Wednesday, August 18, 2021

उम्मीदों के झूले,
लटके हैं पेड़ की शाखों से,
पर हौसलों की पेंग,
झांकती है, सलाखों से,

इस अफरा तफरी के बीच,
जो मन हो जाता पावन,
तब एक ही हो जाते,
तुम्हारा शिव, हमारा सावन,

पर अपना अपना शिव,
तय करती है जनता,
महज़ गरल पीने से कोई,
शिव नहीं बनता।   

Friday, August 6, 2021

 ये दिन आएंगे, जाएंगे,
कुछ लाएंगे, ले जाएंगे,
कुछ कर जायेंगे घाव ज़रा,
कुछ मन को ज़रा लुभाएंगे; 

कुछ रस जीवन में भर देंगे,
कुछ चटक रंग को कर देंगे,
कुछ लाएंगे खारा सागर,
कुछ नमक इकट्ठा कर देंगे;

यदि दूरी इनसे हम कर लें,
या बाहों में इनको भर लें,
ये आये हैं तो जाएंगे,
हम कितना भी इनको धर लें;

जब समय गुज़र ही जाता है,
जो लाया था, ले जाता है,
फिर भी क्यूँ रेत खिसकती है,
फिर क्या है जो रह जाता है; 

कहने को तो वह पहर गया,
वह राह गयी, वह शहर गया,
यूँ गयी सुबह औ शामें पर,
 इक लम्हा आँख में ठहर गया;

खपरैली छत का कहर गया,
निर्धनता का वह जहर गया ,
माँ के घुटनों का दर्द मगर,
जो आया तो फिर ठहर गया;

जो पाया था वह महर गया,
रंग भरा माट का अहर गया,
पर जाने से जो रिक्त हुआ,
वह रिक्त ह्रदय में ठहर गया;