Friday, August 6, 2021

 ये दिन आएंगे, जाएंगे,
कुछ लाएंगे, ले जाएंगे,
कुछ कर जायेंगे घाव ज़रा,
कुछ मन को ज़रा लुभाएंगे; 

कुछ रस जीवन में भर देंगे,
कुछ चटक रंग को कर देंगे,
कुछ लाएंगे खारा सागर,
कुछ नमक इकट्ठा कर देंगे;

यदि दूरी इनसे हम कर लें,
या बाहों में इनको भर लें,
ये आये हैं तो जाएंगे,
हम कितना भी इनको धर लें;

जब समय गुज़र ही जाता है,
जो लाया था, ले जाता है,
फिर भी क्यूँ रेत खिसकती है,
फिर क्या है जो रह जाता है; 

कहने को तो वह पहर गया,
वह राह गयी, वह शहर गया,
यूँ गयी सुबह औ शामें पर,
 इक लम्हा आँख में ठहर गया;

खपरैली छत का कहर गया,
निर्धनता का वह जहर गया ,
माँ के घुटनों का दर्द मगर,
जो आया तो फिर ठहर गया;

जो पाया था वह महर गया,
रंग भरा माट का अहर गया,
पर जाने से जो रिक्त हुआ,
वह रिक्त ह्रदय में ठहर गया;
 

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