Saturday, December 21, 2013

अपने में मशग़ूल हो गए हैं सभी,
त्याग औ प्रेम की क्या फुर्सत है अभी;
कैसे समझा पाओगे तुम अगली पीढ़ी को,
ये फरिश्तों की धरती होती थी कभी ;

Sunday, December 15, 2013

खाली समय कितना कुछ भर जाता है ; एक आँकलन, एक सोच … एक मन ही मन तैयारी ; एक उड़ान लेता जहाज़ किसी अपने के साथ, कहीं बुढ़ापे से रोज़ संघर्ष करता बुढ़ापा, गाँव में दस्तखत देता जाड़ा, ट्रेन का रिजर्वेशन, कॉलेज की फीस, पानी मांगते गमले, दोस्त, नौकरी, किराया, पेट्रोल  …… खाली समय कितना कुछ भर जाता है ;

सूरज चढ़ते चढ़ते ठहर सा जाता है; मोबाइल पर उँगलियाँ हरकत करके फिर खामोश हो जाती हैं; हकीकत से रुबरु होना एक सबब भी है और सबक भी;
जिन हथेलियों पर आँसू रोपे थे वहाँ दूब अब भी हरी है; ​
​मँडराने दो मेरे इर्द गिर्द इस अजीब सी बेचैनी को; कल फिर सोमवार आने को है ​
​; पहिये अपने आप चलेंगे। ​

Wednesday, December 4, 2013

रिश्तों में तूफाँ के मंज़र सहने पड़ते हैं,
दिलों के कर्ज़ भी ताउम्र भरने पड़ते हैं,
बेशक हों ख्वाब सीमित, नींदों तक 'नीरज',
कुछ समझौते तो फिर भी करने पड़ते हैं;

Saturday, November 30, 2013

भाग्य की रूमानियत है, या समय का है तकाज़ा,
छोड़ आये थे गली जो, उससे ही निकले जनाज़ा ;

सूरतें फिर से  पुरानी, किस्से भी सुने सुनाये,
चार पग दूजी डगर थी, फिर वही दिन लौट आये ;
गोल यूँ चक्कर लगाती, ज़िंदगी है या भंवर है,
चाहे जितना यत्न कर लो, डूबना 'नीरज' तो तय है;

Saturday, November 23, 2013


शीत के आगोश में बैठा जिगर,
आग में से फिर गुज़रना चाहता है;

आईना तुम भी पुराना भूल जाओ,
फिर कोई सूरत बदलना चाहता है;

दाग़ ये तन्हाइयोँ से न धुलेंगे,
इश्क़ देखो फिर सँवरना चाहता है;

बादलोँ से कह दो कर लें वे किनारा,
एक सूरज फिर निकलना चाहता है;

Thursday, November 7, 2013

कुछ लगामों के बंधन  … लगाने पड़ेंगे,
रूठे कुछ मेहरबां भी  ……. मनाने पड़ेंगे,
इंतज़ार में तो ये रात न ढलेगी 'नीरज',
अब दिन आयेंगे नहीं  …  बनाने पड़ेंगे।
कुछ सालों बाद तुम्हे देखा ; अब भी वैसे ही खड़े हो जैसे सब दिन से थे ; पता नहीं इतनी लम्बी ज़िंदगी तुम कैसे काट रहे हो ; न तो कभी तुम पर एक भी खज़ूर फला और न ही तुम किसी और   काम आये ; खड़े रहे वहाँ जहाँ दुआर ख़त्म होता है और खेत शुरू ; अर्से से तुम अपने सामने बोयी आलू को निहारते रहे  .... उन्हें हर साल खुदते हुए देखते रहे; तुमने सब देखा है अपनी ऊंचाई से  …चुपचाप .... कभी कुछ नहीं बोले और गाँव बदलता रहा।  तुम्हे याद भी है कि कभी हम तुम्हारे नीचे गोबर इकट्ठा करते थे और खाद बन जाने पर उसे खेतों में फेंक देते थे।  खाद उठाते वक़्त मेरे हाथ में जब बिच्छू ने डंक मारा था तब तुम बहुत हँसे थे शायद। आज तुम्हे देख कर  अचरज हुआ ; क्या तुम ज़रा भी नहीं बदल सकते थे ? तुम परिवर्तन कैसे हो सकते हो जब तुम खुद ज़माने से स्थिर हो;  पर परिवर्तन तो हुआ है तुम्हारे इर्द गिर्द। कच्चे घर गिर गए हैं और ईंटों के आश्रय बन गए हैं ; लोग पहले से अधिक धूर्त हो गए हैं ; यूरिया खेतों के पेट में अल्सर बन गयी है ; और तुम्हारे सामने बैलों की जगह अब ट्रैक्टर चलते हैं ; पर तुम कुछ नहीं बोलते  .... मूक बने रहते हो ।  तुम कितना मेरी तरह हो ; इसीलिए मेरे प्रिय भी हो ////

मेरी पैदाइश , मेरा गाँव , मेरे गवाह  ………

Tuesday, October 22, 2013

सादगी का जब सफ़र था, लगता था तुम ताज़गी हो,
लडखड़ाया तब ये समझा, वक़्त की नाराज़गी हो,
सोच कर निकले थे 'नीरज', शहर को पहचानने पर,
जब से रस्ते खो गए हैं, तुम मेरी आवारगी हो;
रोज़ सफाई करता हूँ इसकी नीरज,
जिंदगी है या फर्श मेरे कमरे का  ……

Friday, October 18, 2013

समूची रात एक चाँद नहीं सोख पायी। करवट बदलते बदलते सिलवट पड़ गयी बिस्तरे पर  …. पर वो देखता ही रहा मुझे। मैं अधखुली आँखों से उसे अपने से दूर करता रहा  …  पास का आलिंगन अब सहा नहीं जाता। हल्की हवा में पत्ते रात भर हिले  … जैसे दूर कोई सोहर गाता हो। ख्यालों की पंखुड़ियों के दरम्यान पलकें कब शिथिल हुईं आभास न हुआ। सुबह ऐसा क्यूँ लगा जैसे वह भोर में मेरे पास ही था।  मेरी हथेलियों पर उसके ठंडक की गरमाहट थी। क्यूँ खिड़की का एक पट खुला था।
……… मेरी खिड़की पर ये दस्तक यूँ ही न थी।
the evenings gone by brought so much joy,
to the times i grew up and since i was a boy;
to the schooldays in the park and the endless chat,
watching the night flying to the sounds of gnat;
bitching, joking, singing against the wall,
if nothing else there was always basketball;
to the day despair, agony and the endless wait,
the day went by and evenings were never late;
no obligations, commitments or settlement of score,
that wonderful evening in the balcony of bangalore;
the vendors, the bargains, the corn and prays,
those pavements was our way for a few days;
and though I wince to the cruelty of broken chain,
One would so like to live them all over again;
would still hope to wake the sun to the flowering quince,
but the evenings have never arrived the same since.....
--
Neeraj
तिनका तिनका जोड़ कर घोंसला बनाया,
क्या खबर थी लौट कर तूफान आया,
नियति है पर क्यों न हम उजड़ा बटोरें,
क्यों न तिनकों को कहीं से फिर से जोड़ें।

