रास्तों के जुगनू
Sunday, April 14, 2013
यूँ तो गुज़री साँसों का कुछ पल अब तक खलता है,
पर बेढंगी उम्मीदों में भी एक परिंदा पलता है,
कब तक 'नीरज' बीती घड़ियों में जिंदा रह पाओगे,
कुछ ज़ख्मों के साथ सही जीवन तो आगे चलता है ..
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