Saturday, March 26, 2011

चेहरे पर बारह ही बजेंगे

वो कहती रही,
जिंदादिल नहीं हो क्या,
हमेशा मुहं लटकाए रहते हो,
चेहरे पर बारह बजाये रहते हो,
क्या खुश रहना भूल गए हो,
मुर्दों पर कविता लिखते लिखते,
खुद जिंदा रहना भूल गए हो ?

विस्मृत हूँ मैं,
पगली है वो,
कैसे समझाउं,
बड़की है वो,
जिंदादिली तो दिल में होती है,
चेहरे के भाव सब कुछ बयां नहीं करते,
और महज़ बालों की सफेदी से,
दिल बूढ़े नहीं हुआ करते

समझाना चाहा,
तो आफत हो गयी,
एक पगली पहले से ही थी,
एक और मिल गयी,
लगा एक खुबसूरत सी मज़ार पर,
कोई रेशमी चादर चढ़ गयी,
अब देखो मुझे,
मुहं तो अब लटक गया है,
और तमाम कोशिशों के बावजूद,
चेहरे पर वाकई,
बारह का घंटा,
बज गया है.

ऐसे में यदि,
मुझे छोड़ कर,
चले जाओगे,
पागलपन की ये बेमिसाल मिसालें,
जीवन में कहाँ पाओगे,
और कुछ हमारा भी ख्याल करो,
आज तो हमपर,
जिंदादिल ही हँसते हैं,
कल मुर्दे भी हंसेगे,
और जब घड़ी की दोनों सुइयां,
साथ में,
एक साथ ही बंद हो जाएँगी,
तो इस चेहरे पर,
हमेशा,
बारह ही बजेंगे.

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