Wednesday, October 16, 2013

इंतज़ार की बरखा सूखी,
कब तक यूँ रूठेंगे अब्र,
क्या समझौता कर पायेंगे
मेरी भूख, तुम्हारा सब्र
अनिश्चित कुछ भी नहीं, निश्चित भी नहीं;  जो हो गया वह होना था , जो होगा वह होना है;  यह दिलासा नहीं, अध्यात्म नहीं, कोई आशा भी नहीं , किसी होनी अनहोनी की परिभाषा भी नहीं, यह तो बस यथार्थ है; जीवन का समय और समय का जीवन है।
उन दिनों के पलाश अब नहीं दिखते ; खुशबुओं का अम्बार इसी मकान की नींव में दफ़न है; एक लोटे पानी से अब प्यास नहीं बुझती ; बाल्टी भर नहाने पर भी शरीर गर्म ही रहता है। एक और दशहरा विजय चाहता है  …. पर कैसे !
कभी कभी बीती रातों का ज्वर सुबह ही तपता है।  ठंडक का थोड़ा धुआँ जलाना होगा !
यादों की मीठी स्याही से,
तन पर लिपटे कागज़ पर,
किसी छुअन की एक कलम से,
सिहरन के एहसासों पर,
अपने इन बेसुध भावों से,
तेरे पूर्ण समर्पण पर,
सब कुछ भी निचोड़ कर प्रियतम,
कर दूँ तुझको अर्पण पर  ….
कैसे मैं संगीत लिखूंगा,
अब बस मन में गीत लिखूँगा ;

Monday, September 16, 2013

विकल ह्रदय के मनोभाव में,
जिज्ञासा के इस प्रभाव में,
सफल जनों के हाव भाव में,
जीवन के मौलिक स्वभाव में,
चाहे मुझको शापित कर दो, 
पर मुझको स्थापित कर दो

Friday, September 13, 2013

इकट्ठा करके बिखरे ख्वाबों को, हमने टुकड़े थे यूँ सदा ढोये,
जैसे कोई जोत ले इन खेतों को, और फिर उम्र भर नहीं बोये;
कभी यूँ भी मेरी राहों में, कुछ अज़ीज़ मिले हैं 'नीरज'
जैसे कोई दीया बुझा तो दे, और फिर रात भर नहीं सोये;

Saturday, September 7, 2013

खोने का डर और न पाने की शंका जब अपना मुहं बा देती ई तो खुद की परछाईं भी सर ओढ़ कर निकलती है  …. भरोसा भी किया और फैसला भी  …. फिर उलझन क्यूँ
सरकते सरकते दिन का लिहाफ चारपाई के नीचे लटक आया  …. फिर रात की ठण्ड में दिलासा को ओढ़ा  …. सुबह फिर कभी वैसी नहीं आई
देर रात पड़ोस से कुछ चिल्लाने की आवाजें आयीं  … बालकनी में समय रुका रहा 
सुबह आठ बजे की खुली आँख नौ बजे तक बंद रही और सब दीखता रहा  ….
याद आया की आज तीज है और इतवार भी  ….  कुछ कपड़े बाल्टी में साँस रहे हैं
पानी की मोटर चलाई तो सन्नाटा हिला  …. सब कुछ करने को है और कुछ भी नहीं  …
एनादर सन्डे इज़ टीजिंग मी !

Wednesday, September 4, 2013

दूसरा कोई अब दौर न होगा ,
छिटकी रेतों पर गौर न होगा,
तलाशेंगे नए मुकाम 'नीरज'
पर तुझसा कोई और न होगा;

Saturday, August 31, 2013

तू गर राह में फरमान सा न आया होता,
मैं ही होता था यहाँ और मेरा साया होता,
खुशबुओं से कोई निशान भी नहीं होता,
कागज़ों से जो कहीं दिल को लगाया होता,

जिंदगी यूँ ही नहीं कटती रोजगारी में,
गर कमाने का हुनर खुद में ही पाया होता,
ऐसे सब लोग मुझे छोड़ कर नहीं जाते,
कुछ अगर दर्द कहीं मैंने भी छुपाया होता,
एक घर हम भी कहीं पर तो बनाते 'नीरज',
बेचना खुद को सलीके से जो आया होता,

Friday, August 30, 2013

बूढ़ी शाख

कभी देखा है,
किसी पेड़ की शाखाओं को,
जैसे मदमस्त हवा में,
झूमती बालाओं को,
कोई शाख तिरछी नज़रों सी,
कोई मीठी छूरी सी,
कोई हिरनी सी चंचल,
कोई अभी अधूरी सी,
पर एक शाख,
जिस पर वजन है लदा,
संभालना चाहती है खुद को,
पर झुकी रहती है सदा ,
फिर एक दिन वो,
किसी बवंडर में फंस जाती है,
पेड़ जवान रहता है,
शाख बूढ़ी हो जाती है;

बहुत कोशिश करती है,
झूलती है, लड़ती है,
पर हवा और वज़न के दबाव में,
टूटकर गिर पड़ती है,
आज देखा किसी टूटी शाख को,
ज़मीन पर पड़ी थी ढेर,
फिर देखा कहाँ से गिरी,
आदमी था या पेड़।

Sunday, August 25, 2013

ये बासी सी शाम और धुंधली पड़ती डगर,
कहीं मैं, कहीं दोस्त और बेखबर सा सफ़र,
बसेरों को उड़ते पक्षी, देखा बहुत था 'नीरज',
आज याद बहुत आया उन्हें देख, अपना घर।

Friday, August 23, 2013

लूट खसोट, अत्याचार,
निर्मम हत्या, नर संहार,
सरे आम गुंडई , दुर्व्यवहार ,
काली कमाई, भ्रष्टाचार,
कुपोषित बचपन, दुराचार,
यौन शोषण, बलात्कार,
क्यों नहीं रहा लड़ने का दम,
जितना सहते रहे उतना कम,
ज़रा सोचो सैंतालिस के बाद,
रूपया अधिक गिरा है या हम ?

--
Neeraj

Saturday, August 17, 2013

बची कोई भी अब फरमाइश नहीं है,
क्योंकि अब अंजाम की ख्वाहिश नहीं है;
थी विषम में ही सदा जीने की 'नीरज' आदतें,
इस सरलता में कोई गुंजाइश नहीं है ; 

Tuesday, August 13, 2013

यादें क्यों कर हैं जगती, क्या सोना भूल गयी हैं,
क्यों बेनामी हैं आँखें, क्या बहना भूल गयी हैं,
अब तितली नहीं समझती, कोमल पुष्पों की बोली,
कब से रसपान पर बैठीं, क्या उड़ना भूल गयी हैं;

Sunday, July 21, 2013

वो अनकही बात पर यकीन किया करता है,
अपने आसमानों को ज़मीन किया करता है,
कर के हर बार सरेआम से परदा 'नीरज ' ,
खामशी की नज़्म को ग़मगीन किया करता है ;

Saturday, July 20, 2013

कुछ सपन औ आस हमने भी गढ़े थे,
पाँव चादर से मगर शायद बड़े थे,
अब सयानी सी हकीकत घूरती है,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे …

जिंदगी अभिप्राय क्या औ क्या है दोहन,
मुरलियों की तान है ओझल है मोहन,
जम गए क्यों पग जहाँ पर हम खड़े थे,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे ….

