Monday, May 2, 2011

कुछ सपन बंद हैं

इन लम्हों का,
शोर भी,
ख़ामोशी है...
कोई अंगूर नहीं,
फिर भी मदहोशी है,
इस ख़ामोशी में,
कोई जिंदगानी है,
जिसके बोलने की ताक़त..
रूहानी है,
माना कि मुलाकातों के,
लम्हे चंद हैं,
पर इन आँखों में भी
कुछ सपन बंद हैं,

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