Wednesday, September 8, 2021

 वो जाड़ों के दिन,
दुआरे का अलाव,
उसकी कोख में सिंकते,
आलू और शकरक॔द,
कहाॅ था कोई अलगाव ;

वो बारीक कटी प्याज,
चार बूंद कच्चा कड़वा तेल,
पीसे हुए नमक से मेल,
हधपोई चूनी की रोटी,
काश, अमीरी में भी होती ;

वो भूॅजी लाई चना का चबैना,
एक ढोंका गुड़,
एक लोटा ताजा पानी,
और जीने की मनमानी,
अब किसने जानी;

वो नेवते का कोंहड़ा,
वो दोने में माठा,
मुट्ठी भर शक्कर,
सोहारी से चाटा,
वो स्वाद नहीं जाता;

वो रात की सहेजी रोटी,
वो बासी भात,
वो सिरका आम का,
सब क्या जानें,
गरीबी का ज़ायका ।

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