बिन भरे ही खेत में ज्यों धान बोता,
स्वप्न तो बस स्वप्न जैसा ही है होता,
हंडियां भूतल में गहरे पर गड़े थे,
कैसे कैसे ख़्वाब लेकर हम चले थे ….


Sunday, July 14, 2013

पर यह अंतिम गीत नहीं है

अविरल नदियों के कल कल में,
झरनों के फैले अंचल में,
चुगती चिड़ियों के चह चह में,
वर्तमान घड़ियों के शह में,
माना वह संगीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;

निष्छल कोमल उजले मन में,
सरल ह्रदय के भोलेपन में,
रौशन क्रीड़ा के आँगन में,
खिलती आँखों के दर्पण में,
माना अब वह जीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;

दान दया के धर्म भाव में,
शवरी के जूठे स्वभाव में,
आतिथ्यों के अहो चाव में,
सूखी रोटी के प्रभाव में,
माना अब वह रीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;
किसी सखा के नए सृजन में,
प्रणय प्रिये के अंतस मन में,
भीगी पलकों की धड़कन में,
जीवन की छिटकी कतरन में,
माना अब वह प्रीत नहीं है,
पर यह अंतिम गीत नहीं है;

---------- Neeraj Tripathi

As everyone seeks more and broader connectivity, the still, small voice speaks only in silence.

Tuesday, July 9, 2013

जब जब लिहाफ़ की सिलाई उधड़ जाती है,
और नज़रें सुई का छिद्र नहीं खोज पाती,
जब लालटेन की रुसवाई उजाला सोख लेती है,
और सलाखों से बिलाव की चमकती आँखें घूरती हैं,
तब तुम कहाँ जाते हो,
क्यों नहीं व्योम बनकर गली में उतर आते हो !

उजली पोशाकों में करिया करवाता है,
कोयल की बोली में कौवा बतियाता है,
विज्ञान का अधमरा मानव क्यों न शर्मिंदा हो,
कैसे विश्वास करें कि तुम अब भी जिंदा हो,
यूँ तो अभी भी खेतों की सरसों पीली है,
पर कई ओसारों में भरोसे की मिट्टी गीली है….

Tuesday, June 25, 2013

बिजली का तार

अब घरों में बिजली का तार,
बाहर से नहीं दिखता,
हवा में नहीं हिलता,
कंसील्ड होता है,
दीवारों के भीतर चलता है,
और बाहर जीवन पलता है ...
बटन दबाते ही,
बल्ब जल जाता है,
पंखा चल जाता है,
कभी सोचा है,
इनमे करंट कहाँ से आता है,
कौन है जो दिखाई नहीं देता,
पर तपता है,
जो बटन और बल्ब के बीच की
दूरी में नपता है ....
बरसों तक ये तार,
घुटन में सांस लेता है,
अपने दोनों सिरे से छीला जाता,
और निर्दयता से कसा जाता है,
पर क्या कभी तार में भी,
कोई जुगनू जगमगाता है ....
ये कविता ,
बिजली की कार्यप्रणाली नहीं है,
स्थिर ...झेलता हुआ तार है,
बहता पानी नहीं है,
इस प्रणाली में हम,
कभी बटन कभी बल्ब हैं,
हमारा अपना संसार है,
पर हमें सींचता,
कोई कंसील्ड तार है,
वो कभी माँ कभी पिता,
भाई, बहन या यार है,
दीवारों में दफ़न सही,
पर वही सच्चा प्यार है,
और यदि हम उसकी उपेक्षा करें,
तो हमें धिक्कार है .....
इस मोहमयी जीवन में,
तभी होगा हमारा उद्धार,
जब हम भी बन सकेंगे,
कंसील्ड बिजली का तार।


Saturday, June 22, 2013

कोई चट्टान खिसक कर एक नया महकमा बनाती है। एक नया मुकाम, नया आयाम ....और फिर ऊपर देखती है जहाँ से वह आई है।
अपने नीचे नहीं देख पाती क्योंकि उसकी आँखें ऊपर को ही हैं। उसके लिए ये कोई त्रासदी नहीं ... वह पानी की गुलाम है और यह उसका अपना स्वभाव है।
नीचे से ऊपर जाना मंजिल की खोज है… ऊपर से नीचे इंसानी मंजिलों की खोज का परिणाम है।
पानी ऊंचाई नहीं ढलान देखता है और उन्ही ढलानों की तलहटियों में इंसान भगवान खोजता है।
यह महज़ प्राकृतिक आपदा नहीं, यह तो होता रहा है ...होता रहेगा। इंसान यहाँ ईंट सीमेन्ट से खेलता रहा ....बालू यहाँ पर्याप्त थी।
हर स्वार्थ धुंए की शक्ल में ऊपर इकट्ठा होता रहा .... और कई सालों के बाद बादल बन गया।
ऊपर से बादल को कुछ नहीं दिखता ...वो केसरी झंडा भी नहीं जो मंदिर के ऊपर फडफडाता है।
और तुम देख नहीं पाए ...तुम्हारी मंशाएं और थीं ...या शायद तुम्हारे पास दृष्टि का अभाव है।
हम अपने घरों में भगवान् नहीं ढूंढ पाए .... हमें भी अपनी तलाश है।
अब तो बस चितकबरी वर्दियों के आगोश में ही गर्माहट है। इस तरह से कब हेलिकॉप्टर में उड़ना चाहा था।
देश की खादी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मरे हैं तो क्या ...पैदा भी तो हो रहे हैं।
पहाड़ की तृष्णा पहाड़ ही जाने।
और कितने संकेत चाहिए ....अब वहां एक सैनिक छावनी मत खोल देना। ये जांबाज भी प्रकृति से नहीं लड़ पायेंगे।
.................................thinking aloud

Tuesday, June 18, 2013

यूँ बादलों को ओढ़े ज़मीं,
हवाओं में तैरती हुई नमी,
घर, चाय, चुस्की, नीरज,
पर किस कमी की है कमी .....

Saturday, June 8, 2013

मैं हाथ ऊपर उठाकर नहीं मांगता हूँ,
घंटियों को बजाकर नहीं मांगता हूँ,
कुछ अज़ीज़ आज हैं तेरे रहमोकरम पर,
मैं अपने लिए कुछ नहीं मांगता हूँ  ...

नहीं खून का कोई नाता है उनसे,
न कोई हिसाब है, न वादा है उनसे,
वो बस दिल की दरिया के ज़िन्दा सजल हैं,
मैं बहता हुआ तुमसे जल मांगता हूँ ...

