Thursday, April 25, 2013

इस सोते कुम्भकरण की नीयत कैसे भला जगाओगी ,
अब डूब चुकी तीनों दुनिया तुम कितना नीर बहाओगी,
इस कलयुग में रक्षा करने कोई घनश्याम न आयेंगे,
अब खुद ही शस्त्र उठा लो नारी या अबला रह जाओगी।
तुमने नवरात के व्रत रक्खे तुमने है कोख का दर्द सहा,
तुम रही प्रताड़ित सदियों से पर नहीं एक भी शब्द कहा,
भस्मासुर यूँ तो दुनिया के आज नहीं कल मरते हैं, 
उद्धार तो लेकिन तब होगा जब तुम दुर्गा बन जाओगी।
बहुत रही जननी भार्या और बहना बेटी बहुत रही,
ताउम्र सही पीड़ा लेकिन पीड़ा फिर भी बेशर्म रही,
अस्तित्व तुम्हारा जग में अब तो तब ही आदर पायेगा,
जब नरमुंड लिए हाथों में तुम काली बन जाओगी।

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