
हाथ मलता है,
ये खालीपन,
ये भी समझता है,
कि ये शख्स कुछ ख़ास होगा,
तभी यह बावला,
उससे अक्सर लड़ता है.
और यही खालीपन,
याद दिलाता है,
कि कभी कभी चाँद,
मेरी खिड़की पर आता है,
इसी खालीपन में,
कोई कहता है,
कि लिखना बकवास है,
किसी को बुरा लगता है,
ये क्या महज़ एहसास है.
इसी खालीपन में,
कुछ पहचान है,
कुछ गलतफहमियां हैं,
और उनमें उलझी,
रोज़ ज़ाले बुनती,
मेरे दीवारों की मकड़ियाँ हैं....
इसी खालीपन में,
शोखियाँ हैं, शरारे हैं,
इसी खालीपन में,
भावनात्मक दरारें हैं,
किसी रोज़,
इसी खालीपन के,
पानियों में धुल जाऊंगा,
किसी साबुन की तरह,
इसी खालीपन में,
घुल जाऊंगा,
कुछ समय तक,
झाग रहेगा,
फिर सब साफ़ हो जाएगा,
कहाँ दाग रहेगा,
और क्या कर सकता हूँ,
घुलने से पहले,
क्या ले जाऊंगा,
कुछ और दूँ न दूँ,
अपना खालीपन,
दे जाऊंगा....
अब ख्वाहिशें नहीं हैं,
नुमाइशें नहीं हैं,
इस खालीपन में,
फरमाइशें नहीं हैं,
फिर भी, अब भी,
पैरों के नीचे,
दबते पत्तों की,
आवाज़ होती है,
और इस खालीपन में भी,
मजबूरियों की,
मुमताज़ सोती है,
इस खालीपन में,
अब भी एक,
शाहेजहाँ जगता है,
इन सूखे पत्तों पर,
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है.................
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है,
जैसे कोई गम नहीं है,
कुछ भरा भी नहीं है,
खाली है सब,
दूर तक....सब खाली है;
और इसी खालीपन में,
तुम्हारे होठों पर मुस्कां है,
और मेरे होठों पर,
गाली है,
और कितना भी,
हम अदला बदली करलें,
दूर तक....सब खाली है...
इसी खालीपन में,
एक दुनिया है,
जो थमती नहीं है,
जो गर्मियों में,
पिघलती नहीं है,
और ठण्ड में,
जमती नहीं है,
ये किसी के वजूद को,
तरसती नहीं है,
और कितने भी बादल घिर आयें,
जब चाहिए,
तब बरसती नहीं है.
इसी खालीपन में,
कुछ परिवार हैं,
माँ बाप हैं, यार हैं,
इसी में शौहर है, बीवी है,
एक प्यारी मुनिया है,
इसी खालीपन में,
एक दुनिया है....
इसी खालीपन में,
द्वन्द में जीना है,
इसी खालीपन में,
शांति से मरना है,
इसी खालीपन में,
दराजें हैं,
जिनमे तह करके,
रखी कुछ यादें हैं,
इसी खालीपन में,
मजारें हैं,
जिनमे सांस लेते,
कुछ अनकहे, अनसुलझे,
बेचारे हैं,
इसी खालीपन में,
चाँद है, तारे हैं,
और उनको बुहारने के,
अरमां हमारे हैं,
इसी खालीपन में,
कहीं की रात,
कहीं का सवेरा है,
कितना भी हम लड़ लें,
खालीपन में,
क्या तेरा है,
क्या मेरा है....
ये खालीपन,
हमारे साथ चलता है,
बंधनों के टूटने पर,
हाथ मलता है,
ये खालीपन,
ये भी समझता है,
कि ये शख्स कुछ ख़ास होगा,
तभी यह बावला,
उससे अक्सर लड़ता है.
और यही खालीपन,
याद दिलाता है,
कि कभी कभी चाँद,
मेरी खिड़की पर आता है,
इसी खालीपन में,
कोई कहता है,
कि लिखना बकवास है,
किसी को बुरा लगता है,
ये क्या महज़ एहसास है.
इसी खालीपन में,
कुछ पहचान है,
कुछ गलतफहमियां हैं,
और उनमें उलझी,
रोज़ ज़ाले बुनती,
मेरे दीवारों की मकड़ियाँ हैं....
इसी खालीपन में,
शोखियाँ हैं, शरारे हैं,
इसी खालीपन में,
भावनात्मक दरारें हैं,
किसी रोज़,
इसी खालीपन के,
पानियों में धुल जाऊंगा,
किसी साबुन की तरह,
इसी खालीपन में,
घुल जाऊंगा,
कुछ समय तक,
झाग रहेगा,
फिर सब साफ़ हो जाएगा,
कहाँ दाग रहेगा,
और क्या कर सकता हूँ,
घुलने से पहले,
क्या ले जाऊंगा,
कुछ और दूँ न दूँ,
अपना खालीपन,
दे जाऊंगा....
अब ख्वाहिशें नहीं हैं,
नुमाइशें नहीं हैं,
इस खालीपन में,
फरमाइशें नहीं हैं,
फिर भी, अब भी,
पैरों के नीचे,
दबते पत्तों की,
आवाज़ होती है,
और इस खालीपन में भी,
मजबूरियों की,
मुमताज़ सोती है,
इस खालीपन में,
अब भी एक,
शाहेजहाँ जगता है,
इन सूखे पत्तों पर,
चलते वक़्त,
कुछ अजीब लगता है.................
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