Tuesday, March 1, 2011

कितने अरमान गूंजते थे जुगनुओं से रास्तों में

वक़्त की अठखेलियों से फिर जनाज़े हाय निकले;
एक पिंजरे में कुरेदा तो अनोखे भाव निकले;
कितने अरमान गूंजते थे जुगनुओं से रास्तों में;
सुर्ख थे नींदों में सारे जब जगा तो स्याह निकले.

जब जलज की पंखुड़ी पर अश्रु थामे तुम खड़े थे;
दुःख तो थोड़े थे हमारे किन्तु तुम कितने बड़े थे;
नीर था चारों तरफ फिर नाव क्यों चलती नहीं थी;
हम किनारे पर डुबे थे तुम तो दरिया पार निकले.

सोचता हूँ इस भयावह चित्र में अंकित कहाँ हूँ;
इस अनिश्चित दौर के उपवास में सिंचित कहाँ हूँ;
कर रहा था कोशिशें रिश्ते सजाकर रख सकूँ मैं;
मुट्ठियों से छिटके मोती हाथ में बस तार निकले.

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