Thursday, December 29, 2011

excerpts from one of my writings

एक  दो  रोज़  में  हर  आँख  ऊब   जाती  है ;
दिल  को  मंजिल  नहीं  रस्ता  समझने  लगते  हैं ;
जिनको  हासिल  नहीं  व्हो  जान  देते  रहते  हैं ;
जिनको  मिल  जाऊं  व्हो  सस्ता  समझने  लगते  हैं .

कुमार  विश्वास  की  ये  पंक्तियाँ  इससे  सटीक  पहले  कभी  नहीं  बैठी . इन  अंधेरों  की  गर्मी  में  करवटें  बदलते  हुए  यूँ  प्रतीत  होता  है  मानो  इतिहास  दोहराया  जा  रहा  है ...या  फिर  वही    कथा  फिर  से  कोई  बांच  रहा  है  जो  अतीत  के  दरवाज़ों  को  आधा  खोल  देता  है ...न  अन्दर  का  पूरा  दिखाई  देता  है  न  बाहर  का . ये  आपकी  समझ  में  शायद  न  आये .

हम  बहुत  से  काम  अक्सर  ऐसा  करते  हैं  जिससे  दूसरे  को  दुःख  न  हो ....या  शायद  वह  खुश  रह  सके .... बचपन  में  ये  अच्छा  लगता  था ....बड़े  होते  होते  ऐसा  लगने  लगा  मानो  ये  कोई  त्याग  है ...किसी  दूसरे  का  हमारे  प्रति . और  अब  जब  एक  बार  फिर  से  बच्चा  बनने  का  जी  चाहता  है  तो  ये  एक  उपकार  लगता  है ...और  नींदों  में  मैं  चीखता  रहता  हूँ . 'मुझपर  उपकार  मत  करो '...मैं  कोई  ठहरी  हुई , लाचार   सी  वस्तु  नहीं ...मैं  कोई  भंवर  में  फंसी  नाव  नहीं ...कोई  डूबता  नाविक  भी  नहीं ....

मैं  भी  एक  अस्तित्व  हूँ ...एक  आकार...  अपने  अवगुणों  समेत  ..माना  की  मेरा  ढांचा  शायद  बेढंगा  है ...पर  सपने  मैं  भी  बुनता  हूँ ...हँसता  हूँ ...रोता  हूँ .... मेरा  अपना  शरीर  है  हाड़  मांस  का ...कटने  पर  अब  भी  लहू  रिसता  है ....इसका  भी  रंग  सुर्ख  है ...मेरा  भी  अपना  एक  चाँद  है ...उस  बादल   की  ओट  में ...धुंधला  ही  सही ...पर  अपना ...अलग  सा .

Wednesday, December 28, 2011

पता ही नहीं चलता....

कब बदल जाती है दिशा, हवाओं की,
कब बदल जाती है अहमियत, कुछ भावों की,
बदल जाती है कब महक फसलों की,
कब बदल जाती है शक्ल, हमशक्लों की,
पता ही नहीं चलता....

कब बदल जाता है वेग इन लहरों का,
कब बदल जाता है मौसम इन शहरों का,
बदल जाता है कब, महल कुछ सपनों का,
कब बदल जाता है अरमां कुछ अपनों का,
पता ही नहीं चलता....

कब किन्ही एहसानों की मियाद बदल जाती है,
कब अंधेरों में घुटन की सांस बदल जाती है,
बदल जाती है कब पहचान खारे पानी की,
कब बदल जाती है  हुंकार जवानी की,
पता ही नहीं चलता....

कब स्याह केशों का रंग बदल जाता है,
कब पिता और सेहत का संग बदल जाता है,
बदल जाता है कब धैर्य माँ के घुटनों का,
कब बदल जाता है संसार मेरे अपनों का,
पता ही नहीं चलता....

