उम्मीदों के झूले,
लटके हैं पेड़ की शाखों से,
पर हौसलों की पेंग,
झांकती है, सलाखों से,
इस अफरा तफरी के बीच,
जो मन हो जाता पावन,
तब एक ही हो जाते,
तुम्हारा शिव, हमारा सावन,
पर अपना अपना शिव,
तय करती है जनता,
महज़ गरल पीने से कोई,
शिव नहीं बनता।
ये दिन आएंगे, जाएंगे,
कुछ लाएंगे, ले जाएंगे,
कुछ कर जायेंगे घाव ज़रा,
कुछ मन को ज़रा लुभाएंगे;