कभी कभी अपनी आवाज़,
किसी अनदेखे पहाड़ से,
टकरा कर,
वापस लौट आती है,
कभी कभी,
सुबह के इंतज़ार में,
रात के बाद,
फिर रात ही आती है,
जिंदगी तब,
बेईमान लगती है,
और बिलकुल नहीं भाती है;
कभी लाख कोशिशों के बावजूद,
एक राही छूट जाता है,
बहुत सँभालने पर भी,
कांच का गिलास,
टूट जाता है,
कभी अरमानों का पुलिंदा,
एक मन में,
सिमट नहीं पाता है,
और कितना भी,
खाद दो, पानी दो,
बगीचे का एक पौधा,
रोज़ सूख जाता है;
और ऐसे में,
उदास मन,
करवटों में हिलता है,
फटे हुए दिल के कपड़ों में,
कुछ पैबंद सिलता है.....
पर ये कोई टकराव नहीं,
कोई बिखराव भी नहीं,
जीवन की निशानी है,
कोई जमी हुई बर्फ नहीं,
बहता पानी है,
ये कभी मेरी कविता है,
कभी तेरी कहानी है;
रास्ते तो चलते रहते हैं,
और उन बंद मोड़ों पर,
ये पथिक,
जब चेहरा ज़रा घुमाता है,
किसी जादुई सिमसिम की तरह,
एक नया रास्ता,
पाता है;
थकन की उन शामों में,
तब फिर से हौसला,
आता है,
और उसी मेज़ पर,
कांच के टुकड़े नहीं,
वो एक नया गिलास,
सजाता है;
ये सब मात्र नजरिया है,
उन्ही आँखों से,
दोनों समां दिखता है,
दर्द खोजोगे तो दर्द,
वरना रहनुमा,
दिखता है,
अब बंद करो रोना,
तारों का टूटना कहाँ रुकता है,
ज़रा सी कोशिशों से नीरज,
तुम्हारे आँगन में,
ये सारा आसमां झुकता है....
किसी अनदेखे पहाड़ से,
टकरा कर,
वापस लौट आती है,
कभी कभी,
सुबह के इंतज़ार में,
रात के बाद,
फिर रात ही आती है,
जिंदगी तब,
बेईमान लगती है,
और बिलकुल नहीं भाती है;
कभी लाख कोशिशों के बावजूद,
एक राही छूट जाता है,
बहुत सँभालने पर भी,
कांच का गिलास,
टूट जाता है,
कभी अरमानों का पुलिंदा,
एक मन में,
सिमट नहीं पाता है,
और कितना भी,
खाद दो, पानी दो,
बगीचे का एक पौधा,
रोज़ सूख जाता है;
और ऐसे में,
उदास मन,
करवटों में हिलता है,
फटे हुए दिल के कपड़ों में,
कुछ पैबंद सिलता है.....
पर ये कोई टकराव नहीं,
कोई बिखराव भी नहीं,
जीवन की निशानी है,
कोई जमी हुई बर्फ नहीं,
बहता पानी है,
ये कभी मेरी कविता है,
कभी तेरी कहानी है;
रास्ते तो चलते रहते हैं,
और उन बंद मोड़ों पर,
ये पथिक,
जब चेहरा ज़रा घुमाता है,
किसी जादुई सिमसिम की तरह,
एक नया रास्ता,
पाता है;
थकन की उन शामों में,
तब फिर से हौसला,
आता है,
और उसी मेज़ पर,
कांच के टुकड़े नहीं,
वो एक नया गिलास,
सजाता है;
ये सब मात्र नजरिया है,
उन्ही आँखों से,
दोनों समां दिखता है,
दर्द खोजोगे तो दर्द,
वरना रहनुमा,
दिखता है,
अब बंद करो रोना,
तारों का टूटना कहाँ रुकता है,
ज़रा सी कोशिशों से नीरज,
तुम्हारे आँगन में,
ये सारा आसमां झुकता है....
No comments:
Post a Comment