Wednesday, December 21, 2011

कागज़ का टुकड़ा

इस झोंपड़ी में,
आज एक मेमसाब आई,
समाजसेविका का गहना ओढ़कर,
बड़ी सी कार में,
आँखों का चश्मा सर पर डाले,
खुशबुओं का झोंका साथ लेकर,
बुढ़िया के पास पीढ़े पर बैठी,
साड़ी संभालकर,
हील नहीं दिखनी चाहिए,
बुढ़िया से नमस्ते किया,
फोटो खिंचवाई,
और पांच हज़ार का चेक दिया,
बुढ़िया कुछ न बोली,
ताकती रही उस कागज़ के टुकड़े को,
अब यही कागज़ का टुकड़ा,
उसकी दवा लाएगा,
यही दो जून की रोटी,
यही साग लाएगा,
यही झोंपड़ी में,
लालटेन जलाएगा,
यही टूटी खाट में,
नेवाड़ बुनाएगा,
ये कागज़ का टुकड़ा नहीं,
कीमत है एक बेटे की,
जिसे वक़्त ने नशेड़ी बनाया था,
ज़हरीली शराब ने जिसे,
मार कर जगाया था,
मेमसाब का काम ख़त्म हुआ,
झुक कर झोंपड़ी से निकली,
पर्स में से छोटा सा आइना निकाला,
थोड़ा चेहरे को संवारा,
और जैसे ही ऐनक,
सर से उतार कर ,
आँखों पर फैलाया,
पड़ोस का,
पांच साल का बालक,
जोर से चिल्लाया,
"तेले मस्त मस्त दो नैन,
 मेले दिल का ले दये तैन "

Tuesday, December 20, 2011

जादू

कागजों से फूल लाया,वाह क्या करतब दिखाया,
एक सिक्के से तो देखो सैकड़ों सिक्के बनाया,
इसको काटा, उसको जोड़ा, बदल दी कैसे काया,
वाह जादूगर जी तुमने दर्शकों को क्या लुभाया;

पर ये भ्रम पैदा किया है, आँखों की कमजोरियां हैं,
असल जादू तो तुम्हारे और मेरे अन्दर भरा है,
खोज पाओ यदि कभी तो, सृष्टि भी छोटी जगह है,
वरना यूँ ही जायेगी कट, जीने में फिर क्या धरा है;

ज़िन्दगी की जंग में  झेल सकता क्रूर शोले,
कठुर तृष्णा को अपनी सहृदयता में संजो ले,
मात्र मन की रोशनी से तिमिर में द्वार खोले,
वह ही सच्चा जादू है  सर पर चढ़ कर बोले;
न उन सरसरी निगाहों में, न ही रेशमी रुमालों में,
वो जवाब जो न मिल सके, छुपे बैठे थे सवालों में,
अब तो गुज़र चुका है मंज़र, ज़रा देर हो गयी 'नीरज',
वो संवरते रहे हकीकत में, हम बिखरते गए ख्यालों में ;

Friday, December 16, 2011

इस जाड़े के शाम की सहमी धूप अब गुज़र जाना चाहती है I गार्डेन पाम के वृक्ष सीधे खड़े हैं;  बिलकुल मौन जैसे निस्तब्धता को सार्थक कर रहे हों I बिजली के तारों पर बैठी चिड़ियाँ न जाने क्या आने या जाने की प्रतीक्षा कर रही हैं I लान में जबरन फैलाई गई हरी घास ओस से मिलन की आस में रात की बाट जोह रही हैं I अहाते की फेंसिंग पर लगे नारंगी फूल अब भी नारंगी ही दिखते हैं I बरगद की झूलती जडें धरती से चार फीट ऊपर ही रहती हैं I सब कुछ तो रोज़ की तरह ही है; बस एक और दिवस है जो भाग जाना चाहता है I मुझसे, तुझसे, हम सब से दूर.....कहीं और उजाला होगा; कहीं और कुछ हसरतें खुमारी आँखों में जगेंगी; कुछ रेशमी सी किरणें कहीं बर्फ पर पड़कर चांदी सी चमकेंगी; कहीं और दुनिया सजेगी; कहीं और जिंदगी चलेगी....

Thursday, December 15, 2011

भटकती प्यास

अचानक आँख खुली, रात अभी बाकी थी,
हवा में  झूलते सपन की गर्द अभी बाकी थी,
सरक रहा था लिहाफ बदन से क्यों आहिस्ता,
जब मेरी दालानों में सर्द अभी बाकी थी;

कभी कभी किस्मत कुछ इस तरह लजाती है,
ठंडी हथेलियों में जैसे ओस सिमट जाती है,
लांघ कर आँगन की डयेढी, लांघ ऊँची ये दीवारें,
ये भटकती प्यास है, ये कहाँ कहाँ जाती है,

Tuesday, December 6, 2011

एक कश्ती

उस पहाड़ के पीछे,
अब भी एक नदी बहती है,
वहीँ पर...चुपचाप,
किनारे पड़ी एक कश्ती है,
जिसकी बोझिल होती सी,
अपनी एक हस्ती है,
वह अपलक देखती है... दूर,
जहाँ नाविकों की बस्ती है;

अब वो इंतज़ार नहीं करती,
घूरती है रेंगते केकड़ों को,
अब ये नदी,
उससे प्यार नहीं करती,
शनैः   शनैः
इसकी उम्र ढल जायेगी,
लकड़ी ही है,
एक दिन पानियों में गल जायेगी;