Saturday, March 26, 2011

भावनात्मक दरारें

माता पिता की ज़ख्मों वाली पीठ,
को न सहलाना,
परिवार की मुस्कुराहटों में,
न मुस्काना,
दोस्तों की खामोशियों में,
चुप रह जाना,
अपनों के दिलों में,
न झाँक पाना,
हमारी मजबूरियां नहीं,
कमजोरियां हैं,
जो अक्सर अपने,
बंधनों के,
एक धागे को,
तोड़ जाती हैं,
भावनात्मक दरारें हैं ये,
नहीं भरो तो,
निशान छोड़ जाती हैं .

किसी शीतल सुबह,
अपनी हथेलियों में,
ओस की बूँदें भरो,
अपने अहं को कर किनारे,
उसमे मिलाओ,
प्रेम की बहारें,
और कर दो अर्पित,
अपनों को सारे.
ये कोई खाइयाँ नहीं हैं,
की न पाट पाओगे,
भावनात्मक दरारें हैं ये,
अपनों की अपनों से,
प्यार से समझ जाएँगी,
बहुत पानी नहीं चाहिए,
इनके लिए,
महज़ ओस से ही,
भर जाएँगी.


चेहरे पर बारह ही बजेंगे

वो कहती रही,
जिंदादिल नहीं हो क्या,
हमेशा मुहं लटकाए रहते हो,
चेहरे पर बारह बजाये रहते हो,
क्या खुश रहना भूल गए हो,
मुर्दों पर कविता लिखते लिखते,
खुद जिंदा रहना भूल गए हो ?

विस्मृत हूँ मैं,
पगली है वो,
कैसे समझाउं,
बड़की है वो,
जिंदादिली तो दिल में होती है,
चेहरे के भाव सब कुछ बयां नहीं करते,
और महज़ बालों की सफेदी से,
दिल बूढ़े नहीं हुआ करते

समझाना चाहा,
तो आफत हो गयी,
एक पगली पहले से ही थी,
एक और मिल गयी,
लगा एक खुबसूरत सी मज़ार पर,
कोई रेशमी चादर चढ़ गयी,
अब देखो मुझे,
मुहं तो अब लटक गया है,
और तमाम कोशिशों के बावजूद,
चेहरे पर वाकई,
बारह का घंटा,
बज गया है.

ऐसे में यदि,
मुझे छोड़ कर,
चले जाओगे,
पागलपन की ये बेमिसाल मिसालें,
जीवन में कहाँ पाओगे,
और कुछ हमारा भी ख्याल करो,
आज तो हमपर,
जिंदादिल ही हँसते हैं,
कल मुर्दे भी हंसेगे,
और जब घड़ी की दोनों सुइयां,
साथ में,
एक साथ ही बंद हो जाएँगी,
तो इस चेहरे पर,
हमेशा,
बारह ही बजेंगे.

Tuesday, March 22, 2011

सीमाएं

आज फिर,
जिंदगी मुझसे ,
और मैं उससे,
कुछ मांग रहे हैं...
यकीन और हकीकत की,
...दुनिया से परे,
अपनी ही सीमाएं,
लांघ रहे हैं.

Sunday, March 20, 2011

उम्मीदों में ही गुज़र जाऊंगा

अब भी उम्मीद लगाये बैठा हूँ,
उन पहचानी सी सड़कों पर,
कोई हाथ हिलाएगा,
मैं रुक जाऊंगा .....
नादान हूँ मैं ....
इतना भी नहीं समझता,
वक़्त की बेरहम करवट है;
कब तक उम्मीदों में जी पाउँगा,
एक दिन सड़क भी,
पहचानने से इनकार कर देगी,
तब उम्मीदों में ही....
गुज़र जाऊंगा.

Thursday, March 17, 2011

दस्तक

ऐसे भटकी रही हमारी ख़ामोशी,
जैसे मुर्दा करवट कहीं बदलता हो,
सहर भी आई खोयी खोयी बेगानी सी,
जैसे कोई रात का सूरज ढलता हो,

रही दिलासा देती मुझको आवाजें,
सन्नाटों में जैसे आहट सुनता हो,
जैसे दिल के जंग लगे दरवाज़ों पर,
सुनी सुनी सी कोई दस्तक देता हो

Monday, March 7, 2011

वक़्त कुछ बहका है ऐसे

कल ही था कि जब छिपाकर, फेंक देते थे हम दातुन,
नीम क़ी कड़वी तबीयत, अब दवाई हो गयी है;
कल ही था जब जेठ क़ी, दुपहरी में हम गुल खिलाते,
गर्मियों क़ी दोपहर, अब बेईमानी हो गयी है;
आमों क़ी वे अम्बियाँ, थे हम कल जिनको चुराते,
बिकती हैं बाज़ार में वो, मेहरबानी हो गयीं हैं;
और ईखों की बदौलत, राब थे हम कल बनाते,
ताज़े गुड़ की भेलियाँ अब इक कहानी हो गयीं हैं.

