Monday, March 7, 2011

वक़्त कुछ बहका है ऐसे

कल ही था कि जब छिपाकर, फेंक देते थे हम दातुन,
नीम क़ी कड़वी तबीयत, अब दवाई हो गयी है;
कल ही था जब जेठ क़ी, दुपहरी में हम गुल खिलाते,
गर्मियों क़ी दोपहर, अब बेईमानी हो गयी है;
आमों क़ी वे अम्बियाँ, थे हम कल जिनको चुराते,
बिकती हैं बाज़ार में वो, मेहरबानी हो गयीं हैं;
और ईखों की बदौलत, राब थे हम कल बनाते,
ताज़े गुड़ की भेलियाँ अब इक कहानी हो गयीं हैं.

वक़्त कुछ बदला है ऐसे,
जैसे फ़िल्मी गीतों में अब, नृत्य के अंदाज़ बदले;

कल तक लिखे जिन खतों में, पढ़ते थे हम चेहरों को,
आज टेलेफ़ोन सी ही, सूरत उनकी हो गयी है;
खेतों मैदानों में कल तक जो पसीना थी बहाती,
तकनिकी हठ्खेलियों में, वो जवानी खो गयी है;
झुर्रियां बेशक थी कल भी, कुछ चुनिन्दा चेहरों पर,
आज देखो बचपने में, नस्ल बूढ़ी हो गयी है;
भीड़ से कल तक थी बचती, लाज जो अपने घरों की,
जिंदगी की कश्मकश में, भीड़ में ही खो गयी है;

वक़्त कुछ सरका है ऐसे,
जैसे सागर तीर पैरों के तले से रेत सरके;

वह छटाएं, वो घटाएं, इन्द्रधनुषी वो फिजायें,
पीली सरसों के चमन में, पूर्व की बहकी हवाएं;
दीयों के फैले उजाले, रंग फागुन के हमारे,
स्नेहरस से जो भरे थे, रूप रिश्तों के वे सारे;
सीरतें अपनी ये सारी, होठों की मुस्कां हमारी,
जीवन में होए कमी पर फिर भी खुशियों की सवारी:
प्रीत की पायल की छमछम, माँ के हाथों के निवाले;
समय चाहे जितना बदले, आओ हम इनको बचा लें;

वक़्त कुछ बहका है ऐसे,
जैसे मय के आसरे में होश क़ी आवाज़ बहके;




No comments:

Post a Comment