तुम्ही ने तो दी है ये धड़कन दिलों की,
ये चेहरे की रंगत, मोहब्बत दिलों की,
तुम्ही ने तो साँसों का ज़ाला बुना है,
मैं अपना नहीं, उनका कल मांगता हूँ ....

पसेरियहवा

अबके आम न होई ....पर साल भा रहा। मैंने कुछ कौतूहल से उसकी ओर देखा तो उसे लगा जैसे मैं समझ नहीं पाया ...सो उसने मुझे खड़ी बोली में समझाने की कोशिश की। इस साल आम न होगा काहे की पर साल फला था। त्योरिस (दो साल पहले) भी नहीं फला था। अब मुझे आमों से वह लगाव नहीं है जैसा कुछ अरसे पहले हुआ करता था ..जब भोर होते ही दुआरे की खटिया छोड़ नंगे पाँव ही अरहर की खूंटियों को लांघते बाग़ में पहुँच जाता था। कुछ लोग अवश्य मुझसे पहले जागते थे पर इस बाग़ ने कभी मुझको पूर्णतया निराश नहीं किया। इतना तो मिल ही जाता कि अगली सुबह का इंतज़ार रहे।  यह एक सझिया बाग़ है ...सझिया इसलिए क्योंकि प्रत्येक पेड़ के कई हिस्सेदार हैं। किसी का एक बटा चार हिस्सा है तो किसी का एक बटा सोलह। एक परिवार बढ़ा तो उससे दो तीन अलग परिवार उपजे और जैसे जैसे परिवार बढ़े वैसे वैसे हिस्से बढ़े। वैसे तो हर साल ये पेड़ बौरों से लबालब होते हैं पर इनमे से कुछ ही एक साथ ढंग से फल पाते हैं। शेष अगले बरस का इंतज़ार करते हैं। बिलकुल उसी तरह जैसे हम अगले बरस का इंतज़ार करते हैं ...कि शायद अगले साल हमारे जीवन के पेड़ में भी आम लबालब फलें ...और फिर अगले बरस का ...और फिर अगले का। कभी कभी, कहीं कहीं जीवन समय के साथ हिलता डुलता तो है पर औसतन बिलकुल स्थिर प्रतीत होता है। मुझे याद है कि पिछली गर्मियों की छुट्टियों में जब मैं आया था, तब भी उसने यही कहा था ...अबके आम न होई ....पर साल भा रहा।
यूँ तो इस बाग़ में कई पेड़ हैं ; कुछ अभी जिन्दा हैं और कुछ मरणोपरांत यादों में जिन्दा हैं। इन सब के अलग अलग नाम हैं और उन नामों से जुड़ी हुई हैं कुछ कहानियाँ ....मटरअहवा जिसके आम छोटे और गोल होते हैं, मटर के दानों की तरह; अचरअहवा जिसके आम लम्बे होते हैं और उनमे जाली पड़ते ही उन्हें हाथों से अचार के लिए तोड़ लिया जाता है; घंटावह  जिसकी शाखों पर घंट बांधे जाते हैं ; करिययि जिसके आमों का बाहरी आवरण करिया होता है आदि आदि। अब तो इस बाग़ में गिनती के पेड़ बचे हैं; कुछ बूढ़े होकर मर गए और कुछ को मार दिया गया। जिन्हें मार दिया गया आज वहां खेत हैं जहाँ साल भर का चना पैदा होता है; आखिर देसी आमों से कितना पेट भरोगे ..... खटाई और अचार भर का तो दो-तीन पेड़ों से निकल ही आता है ; और यूँ भी इन दिनों अमावट (गाँव की मैंगो जेली) कौन खाता है। मुझे अब भी याद है जब बाग़ के दक्खिनी हिस्से में रातों रात वह विशाल पेड़ गिर पड़ा था जिसे सब पसेरियहवा कहते थे क्योंकि उसका एक एक आम पसेरी का हुआ करता था। हालाँकि उसके आम बहुत खट्टे थे और अधिकतर उन्हें अचार, खटाई और चटनी के लिए कच्चा ही तोड़ लिया जाता था पर वह पेड़ साल दर साल अपने इन भारी आमों को बहुत लगन से जीता रहा।  बुढापे में यह भार जब नहीं ढो पाया तो एक रात धम्म से धरती पर आ गिरा। महीने भर इसकी लकड़ियाँ कट कट कर गाँव में जाती रहीं और आज भी कई कच्चे घरों की छतों पर खपरैलों को अपनी छाती पर बिठाये साँस लेती हैं। पसेरियहवा जहाँ पर था, वहां कई सालों तक एक गड्ढा बना रहा जो बाद में हल की जुताई के बाद समतल हो गया। आप ने अमूमन ऐसे लोगों को देखा होगा जो बहुत मीठा नहीं बोलते पर जब तक जीते हैं, पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारियाँ ढोते हैं। उनका उपयोग पूरा कुनबा करता है और तनख्वाह मिलने से पहले ही खर्चे तैयार रहते हैं।  इसीलिए ऐसे लोग कभी पक नहीं पाते ...कभी पूरे नहीं हो पाते।  फिर एक दिन वो चले जाते हैं ...एक बड़ा सा रिक्त स्थान छोड़ कर पर बरसों तक वह परिवार उनके न रहने की पेन्शन पाता है। ऐसे लोग परिवार के पसेरियहवा होते हैं। जब तक परिवार को पेंशन मिलती है, तब तक ये दीवार की खूँटी में टंगे रहते हैं।
हम आप सब के घरों में एक पसेरियहवा होता है; वह पूरी शिद्दत से ताउम्र सब का बोझ उठाता है। क्या हम उसे पहचानते हैं या बस जानते हैं ?

Thursday, June 6, 2013

तुम्हारी चौखट पर ....बिखर जायेगी,
ये प्यासी प्रीति है ...किधर जायेगी,
जगा कर नींद से ... ख़्वाब दिखा दो मुझे,
कुछ उम्र लुत्फ़ से भी गुज़र जायेगी  .....

Saturday, June 1, 2013

रात ढली तब आवाजों से हमने लोगों को पहचाना,
पर कुछ बदल गयीं आवाजें हमने थोड़ी देर से जाना,
भोर जब हुई जाने माने चेहरे वही सयाने से थे,
अब क्या ग्लानि करे है मानव तब क्यों कोई बाँध न माना ;

उलझी डोरों को सुलझाते कैसे गुज़रा एक ज़माना,
कैसे संभली उखड़ी साँसें, कैसे बदला रोज़ ठिकाना,
बीते बरस अतीत हो चले लेकिन अब भी याद है 'नीरज',
एक दिवस जब छलक गया था हाथों से तेरे पैमाना।

Thursday, May 23, 2013

यूँ तो इस पसीने की जिद्द ही मेरा हासिल है,
पर पाने को अभी बहुत प्यास और भी है ......

Sunday, May 19, 2013

जब बेमतलब थी गर्मियां और सर्द भी,
और जम रही थी दिल की परत पर गर्द भी,
हार कर तब तुझसे फकत एक ही माँगा था,
पर वाह रे मौला!  दोस्त भी दिया और दर्द भी ..