वक़्त कुछ बदला है ऐसे,
जैसे फ़िल्मी गीतों में अब, नृत्य के अंदाज़ बदले;

कल तक लिखे जिन खतों में, पढ़ते थे हम चेहरों को,
आज टेलेफ़ोन सी ही, सूरत उनकी हो गयी है;
खेतों मैदानों में कल तक जो पसीना थी बहाती,
तकनिकी हठ्खेलियों में, वो जवानी खो गयी है;
झुर्रियां बेशक थी कल भी, कुछ चुनिन्दा चेहरों पर,
आज देखो बचपने में, नस्ल बूढ़ी हो गयी है;
भीड़ से कल तक थी बचती, लाज जो अपने घरों की,
जिंदगी की कश्मकश में, भीड़ में ही खो गयी है;

वक़्त कुछ सरका है ऐसे,
जैसे सागर तीर पैरों के तले से रेत सरके;

वह छटाएं, वो घटाएं, इन्द्रधनुषी वो फिजायें,
पीली सरसों के चमन में, पूर्व की बहकी हवाएं;
दीयों के फैले उजाले, रंग फागुन के हमारे,
स्नेहरस से जो भरे थे, रूप रिश्तों के वे सारे;
सीरतें अपनी ये सारी, होठों की मुस्कां हमारी,
जीवन में होए कमी पर फिर भी खुशियों की सवारी:
प्रीत की पायल की छमछम, माँ के हाथों के निवाले;
समय चाहे जितना बदले, आओ हम इनको बचा लें;

वक़्त कुछ बहका है ऐसे,
जैसे मय के आसरे में होश क़ी आवाज़ बहके;




Friday, March 4, 2011

a translation

I thought of brooming the stars,
Picking the Moon and letting it rest against the wall of the sky,
To make space for love.
Also, I wanted to rake the trees, level the mountains,
...Soak the oceans and mop the rivers,
To make space for love.
On second thoughts,
I let them be,
To camouflage
You and me.
By- Manji Kaur Handa
My Translation
सोचता था कि सितारों, पर ज़मीं को साफ़ करके,
और चंदा को टिकाकर, मैं गगन के आसरे से,
कुछ चमन खाली बनाऊं, प्रेम कि अभिव्यक्ति खातिर.

चाहता था खोद डालूं , वृक्ष के भूतल किनारे,
कर दूँ समतल इस धरा के, मस्त से परबत ये सारे,
सोख कर सारा समंदर, और नदियों की रवानी,
कुछ धरा खाली सजाऊं, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.

किन्तु चंदा और तारे, वृक्ष औ पर्वत हमारे,
सारी नदियाँ सागर सारे, ये दिशायें ये किनारे,
घोल लेते हैं हमें, हैं प्रेम की अभिव्यक्ति सारे.

ये नहीं तो क्या गगन है, ये नहीं तो क्या चमन है,
प्रेम की तो ढाल हैं ये, प्रेम का इनसे सृजन है,
आओ इनको हम बचाएँ, प्रेम की अभिव्यक्ति खातिर.

Wednesday, March 2, 2011

कल का भरोसा ही क्या

जब तमाम उम्र की पीड़ा,
सिकुड़ कर
हमसाया सी बन जाती है,
जब पारिवारिक वेदनाएं,
विपरीत घरेलू माहौल में
दोस्ती पर भारी पड़ जाती है,
तो कुछ भी करने से डरता हूँ,
और गुमसुम बैठा रहता हूँ.

तुम्हे किस तरह से समझा पाउँगा,
जब तुम नहीं थे,
जीवन कहाँ थमा था,
अब तुम हो,
तो जीवन कहाँ थमा है,
किसी दिन मैं भी चला जाऊंगा,
कई मुद्दतों के,
खाली इंतज़ार के बाद,
तुम मिले हो,
इतनी पीड़ा अकेले,
कैसे सह पाउँगा,
और तुमसे ही नाराज़ हो गया,
तो कल का भरोसा ही क्या,
आज ही,
मर जाऊंगा.

Tuesday, March 1, 2011

कितने अरमान गूंजते थे जुगनुओं से रास्तों में

वक़्त की अठखेलियों से फिर जनाज़े हाय निकले;
एक पिंजरे में कुरेदा तो अनोखे भाव निकले;
कितने अरमान गूंजते थे जुगनुओं से रास्तों में;
सुर्ख थे नींदों में सारे जब जगा तो स्याह निकले.

जब जलज की पंखुड़ी पर अश्रु थामे तुम खड़े थे;
दुःख तो थोड़े थे हमारे किन्तु तुम कितने बड़े थे;
नीर था चारों तरफ फिर नाव क्यों चलती नहीं थी;
हम किनारे पर डुबे थे तुम तो दरिया पार निकले.

सोचता हूँ इस भयावह चित्र में अंकित कहाँ हूँ;
इस अनिश्चित दौर के उपवास में सिंचित कहाँ हूँ;
कर रहा था कोशिशें रिश्ते सजाकर रख सकूँ मैं;
मुट्ठियों से छिटके मोती हाथ में बस तार निकले.