Thursday, September 30, 2021



खपरैले उस कच्चे घर के,
प्रेम सरीखे प्रांगन में,
मटमैले से दो दो चूल्हे,
सजे हुए हैं आँगन में ;

आँख खुले देखा है हमने,
जीवन की परिपाटी से,  
रोज सवेरे अम्मा पोतें ,
चूल्हे चिकनी माटी से;

फिर लाएं गोबर के उपले,
डंठल अरहर राठी की,
चूल्हे के आगे रख दें फिर,
पीढा आम के काठी की;

कर स्नान करें फिर अम्मा,
आगी बारन की तैयारी,
एक बटुई पर राख लगाएं,
दाल चढ़ायें भर के सारी;

ढोंका नून और साबुत हल्दी,
मर्चा, धनिया कर के इकट्ठा, 
डाल बूँद पानी की थोड़ी,
पीसें अम्मा फिर सिल बट्टा;

डाल मसाला और खटाई,
चूल्हे की फिर आग बढ़ायें,
बार बार फुँकनी से फूंकें,
एकई बटुई भात चढायें;

बड़ी बड़ी और मोटी मोटी,
रोटी पोएँ फिर हथपोइया,
जैसे सिंकती जाए रोटी,
कहें हमें कि खाइ ल्या भइया;

दाल भात और मोटी रोटी,
बड़की कांसे की थाली,
कुछ अचार और थोड़ा सिरका,
भूख बढ़ा दे मतवाली;
 
न कोई पकवान न मीठा,
न भाजी ही कैसी भी,
देखी ही जीवन में हमने,
एक रसोई ऐसी भी।   

Thursday, September 16, 2021


बचपन में पढ़ी थी कहानी,
दी नाइटेंगल एंड दी रोज़,
बुलबुल और गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

काँटे को चुभाती रही,
ह्रदय के अंदर, और अंदर,
बुलबुल रात भर,
और रिसता रहा रक्त,
लाल, और लाल होता गया गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

लड़के ने जब दिया गुलाब,
लड़की ने कर दिया इंकार,
मर गई बुलबुल,
कुचला गया गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

किसको मिली ख़ुशी,
किसको हुई वेदना,
किसने लुटाई जान,
कैसा त्याग, कैसा मान,
किसका हो सम्मान ?

याद आती है,
वो पंक्तियाँ धूमिल के मोचीराम से,
" सच कहता हूँ बाबूजी,
यदि ज़िंदा रहने के पीछे,
सही तर्क नहीं है,
तो राम नामी बेचकर,
या रंडियों की दलाली कर के,
रोज़ी कमाने में,
कोई फ़र्क़ नहीं है " 
पर ये सही तर्क क्या है,
कौन तय करे,
जिसको जो लगे ठीक,
वह उसकी जय करे,

हमारे अपने मापदंड हैं,
और है अपनी प्रवृत्ति,
जीवन के मर्म की,
अपनी समझ, अपनी संस्कृति,
त्याग, खुदगर्ज़ी, दयाभाव,
सब का है अपना स्वभाव;
तुम भी सही, हम भी सही,
अपने अपने तर्क हैं,
हर प्रवृत्ति की कीमत है,
जो करती हमें सतर्क हैं,
हर भाव में छिपा कर्म है,
और बेशर्मी में भी शर्म है ;

 

Monday, September 13, 2021

 

पहले आशाओं की हवेली ,
फिर आशंकाओं की पहेली,
कभी तो चमक आँखों में,
कभी पसीने की हथेली;

वो हाथ पैरों का फूल जाना,
वो बाकी सब कुछ भूल जाना,
कितना कुछ सोचना चुपचाप,
कभी कम या उच्च रक्तचाप;

डॉक्टर और बुजुर्गों की,
बातों का विरोधाभास,
वो कोख में होती हलचल,
और ममता का आभास ;

फिर पीड़ा  .... असहनीय,
वो स्थिति .... दयनीय, 
ससुराल की आशा, बाबुल का बंधन,
पल भर शांति, फिर परिचित सा क्रंदन,
 
कोख स्त्री के स्वयं का विस्तार होता है,
और जनना उसका नया अवतार होता है,

Thursday, September 9, 2021

 another perspective...