Wednesday, May 15, 2013

ये शनै शनै सरकता समय,
कुछ और उभरती पीड़ा,
फिर बिखर जाने की शंका,
और न पाने का डर,
सांझ की अनमनी व्हिस्की,
कहीं भरोसे की हिचकी,
सान्त्वना का गिलास,
आशंकाओं की हथेली,
उसका सब्र,
मेरी अलग पहेली,
कोशिशों के थकान की,
ये कैसी लाचारी है,
क्यूँ अनदेखा कल,
आज पर भारी है ....

Tuesday, May 14, 2013

दूर तो हो गया  .... जो खास है,
फिर भी क्यों ग़म ... आसपास है,
इन सूखे पोखरों से समझा 'नीरज',
तू ही मेरा नीर .....तू ही प्यास है..

Saturday, May 11, 2013

जानता था धरती पर अंजुम नहीं थे,
खोजता था फिर भी जब तुम गुम नहीं थे, 
ये भी 'नीरज' ख़ोज अरसे से चली है,
जब भी सोचा मिल गए तुम ....तुम नहीं थे।

Thursday, May 9, 2013

उसे हम जीना चाहते हैं,
पर जी नहीं पाते,
चाह कर भी अमृत रस,
पी नहीं पाते,
पर उसे देख पाते हैं,
तस्वीरों में,
ख़्वाबों की अनमोल,
जागीरों में,
जहाँ यथार्थ से अलग,
और उसके सामंजस्य में भी,
एकाध इच्छा पलती है,
इस हकीकत की दुनिया से परे,
लेकिन सामानांतर,
एक और दुनिया चलती है .....
रुकी रैन गुज़रती, निश्चित ही सवेरा होता,
थोड़ा ही सही पर अपना भी बसेरा होता,
अब बहुत सोचने से क्या हासिल 'नीरज', 
कभी अपना कहीं ज़िक्र तो छोड़ा होता .... 

Friday, April 26, 2013

दिमागी कसरतों की कारस्तानी छोड़ आया हूँ,
भरोसे नींद के पिछली जवानी छोड़ आया हूँ,
नहीं जब बंद दरवाजों से हाले-दिल मिला कोई,
महज़ एहसास के दम पर निशानी छोड़ आया हूँ ....... :)

Thursday, April 25, 2013

इस सोते कुम्भकरण की नीयत कैसे भला जगाओगी ,
अब डूब चुकी तीनों दुनिया तुम कितना नीर बहाओगी,
इस कलयुग में रक्षा करने कोई घनश्याम न आयेंगे,
अब खुद ही शस्त्र उठा लो नारी या अबला रह जाओगी।
तुमने नवरात के व्रत रक्खे तुमने है कोख का दर्द सहा,
तुम रही प्रताड़ित सदियों से पर नहीं एक भी शब्द कहा,
भस्मासुर यूँ तो दुनिया के आज नहीं कल मरते हैं, 
उद्धार तो लेकिन तब होगा जब तुम दुर्गा बन जाओगी।
बहुत रही जननी भार्या और बहना बेटी बहुत रही,
ताउम्र सही पीड़ा लेकिन पीड़ा फिर भी बेशर्म रही,
अस्तित्व तुम्हारा जग में अब तो तब ही आदर पायेगा,
जब नरमुंड लिए हाथों में तुम काली बन जाओगी।

Tuesday, April 23, 2013

पत्ते अब सूख कर गिरने लगे हैं। हालांकि इस पार्क की ढलान पर असमतल रूप से फैली घास अब भी हरी है। बायीं ओर वही पगडण्डी है जो खुद ही इस ढलान पर अनायास ही उतर जाती है  ; मानो यही उसका स्वभाव है। अभी महीने भर पहले इसी पगडण्डी के दोनों तरफ अनेक रंगों में ढेरों फूल इसका साथ देते थे। अब तो महज़ उन फूलों के पौधों के अवशेष बचे हैं ... शायद कुछ बीज भी हैं जो इस भूरी मिटटी में सांस ले रहे हैं ..प्रतीक्षा में ....एक बसंत जाने को है पर एक और आयेगा ...संयम रखेंगे तो रंग फिर खिलेंगे। यूँ तो इस पगडण्डी पर मेरे पैर रोज़ फिसलते हैं पर कभी कभी मैं इसके दायीं और फैली घास पर बैठ जाता हूँ ...यहाँ से कुछ दूर तक दिखता है। आगे छितरे हुए छोटे छोटे बबूल के पेड़ ...ढलान जहाँ ख़त्म होती है वहां निर्मित बड़ा पानी का फव्वारा जिसमे पानी बस बारिशों में जमा होता है ; फिर कुछ और पेड़ ; हवा में टंगा हुआ सा नेहरु प्लेस मेट्रो स्टेशन और उसके पीछे ऊँची इमारतें जिनमे रोज लोग ऑफिस की कुर्सियाँ तोड़ते हैं ...और सिमटे रहते हैं लैपटॉप के बस्तों में। उन इमारतों के नीचे एक बाज़ार लगता है जो सुबह बनता है और शाम को उजड़ जाता है। जहाँ लोग तख्तों पर रखकर सामान बेचते हैं और शाम को उसे बरसाती और रस्सियों के सहारे दफ़न कर देते हैं ; एक रात के लिए। अगले दिन फिर उसे जिंदा करते हैं और साथ ही जिंदा रहते हैं कई चूल्हे जो कहीं इन बरसातियों के अन्दर सांस लेते हैं। खैर, वह बाज़ार यहाँ से नहीं दिखता पर यदि आप वहां गए हैं तो उसे यहाँ से महसूस कर पाना मुश्किल नहीं है। यह सब कुछ कितना सरल होते हुए भी कुछ अजीब है क्योंकि यहाँ तो मैं अकेला घास पर बैठा एक ठहरी दुनिया देख रहा हूँ पर वहां वही दुनिया भाग रही है। या शायद मैं वही देख रहा हूँ जो देखना चाहता हूँ। 

