Thursday, September 16, 2021


बचपन में पढ़ी थी कहानी,
दी नाइटेंगल एंड दी रोज़,
बुलबुल और गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

काँटे को चुभाती रही,
ह्रदय के अंदर, और अंदर,
बुलबुल रात भर,
और रिसता रहा रक्त,
लाल, और लाल होता गया गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

लड़के ने जब दिया गुलाब,
लड़की ने कर दिया इंकार,
मर गई बुलबुल,
कुचला गया गुलाब,
क्या याद है जनाब ?

किसको मिली ख़ुशी,
किसको हुई वेदना,
किसने लुटाई जान,
कैसा त्याग, कैसा मान,
किसका हो सम्मान ?

याद आती है,
वो पंक्तियाँ धूमिल के मोचीराम से,
" सच कहता हूँ बाबूजी,
यदि ज़िंदा रहने के पीछे,
सही तर्क नहीं है,
तो राम नामी बेचकर,
या रंडियों की दलाली कर के,
रोज़ी कमाने में,
कोई फ़र्क़ नहीं है " 
पर ये सही तर्क क्या है,
कौन तय करे,
जिसको जो लगे ठीक,
वह उसकी जय करे,

हमारे अपने मापदंड हैं,
और है अपनी प्रवृत्ति,
जीवन के मर्म की,
अपनी समझ, अपनी संस्कृति,
त्याग, खुदगर्ज़ी, दयाभाव,
सब का है अपना स्वभाव;
तुम भी सही, हम भी सही,
अपने अपने तर्क हैं,
हर प्रवृत्ति की कीमत है,
जो करती हमें सतर्क हैं,
हर भाव में छिपा कर्म है,
और बेशर्मी में भी शर्म है ;

 

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