Wednesday, August 18, 2021

उम्मीदों के झूले,
लटके हैं पेड़ की शाखों से,
पर हौसलों की पेंग,
झांकती है, सलाखों से,

इस अफरा तफरी के बीच,
जो मन हो जाता पावन,
तब एक ही हो जाते,
तुम्हारा शिव, हमारा सावन,

पर अपना अपना शिव,
तय करती है जनता,
महज़ गरल पीने से कोई,
शिव नहीं बनता।   

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