यह पगडण्डीनुमा रास्ता ही मेरे कौतूहल का विषय है। कुछ देर यहाँ घास पर बैठकर लोगों को आते जाते देखना, उनके हाव भाव पढ़ना, मनोस्थिति समझना और फिर स्वयं पर ही हँसना .....कि कैसे आदमी हो; ये दिल्ली है और यहाँ पर व्यक्ति को स्वयं अपने विषय में सोचने की फुर्सत नहीं और एक तुम हो कि इसे अपना टाइमपास बना रहे हो ! नेहरु प्लेस से आता हुआ व्यक्ति इस रास्ते को हांफ कर चढ़ता है हालाँकि चढ़ाई कोई विशेष नहीं है पर धन्य है हमारा आज का खान पान और रहने के तौर तरीके की तनिक सी चढ़ाई खटक जाती है। मज़े की बात है की ढलान पर उतरने वाला व्यक्ति भी बहुत संभल कर उतरता है कि संतुलन बना रहे। जितना समय इस ढलान पर उतरने में लगता है उसका दोगुना चढ़ने में। कुछ कुछ जिंदगी की तरह; जैसे धीरे धीरे हौसले के साथ ऊपर चढ़ता व्यक्ति गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते हांफ जाता है और फिर जब समय उसे नीचे धकेलता है तो काफी सम्भालने की कोशिशों के बावजूद व्यक्ति दोगुनी रफ़्तार से नीचे चला जाता है। इस रास्ते पर सब तरह के लोग दिखते हैं; वह बूढी औरत जो चलते चलते बार बार रुक कर सांस भरती है; वह अधेड़ आदमी जिसे ऑफिस का बैग इस रास्ते पर बोझ लगता है, वह जवान जोड़ा जिसने आपस में हाथों को जकड़ रखा है ताकि न तो गिरें और न ही साथ छूटे ; ये अलग बात है कि जिंदगी के इन रास्तों पर उनमे से चंद ही साथ दे पायेंगे। इकहरे बदन का वह लड़का जिसे अपने मोबाइल फोन के प्यार के आगे इन रास्तों का आभास भी नहीं होता; वह लड़की, संभल कर चलती हुई क्योंकि ऊँची हील से ही उसका कद कद लगता है; या वे बच्चे जिन्हें ये रास्ता महज़ खेल लगता है। मैं बैठा हुआ चुपचाप इस ठहरे हुए रास्ते पर चलते हुए जीवन को देखता हूँ।

Sunday, April 21, 2013

कभी दिलवालों की रही, अब दरिंदों की है,
क्यों तेरे इस शहर में भूचाल नहीं आता,
वाह री लेखनी तेरी रोशनाई में,
लिखने के लिए अब ख़याल नहीं आता,
यूँ ही गुज़र जायेगी रही-सही 'नीरज',
अब किसी के लहू में उबाल नहीं आता।

Monday, April 15, 2013

अरसे बाद बात हुई,
न उसने पहचाना,
न हमने बताया,
कुछ देर तक सिलसिला,
यूँ ही चला,
फिर बताना पड़ा,
हूँ वही सिरफिरा,
आभारी हूँ,
कुछ ऐसे लोगों का भी,
जो आज बस आभास हैं,
पर किन्ही दिनों के,
बेहद ख़ास हैं,
जो बीती हवाओं के झूले पर,
झूलते नहीं,
याद नहीं रख पाते,
पर भूलते नहीं ...
सुबह सुबह अनजाना सा एहसास,
पलकों से ख़ुमारी हटाता है,
जबकि मैं मेरे साथ ही रहता हूँ तो,
मेरा दरवाज़ा कौन खटखटाता है,

Sunday, April 14, 2013

यूँ तो गुज़री साँसों का कुछ पल अब तक खलता है,
पर बेढंगी उम्मीदों में भी एक परिंदा पलता है,
कब तक 'नीरज' बीती घड़ियों में जिंदा रह पाओगे,
कुछ ज़ख्मों के साथ सही जीवन तो आगे चलता है ..

Saturday, April 13, 2013

अब ....... जब,
बूढ़े बरगद में गूलर नहीं लगती,
और चौपाल की सीमेंट उधड़ गयी है,
कल्लू के दुआरे का इनारा सूख गया है,
और बौरों का अम्बियों से मन रूठ गया है,
अब ........ जब,
साइकिल पर मलाईवाला नहीं आता,
और यहाँ कोई सोहर नहीं गाता,
कुंजड़े को मरे सात बरस हुए,
कोई यहाँ चूड़ी नहीं लाता ,
अब…. ....जब,
एक अरसा गुज़र गया,
और अंखियन से मन भर गया,
तुम क्या बतलाने आये हो,
किसकी सुध लेने आये हो…. 

Wednesday, April 10, 2013

हर टीस को जबरन जताने की ज़रूरत क्या है,
नमी सहेज, खुद को सताने की ज़रूरत क्या है,
जो समझते नहीं, उन्हें बता कर क्या हासिल होगा,
जो समझते हैं, उन्हें बताने की ज़रूरत क्या है  .....

Friday, April 5, 2013

अब नहीं जुड़ पाते हैं अरमां घरोंदे की खातिर,
तबीयत खर्चों की बेहिसाब रहती है मुझसे,

जिंदगी की गुफ्तगू में हम भी शामिल हैं मगर,
लफ्ज़ की अदायगी चुपचाप रहती है मुझसे,

अब नहीं दिख पाते हैं चेहरे मेरी अलमारियों में,
कोई नामौजूदगी आसपास रहती है मुझसे,
तेरे गिले शिकवों का दौर शायद कुछ लम्बा चले,
फुर्सत इन दिनों नाराज़ रहती है मुझसे ...
                           

Sunday, March 31, 2013

झरोखे

कुछ झरोखे हैं खुले हुए,
और कुछ अधखुले से,
विवशताओं में घुले से,
कुछ के पाट बंद हैं,
उनपर शायद कुछ पाबंद हैं,
कुछ ज़रा तरल से थे,
ढलान के साथ बह गए,
कुछ जमे हुए थे,
जो गर्मियों में पिघल गए,
कुछ ज़रा जिद्दी थे,
मौसम बदलते रहे,
पर वे
बस रह गए ....
यूँ सोचूं तो लगे है,
मीठी यादों से भरे,
ये कल और आज के सपने हैं,
झरोखे चाहे बंद हों या खुले,
ये सब मेरे अपने हैं,
ये कुछ लोग हैं,
जो मिले हैं राह में,
और अनुभूतियों का ,
एक वंश छोड़ गए हैं,
चाहे संपर्क में हों या दूर रहें,
मेरे अन्दर ,
अपना एक अंश छोड़ गए हैं .... 

Friday, March 29, 2013


वास्तविकता भी वास्तविकता से कितनी भिन्न हो सकती है, यह शहर मुझे बताता है। बेजान सड़कों की लम्बाईयों को नापती बेशुमार गाड़ियाँ और उन्ही गाड़ियों में दौड़ती जिंदगी। सब भाग रहे हैं; किसी और की खोज में ... और खोते जा रहे हैं स्वयं को ..एक और स्वयं पाने के लिए। यह शहर दोहरी वास्तविकता का सब से सजीव उदहारण है जो आप को नए आयाम दिखाता है, नई बोली सिखाता है, नई पहचान दिलाता है, नई प्रतिभाओं से मिलाता है ...बस आपका आपसे मेल नहीं करा पाता।

Wednesday, March 27, 2013


गुमसुम सी आँखों में हरी मुस्कान लाऊंगा,
ख्यालों में ही सही, बुलाओगे तो आऊंगा,
दिलों की आरज़ू शायद कभी न बन पाऊं पर,
मैं कोई साया नहीं जो अंधेरों में छोड़ जाऊँगा ..
                               --neeraj tripathi

Monday, March 25, 2013

धूप हुई ओझल नज़र से रात भी कुछ कह गयी,
शाम थीं दोनों सहेली फिर अकेली रह गयी,
एक जाने के लिए थी एक का आना था तय,
मिलन की इस कश्मकश में इक नवेली रह गयी,

उलझनों की भीड़ में खोकर ये जाना हमकदम,
प्रीत है ऐसी की कोई पल में जी ले दो जनम,
हर किसी को शाम में मिलता कहाँ दोनों जहाँ,
लाख सुलझाई मोहब्बत इक पहेली रह गयी .
                            .......  neeraj tripathi

Friday, March 22, 2013

तोहसे बस इतनी अरज गिरधारी,
अब के फागुन हमरी भी होवे पिचकारी ...
अक्सर बोलती हुई इन फिज़ाओं पर,
ज़बरन एक ख़ामोशी सी पसर आई है,
अवकाश है ये, सितारों ज़रा सब्र करो,
ये न सोचना की चाँद की सगाई है .....

