Monday, June 28, 2021
Wednesday, June 23, 2021
Friday, June 18, 2021
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें,
सफ़ेद धागे, झुर्रियों में सिमटे लम्हे,
लटकी चादर देखती रही धागों को गिरते,
उन धागों को इकट्ठा करने से फिर सुबह नहीं बनी,
चादर यहाँ थी भी और नहीं भी।
Friday, June 11, 2021
Tuesday, June 8, 2021
Friday, June 4, 2021
सोने और जागने के बीच की स्थिति है यह, न ही स्वप्न में रह पा रहे हैं और न ही हकीकत में। न ही ये थमा है और न ही चल रहा है। किसी को उम्मीद है कि किसी तरह भी कोई क्षति होने से से बच जाएगी, तो किसी को उम्मीद है कि जो क्षति हो गयी वह बिसर जायेगी। अब सड़कों पर वह सूनापन नहीं रह गया पर अंदर का सूनापन जाते जाते ही जाएगा। उसपर आशंका का कोलाहल है जो सूनेपन की सफेदी में भी करिया दिखाई देता है। ये ढलान जानती है कि पहाड़ों से टूटकर गिरा पत्थर कहीं तलहटी में पहुँच कर ही विश्राम पायेगा। फिर वही पत्थर अपनी चोटों पर मलहम लगते हुए ऊपर देखेगा, जहाँ से वह गिरा है। पहाड़ हल्का हो गया है ज़रा सा पर अब भी बिलकुल स्थिर है। और पत्थर हैं ऊपर जिन्हे संभालना होगा। स्वप्न और हकीकत का बीच यह जागने सोने का खेल है जिसमे हौसला ही खिलाड़ी है और संयम है रणनीति । अब यह आभास है कि समय जब ऊँघता है तो खर्राटों की आवाज़ नहीं आती।
Thursday, June 3, 2021
Tuesday, June 1, 2021