खपरैले उस कच्चे घर के,
प्रेम सरीखे प्रांगन में,
मटमैले से दो दो चूल्हे,
सजे हुए हैं आँगन में ;
आँख खुले देखा है हमने,
जीवन की परिपाटी से,
रोज सवेरे अम्मा पोतें ,
चूल्हे चिकनी माटी से;
फिर लाएं गोबर के उपले,
डंठल अरहर राठी की,
चूल्हे के आगे रख दें फिर,
पीढा आम के काठी की;
कर स्नान करें फिर अम्मा,
आगी बारन की तैयारी,
एक बटुई पर राख लगाएं,
दाल चढ़ायें भर के सारी;
ढोंका नून और साबुत हल्दी,
मर्चा, धनिया कर के इकट्ठा,
डाल बूँद पानी की थोड़ी,
पीसें अम्मा फिर सिल बट्टा;
डाल मसाला और खटाई,
चूल्हे की फिर आग बढ़ायें,
बार बार फुँकनी से फूंकें,
एकई बटुई भात चढायें;
बड़ी बड़ी और मोटी मोटी,
रोटी पोएँ फिर हथपोइया,
जैसे सिंकती जाए रोटी,
कहें हमें कि खाइ ल्या भइया;
दाल भात और मोटी रोटी,
बड़की कांसे की थाली,
कुछ अचार और थोड़ा सिरका,
भूख बढ़ा दे मतवाली;
न कोई पकवान न मीठा,
न भाजी ही कैसी भी,
देखी ही जीवन में हमने,
एक रसोई ऐसी भी।
एक रसोई ऐसी भी।
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