Thursday, March 21, 2013

हम हैं ......................बस है,
तुम हो ..................... रस है,
बस इतना ही सच है ..

Sunday, March 17, 2013

निज़ी तुम थे,
और निज़ी थी वो बातें,
गुजरी थीं जिनमे रातें,
ऊँची मंजिलों के छज्जों पर,
आज सब आम होते देख,
दुःख होता है ...
माना मैं बुद्धिजीवी नहीं,
कार्यकुशल नहीं,
बड़ा भी नहीं,
पर आदमी तो हूँ ......

Saturday, March 16, 2013

तब था दिल को आज़माया, अब दिखाते हो बही,
इस भड़कती भीड़ में तुम भी सही, हम भी सही,
क्या बदल पाओगे 'नीरज' ज़िल्द अपनी पुस्तकों की,
सोचने को बहुत कुछ है, हल मगर कुछ भी नहीं।

Friday, March 15, 2013

....एक और अँधेरे का छिपना
....एक और भोर का बहकना
....एक और ख्व़ाब का जगना
....एक और सूरज का उगना
....एक और दिन का निकलना
.... एक और उम्मीद का संवरना 
दिशाओं को लकीरों से मिलाइये
जीने के लिए और क्या चाहिए ....

Tuesday, March 12, 2013

तब तुम नहीं रुके और एक बसंत गुज़र गया,
आज तुम नहीं हो तो इक और गुज़र जाएगा,
ये मौसम जिंदगी की मज़बूरियों का मोहताज़ नही, 
कल तुम रहो न रहो, फिर बसंत ज़रूर आएगा .....

ये ऊँचा नीचा रास्ता पार करने में मुझे कुछ पंद्रह मिनट का समय लगता है। इस्कॉन मंदिर के पीछे निकलता ये रास्ता मुझे नेहरु प्लेस मेट्रो स्टेशन ले जाता है  जहाँ से मैं ऑफिस के लिए मेट्रो ट्रेन पकड़ता हूँ। ये पंद्रह मिनट मेरे दिन के सब से सुखदायी क्षण हैं। एक भागती दुनिया के बीच में ठहरे हुए पंद्रह मिनट ...इन्हें मैं पूरा जीता हूँ। एक महीने के अंतराल के बाद जब दिल्ली लौटा और इस पथ पर अपने कदम बढ़ाये तो एक विस्मृत करने वाली रंग-बिरंगी छटा देखने को मिली। लाल हरे सफ़ेद पीले बैंगनी और न जाने कितने ही रंग फ़ैल गए हैं इस मैदान के आँचल में ...यह अलौकिक है ...घर में पिताजी की तबियत बिगड़ जाने पर महीने भर पहले जब मैंने दिल्ली छोड़ी थी, तब यहाँ महज़ कुहासा सा फैला रहता था और जाड़ों की धूप में कुछ मजदूर लम्बी पाइपों से पानी छिड़कते रहते थे। वहां जब मेरी रातें अस्पताल के कमरे में चिंता और आशंका के बीच कट रहीं थी, तब यहाँ अनेकों रंगों में जीवन पनप रहा था। यह सब सरल होते हुए भी आश्चर्यजनक है ....होठों से लुप्त हुई मुस्कराहट अनायास ही लौट आती है। मेहनत को धरती ने स्वीकारा है और बताया है की हर ख़ुशी का समय होता है ...प्रयास और प्रतीक्षा का कोई तोड़ नहीं है।

Tuesday, March 5, 2013

किन्ही रातों में अचानक कोई ख़याल आता है,
बिना मदिरा के कैसे ये आलम बहक जाता है,
छोड़ कर रस्मोरिवाज़, लाँघ दीवारेतहज़ीब,
ये मचलता बेतुका मन कहाँ कहाँ जाता है ....

Monday, March 4, 2013

काश हमारे दिल का भी इक कोना ज़रा सुनहरा होता,
काश तुम्हारे जेवर में कुछ उसके अंश का पहरा होता,
होता काश जिंदगी में दुःख का दरिया उथला उथला सा,
काश हमारे सुख का सागर सब रंगों से गहरा होता ......

Sunday, March 3, 2013

मूक आईना,
खामोश प्रतिबिम्ब,
और चुप्पी साधे परछाई,
अक्सर बहुत शोर करते हैं।
रोज़ इस शोरगुल में,
अपना अक्स ढूंढता हूँ,
इधर उधर से मिला जुला कर,
एक स्वयं बनाता हूँ,
और शोर में खो जाता हूँ,
एक दिन और गुज़र जाता है,
पर अगले दिन भी आईना बोलता नहीं .....

Wednesday, February 20, 2013

इंतज़ार खुली आँखों से गुज़र रहा है आहिस्ता,
ये अस्पताल की रात है ....ये कभी सोती नहीं ....

Monday, February 18, 2013

ये जो उधड़े  हुए धागे ज़मीं पर फैले हैं,
उस पुरानी चादर की बूढी कतरने हैं,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें हैं,
सफ़ेद बाल हैं, झुर्रियों में सिमटे लम्हे हैं,
अब तो बस लटकी चादर धागों को गिरते देखती है,
अब इन धागों को इकट्ठा करने से सुबह नहीं बनती ....