क्या तुम दहेज़ देना चाहती हो ?
नहीं  .... बिलकुल नहीं।
तो कैसा दूल्हा चाहिए तुम्हे ?
वह जो रख सके संभाल के,
जिम्मेदार हो, अच्छी नौकरी हो,
पैसे वाला हो, दिल का निराला हो,
जैसा मैं चाहती हूँ , वैसा परिवार हो ,
हट्टा  कट्टा, दिखने में शानदार हो। 

क्या तुम दहेज़ लेना चाहते हो ?
नहीं  .... बिलकुल नहीं।
तो कैसी दुल्हन चाहिए तुम्हे ?
वह जो गोरी हो, सुन्दर हो, सुशील हो,
पढ़ी लिखी हो, संस्कारी हो,
अच्छी कुक भी हो, नौकरी वाली हो,
जो मॉडर्न भी हो, और हो किस्मती भी,
अपने पुश्तैनी जायदाद का कानूनन हक़ ले सके,
हो इतनी हिम्मती भी। 

मैं भी सोचता हूँ, दहेज़ क्या है,
क्या वो जो माँगा जाता है, या दे दिया जाता है,
या कुछ और भी जो चाहते हैं हम,
क्या सब लड़के कमाऊ हैं या सब सब लड़कियाँ सुन्दर,
क्या मिल पाती है हर लड़की को उसका हिस्सा,
उसकी पुश्तैनी जायदाद से,
क्या दहेज़ करता है समझौता या भरपाई,
जहाँ नहीं हो पाती घरों में गाढ़ी कमाई,
मुझे सच में नहीं पता दहेज़ प्रथा है या सोच,
आपको पता हो तो बताना !

neeraj tripathi.....thinking aloud.

Wednesday, September 8, 2021


वो दिल थोड़ा बिस्मिल,
वो कुछ बातें अधूरी,
वो लम्हे जिन्हे बताना था मुश्क़िल, 
पर क़ैद करना था ज़रूरी,
वो शब्दों का अल्हड़पन,
वो टूटी फूटी शायरी,
अब भी जिंदा हैं वहां,
जहाँ है हमारी डायरी;

 

 

It was one thing that I liked most,
for here I was the guest, and was the host,
my memories stored in it like some treasure,
and which I often visited at my leisure, 
in which scribbled words lay scattered,
a few flashes of joy, some dreams shattered,
some moments of truth, some lies of time,
but whatever they were, they were all mine,
I cared and handled it with utmost care,
as best as I could, I carried it everywhere,
then came a time when my friend announced,
she was leaving the country, I felt trounced,
she spoke to me with her desires masked,
how would you like me to remember you, she asked,
I knew it wasn't a request, nor an inquiry,
taking it out quietly, I handed her my diary,
nothing is more valuable to me, I said,
she gleefully accepted it as the bonding thread,
it has been a little more than thirty years now,
I sometimes miss the friend, the diary and how,
Not sure where they are but I have made amends,
for after the diary I have only written for friends;


 वो जाड़ों के दिन,
दुआरे का अलाव,
उसकी कोख में सिंकते,
आलू और शकरक॔द,
कहाॅ था कोई अलगाव ;

वो बारीक कटी प्याज,
चार बूंद कच्चा कड़वा तेल,
पीसे हुए नमक से मेल,
हधपोई चूनी की रोटी,
काश, अमीरी में भी होती ;

वो भूॅजी लाई चना का चबैना,
एक ढोंका गुड़,
एक लोटा ताजा पानी,
और जीने की मनमानी,
अब किसने जानी;

वो नेवते का कोंहड़ा,
वो दोने में माठा,
मुट्ठी भर शक्कर,
सोहारी से चाटा,
वो स्वाद नहीं जाता;

वो रात की सहेजी रोटी,
वो बासी भात,
वो सिरका आम का,
सब क्या जानें,
गरीबी का ज़ायका ।