पत्ते अब सूख कर गिरने लगे हैं। हालांकि इस पार्क की ढलान पर असमतल रूप से
फैली घास अब भी हरी है। बायीं ओर वही पगडण्डी है जो खुद ही इस ढलान पर
अनायास ही उतर जाती है ; मानो यही उसका स्वभाव है। अभी महीने भर पहले इसी
पगडण्डी के दोनों तरफ अनेक रंगों में ढेरों फूल इसका साथ देते थे। अब तो
महज़ उन फूलों के पौधों के अवशेष बचे हैं ... शायद कुछ बीज भी हैं जो इस
भूरी मिटटी में सांस ले रहे हैं ..प्रतीक्षा में ....एक बसंत जाने को है पर
एक और आयेगा ...संयम रखेंगे तो रंग फिर खिलेंगे। यूँ तो इस पगडण्डी पर
मेरे पैर रोज़ फिसलते हैं पर कभी कभी मैं इसके दायीं और फैली घास पर बैठ
जाता हूँ ...यहाँ से कुछ दूर तक दिखता है। आगे छितरे हुए छोटे छोटे बबूल के
पेड़ ...ढलान जहाँ ख़त्म होती है वहां निर्मित बड़ा पानी का फव्वारा जिसमे
पानी बस बारिशों में जमा होता है ; फिर कुछ और पेड़ ; हवा में टंगा हुआ
सा नेहरु प्लेस मेट्रो स्टेशन और उसके पीछे ऊँची इमारतें जिनमे रोज लोग
ऑफिस की कुर्सियाँ तोड़ते हैं ...और सिमटे रहते हैं लैपटॉप के बस्तों में।
उन इमारतों के नीचे एक बाज़ार लगता है जो सुबह बनता है और शाम को उजड़ जाता
है। जहाँ लोग तख्तों पर रखकर सामान बेचते हैं और शाम को उसे बरसाती और
रस्सियों के सहारे दफ़न कर देते हैं ; एक रात के लिए। अगले दिन फिर उसे
जिंदा करते हैं और साथ ही जिंदा रहते हैं कई चूल्हे जो कहीं इन बरसातियों
के अन्दर सांस लेते हैं। खैर, वह बाज़ार यहाँ से नहीं दिखता पर यदि आप वहां
गए हैं तो उसे यहाँ से महसूस कर पाना मुश्किल नहीं है। यह सब कुछ कितना सरल
होते हुए भी कुछ अजीब है क्योंकि यहाँ तो मैं अकेला घास पर बैठा एक ठहरी
दुनिया देख रहा हूँ पर वहां वही दुनिया भाग रही है। या शायद मैं वही देख
रहा हूँ जो देखना चाहता हूँ।
यह पगडण्डीनुमा रास्ता ही मेरे कौतूहल का विषय है। कुछ देर यहाँ घास पर बैठकर लोगों को आते जाते देखना, उनके हाव भाव पढ़ना, मनोस्थिति समझना और फिर स्वयं पर ही हँसना .....कि कैसे आदमी हो; ये दिल्ली है और यहाँ पर व्यक्ति को स्वयं अपने विषय में सोचने की फुर्सत नहीं और एक तुम हो कि इसे अपना टाइमपास बना रहे हो ! नेहरु प्लेस से आता हुआ व्यक्ति इस रास्ते को हांफ कर चढ़ता है हालाँकि चढ़ाई कोई विशेष नहीं है पर धन्य है हमारा आज का खान पान और रहने के तौर तरीके की तनिक सी चढ़ाई खटक जाती है। मज़े की बात है की ढलान पर उतरने वाला व्यक्ति भी बहुत संभल कर उतरता है कि संतुलन बना रहे। जितना समय इस ढलान पर उतरने में लगता है उसका दोगुना चढ़ने में। कुछ कुछ जिंदगी की तरह; जैसे धीरे धीरे हौसले के साथ ऊपर चढ़ता व्यक्ति गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते हांफ जाता है और फिर जब समय उसे नीचे धकेलता है तो काफी सम्भालने की कोशिशों के बावजूद व्यक्ति दोगुनी रफ़्तार से नीचे चला जाता है। इस रास्ते पर सब तरह के लोग दिखते हैं; वह बूढी औरत जो चलते चलते बार बार रुक कर सांस भरती है; वह अधेड़ आदमी जिसे ऑफिस का बैग इस रास्ते पर बोझ लगता है, वह जवान जोड़ा जिसने आपस में हाथों को जकड़ रखा है ताकि न तो गिरें और न ही साथ छूटे ; ये अलग बात है कि जिंदगी के इन रास्तों पर उनमे से चंद ही साथ दे पायेंगे। इकहरे बदन का वह लड़का जिसे अपने मोबाइल फोन के प्यार के आगे इन रास्तों का आभास भी नहीं होता; वह लड़की, संभल कर चलती हुई क्योंकि ऊँची हील से ही उसका कद कद लगता है; या वे बच्चे जिन्हें ये रास्ता महज़ खेल लगता है। मैं बैठा हुआ चुपचाप इस ठहरे हुए रास्ते पर चलते हुए जीवन को देखता हूँ।
यह पगडण्डीनुमा रास्ता ही मेरे कौतूहल का विषय है। कुछ देर यहाँ घास पर बैठकर लोगों को आते जाते देखना, उनके हाव भाव पढ़ना, मनोस्थिति समझना और फिर स्वयं पर ही हँसना .....कि कैसे आदमी हो; ये दिल्ली है और यहाँ पर व्यक्ति को स्वयं अपने विषय में सोचने की फुर्सत नहीं और एक तुम हो कि इसे अपना टाइमपास बना रहे हो ! नेहरु प्लेस से आता हुआ व्यक्ति इस रास्ते को हांफ कर चढ़ता है हालाँकि चढ़ाई कोई विशेष नहीं है पर धन्य है हमारा आज का खान पान और रहने के तौर तरीके की तनिक सी चढ़ाई खटक जाती है। मज़े की बात है की ढलान पर उतरने वाला व्यक्ति भी बहुत संभल कर उतरता है कि संतुलन बना रहे। जितना समय इस ढलान पर उतरने में लगता है उसका दोगुना चढ़ने में। कुछ कुछ जिंदगी की तरह; जैसे धीरे धीरे हौसले के साथ ऊपर चढ़ता व्यक्ति गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते हांफ जाता है और फिर जब समय उसे नीचे धकेलता है तो काफी सम्भालने की कोशिशों के बावजूद व्यक्ति दोगुनी रफ़्तार से नीचे चला जाता है। इस रास्ते पर सब तरह के लोग दिखते हैं; वह बूढी औरत जो चलते चलते बार बार रुक कर सांस भरती है; वह अधेड़ आदमी जिसे ऑफिस का बैग इस रास्ते पर बोझ लगता है, वह जवान जोड़ा जिसने आपस में हाथों को जकड़ रखा है ताकि न तो गिरें और न ही साथ छूटे ; ये अलग बात है कि जिंदगी के इन रास्तों पर उनमे से चंद ही साथ दे पायेंगे। इकहरे बदन का वह लड़का जिसे अपने मोबाइल फोन के प्यार के आगे इन रास्तों का आभास भी नहीं होता; वह लड़की, संभल कर चलती हुई क्योंकि ऊँची हील से ही उसका कद कद लगता है; या वे बच्चे जिन्हें ये रास्ता महज़ खेल लगता है। मैं बैठा हुआ चुपचाप इस ठहरे हुए रास्ते पर चलते हुए जीवन को देखता हूँ।

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