Saturday, February 2, 2013

गुज़रती हवा के पन्ने पर,
आड़ी तिरछी रेखाएं,
मिलती नहीं,
कोई त्रिभुज या प्रकार नहीं बनाती,
बस पड़ी रहती हैं औंधे मुहं,
कोई आकार नहीं बनाती ....
ये वह है जो पाया है,
वह भी जो नहीं पाया,
और कितना भी निरर्थक लगे,
यह नहीं होता कभी ज़ाया,
कोई कहता ये यादें हैं,
या महज़ मीयादें हैं,
कोई अनुभव बताता है,
कोई बस सोच में डूब जाता है,
सब की अलग अलग रेखाएं हैं,
कई हादसे हैं, कुछ भावनाएं हैं,
कइयों के लिए,
बीता हुआ वनवास है,
कुछ हंस कर कहते हैं,
ये पुराना उपहास है,
अच्छा हो या बुरा,
खोटा हो या खरा,
हम जानते हैं,
ये हमारा इतिहास है ...
हवा में पन्ने अब भी लिखे जाते हैं,
प्रतिदिन,
और लहराते रहते हैं ये,
उद्देश्य के बिन,
इन पन्नों की लिखावट,
यादों में सिमट जाती हैं,
और छोड़ जाती हैं पीछे,
रेखाएं भिन्न,
कुछ स्मृतियाँ,
कुछ  पदचिन्ह ...
                  neeraj

Thursday, January 31, 2013

हम तो पहले से सैनिक थे,
लड़ना हमें गंवारा है,
कर लो तुमको जो मन भाए,
ये साम्राज्य तुम्हारा है ....
Translation

After a while you learn the subtle difference
Between holding a hand and chaining a soul,
And you learn that love doesn't mean leaning
And company doesn't mean security.
And you begin to learn that kisses aren't contracts
And presents aren't promises,
And you begin to accept your defeats
With your head up and your eyes open
With the grace of a woman, not the grief of a child,
And you learn to build all your roads on today
Because tomorrow's ground is too uncertain for plans
And futures have a way of falling down in mid-flight.
After a while you learn...
That even sunshine burns if you get too much.
So you plant your garden and decorate your own soul,
Instead of waiting for someone to bring you flowers.
And you learn that you really can endure...
That you really are strong
And you really do have worth...
And you learn and learn...
With every good-bye you learn.

― Jorge Luis Borges


वह हल्का सा अंतर हाथ थामने और रूह बाँधने का,
समझ जाते हो तुम, कुछ समय के बाद,
और समझ जाते हो तुम कि प्यार का अर्थ आश्रय नहीं,
और न ही संगत का अर्थ सुरक्षा है,

और समझने लगते हो तुम की चुम्बन इकरारनामा नहीं,
और न ही तोहफे हैं कोई वादा,

और आरंभ कर देते हो तुम मानना शिकस्त को,
सर उठा कर, आँखों को खोलकर,
बालक के वियोग की तरह नहीं, स्त्री की मनोहरता की तरह,

और सीखते हो तुम अपने रास्ते वर्तमान में बनाना,
क्योंकि कल किसी भी योजना के लिए अनिश्चित है,
आर भविष्य की तो फितरत है बीच उड़ानों से गिरना,

कुछ समय पश्चात तुम सीखते हो,
कि अत्यधिक धूप भी जला देती है,
तो बजाय इसके कि कोई लाये गुलदस्ता तुम्हारे लिए,
तुम अपनी क्यारी लगाते हो, अपनी रूह संवारते हो,
और सीखते हो कि तुम सच में सह सकते हो,कि तुम सच में ताक़तवर हो,
और तुम्हारा अपना भी मोल है,और सीखते ही रहते हो तुम,
हर ज़ुदाई के बाद .......

Tuesday, January 29, 2013

वक़्त को कुछ गुनगुनाना रह गया,
दोहराना किस्सा पुराना रह गया,
सांझ 'नीरज' ढल गयी आवेश में, 
कितना कुछ सुनना सुनाना रह गया ....

Thursday, January 24, 2013

कभी कुछ, तो कभी कुछ और, मसला रह गया ,
कितने ही रावण जलाये एक पुतला रह गया,
वक़्त 'नीरज' सोचा था कभी सुधरेगा आगे,
आगे बढ़ना चाहा तो हिसाब पिछला रह गया  ..

Saturday, January 19, 2013

उसे देखते हुए आँख हौले से मुंद जाती है,
शायद वह मेरे साथ ही सो जाती है,
जिंदगी अब कहाँ अकेली सी लगती है,
मेरे साथ साथ सुबह की छत जगती है ....

Wednesday, January 16, 2013

पढ़ते हुए चेहरों का अम्बार मत बनाओ,
मैं जैसा हूँ रहने दो, अखबार मत बनाओ,
एक दिन खुद ही जमाने सा बन जाऊंगा,
आज मेरे दिल का पुरस्कार मत बनाओ।
ये कैसा इम्तिहान है नतीज़ों का,
आरजू का संसार खोता जा रहा है,
अब तो कोई युक्ति लगाओ 'नीरज'
सब्र भी बेआबरू होता जा रहा है .....

Monday, January 14, 2013

भूख तो दो पर मुझे कुछ कौर भी दो,
ऐ मेरे विस्तार मुझे कुछ और भी दो,
हवाओं में ढके चेहरे,
सुबह के वह रंग सुनहरे,
अमावस का सोया चाँद,
थोडा सा खोया उन्माद,
बिखरता पर सजता विज्ञान,
खुशबुओं का झूठा ज्ञान,
दिवस की वह दिशा निराली,
रात की मदहोश लाली,
झांकती किरणों में वनवास,
विवाहिता का उपवास,
मुरझाये पुष्प की कहानी,
बारिशों की बेईमानी,
ओस का अधजिया जीवन,
धूप का पिघला हुआ मन,
वो हया के गुसलखाने,
फिर वही भूले बहाने,
पंचवटी की तलहटी,
बचपना अबोध हठी,
भावों की वह चित्रकारी,
बेबसी मेरी तुम्हारी,
भूख तो दो पर मुझे कुछ कौर भी दो,
ऐ मेरे विस्तार मुझे कुछ और भी दो,

                              

Sunday, January 13, 2013

ज्वार का वेग है, आता जाता रहेगा,
तुम सागर हो ... कुआँ नहीं,
ये जो बिखरा है धरती की छाती पर,
महज़ धुंध है ... धुंआ नहीं।

Tuesday, January 8, 2013

इन जाड़ों में,
कुहासे से ढके तन को,
ओस से भीगे मन को,
ठिठुरती भावनाओं को,
कांपती आशाओं को,
हाथ सेंकती धीरता को,
रजाई में लुकी वीरता को,
कुछ हद तक हम वापिस लायें,
आओ थोड़ी धूप जगाएं ........

Friday, January 4, 2013

वाह री मर्दानगी तेरा कथन लचीला हो गया,
देख कर जनता की ताक़त, लाल पीला हो गया,
क्या कभी सोचा है तूने बारिशों के भी अलावा,
लोचनों पर मेघ पिघले, आँचल गीला हो गया;

Thursday, January 3, 2013

होंठ सिल दोगे तो भी क्या हासिल होगा,
अब ये मुस्कान आँखों से गुज़रना चाहती है ...

Wednesday, January 2, 2013

गुजरता वक़्त और भागती अवस्था,
मेहनत पर वक़्त की शिथिलता,
पूस की ठिठुरन और जमता लहू,
अकस्मात पर वही रात हूबहू,
कुछ अपनों से दूर गुज़रते पल,
वही चिर परिचित कोलाहल,
नया आयाम पर खोने का डर,
अस्थिर पहचाना सा बवंडर,
कलेंडर नया, चरमराती व्यवस्था,
सांप सी लटकती वही प्रथा,
प्रतिकूल है आज पर कल जान जाओगे,
तुम भला मुझे क्या हरा पाओगे।