Thursday, March 17, 2011

दस्तक

ऐसे भटकी रही हमारी ख़ामोशी,
जैसे मुर्दा करवट कहीं बदलता हो,
सहर भी आई खोयी खोयी बेगानी सी,
जैसे कोई रात का सूरज ढलता हो,

रही दिलासा देती मुझको आवाजें,
सन्नाटों में जैसे आहट सुनता हो,
जैसे दिल के जंग लगे दरवाज़ों पर,
सुनी सुनी सी कोई दस्तक देता हो

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