Monday, June 28, 2021

रोज़मर्रा की,
आपी धापी में,
चाहतों से रहा,
हमेशा तनाव,
पर चाहतों की हद्द,
कौन तय करे,
कौन करे,
बेहतरी का चुनाव,
पर फिर भी,
​तुम्हारी हथेलियों से होकर,
गुज़रना चाहती है,
हमारी नाव।


 

Wednesday, June 23, 2021

उमड़ घुमड़ कर घिर आये बदरा,
सुधि में नैनन बह जाए कजरा,
विरह की बिजुरी अब तब चमके,
रैन भई है पिशाची रे,

कस अँखियन में सपन अनाना,
राज रंक भये एक समाना,
प्रिय वियोग में सब मिथ्या है,
सुख निद्रा ही साची रे,

मंद समीरण तन मन डोले,
अरुण हया के घूँघट खोले,
पृथक उषा का आशय जग में, 
मोर पिया मोहे प्राची रे,

 

Friday, June 18, 2021

कुछ कुछ खद्दर जैसी थी,
मखमली नहीं थी,
पर इस चादर से हम,
खूब काम लेते थे,
गर्मियों में बिछा लेते थे,
जाड़ों में ओढ़ लेते थे,
और कितनी भी आये आंधी पानी,
इसी चादर से ढक लेते थे।

इस अनोखी चादर की
कई परतें थीं,
और छिपी हुई थी हर परत में,
कितनी ही दास्तान,
कुछ से हम थोड़ा वाक़िफ़ थे,
कुछ से थे बिलकुल अनजान,
दफ्तर में बाबू की झिड़की,
घर में कम होता खाने का सामान,
कॉपी किताब के खर्चे,
बारिश में रिसता हुआ मकान,
रिश्तेदारों की खींचातानी,
और बिगड़ता सम्भलता सम्मान,
सब कैद हैं इस चादर की परतों में।

पर कभी चादर ने ये ज़ाहिर नहीं किया,
बार बार धुली, थापी से पीटी गयी,
निचोड़ी गयी, धूप में सेंकी गयी,
इसका रंग हल्का होता चला गया,
पर ये सिकुड़ी नहीं,
जिम्मेदारी से सदा व्याप्त रही,
और कितने ही बड़े हो गए हमारे पाँव,
हमेशा ये चादर पर्याप्त रही।

फिर धीरे धीरे चादर बूढी हो गयी,
और उधड़ कर,
फैलने लगे उसके धागे ज़मीन पर,
उस पुरानी चादर की बूढी कतरने,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें,
सफ़ेद धागे, झुर्रियों में सिमटे लम्हे,
लटकी चादर देखती रही धागों को गिरते,
उन धागों को इकट्ठा करने से फिर सुबह नहीं बनी,

एक चादर  …… पीड़ा और उम्मीद से लड़ती,
टूटे धागों का समूह  बन जाती है,
कितनी ही सोच, इच्छा, जिज्ञासा,
कितना कुछ……………  अधूरा,
फिर ख़ामोशी  .... शान्ति,
​चादर यहाँ थी भी और नहीं भी।

 

Friday, June 11, 2021

कुछ मिथ्य भी, कर गठजोड़ गए
कुछ सारा भाव निचोड़ गए,
दो किस्म की हमको चाह रही,
कुछ लूट गए, कुछ जोड़ गए।

छत से लटके थे सब तारे,
पर भू को थे सारे प्यारे,
खुद के गुरुत्व की आंधी में, 
कुछ टूट गए, कुछ तोड़ गए।

वो कशिश नवेली बातों में,
और राह कठिन, सौगातों में,
सीधा चलने की साज़िश में,
कुछ रूठ गए, कुछ मोड़ गए।

पर बात नियति ने कब मानी,
अँजुरि में रोपा था पानी,
चाहा था जिनको हद तक वे,
​कुछ छूट गए, कुछ छोड़ गए। ​

 

Tuesday, June 8, 2021

ये रात नहीं आती, ये दिन भी नहीं सोता,
बिरहा की वीरानी में रस्ता भी नहीं रोता,
आँखों का वो बादल भी यूँ सांझ न भिगोता
अमावस भी नहीं आती, चंदा भी नहीं खोता,

तू दोस्त ही रहता मेरा,  ऐसे न ज़ुदा होता,
यदि बस में मेरे होता, यदि मैं भी खुदा होता।

 

तब न कभी आपस में गिला करते थे,
खुशबू और हवा रोज़ मिला करते थे,
क्या हुआ कि काँटे भी नहीं बचे उस पर,
जिस हथेली पर गुलाब खिला करते थे।

 

Friday, June 4, 2021

 सोने और जागने के बीच की स्थिति है यह, न ही स्वप्न में रह पा रहे हैं और न ही हकीकत में। न ही ये थमा है और न ही चल रहा है। किसी को उम्मीद है कि किसी तरह भी कोई क्षति होने से से बच जाएगी, तो किसी को उम्मीद है कि जो क्षति हो गयी वह बिसर जायेगी। अब सड़कों पर वह सूनापन नहीं रह गया पर अंदर का सूनापन जाते जाते ही जाएगा।  उसपर आशंका का कोलाहल है जो सूनेपन की सफेदी में भी करिया दिखाई देता है। ये ढलान जानती है कि पहाड़ों से टूटकर गिरा पत्थर कहीं तलहटी में पहुँच कर ही विश्राम पायेगा। फिर वही पत्थर अपनी चोटों पर मलहम लगते हुए ऊपर देखेगा, जहाँ से वह गिरा है। पहाड़ हल्का हो गया है ज़रा सा पर अब भी बिलकुल स्थिर है।  और पत्थर हैं ऊपर जिन्हे संभालना होगा। स्वप्न और हकीकत का बीच यह जागने सोने का खेल है जिसमे हौसला ही खिलाड़ी है और संयम है रणनीति । अब यह आभास है कि समय जब ऊँघता है तो खर्राटों की आवाज़ नहीं आती।

Thursday, June 3, 2021

एक दिवस जब जीवन पथ पर,
भूख लगी थी हमको कस कर,
अभी दूर था हमको जाना,
भोजन का था नहीं ठिकाना,
पर किस्मत की अपनी आभा,
छोटा सा इक दिखा था ढाबा,
हम बिलकुल भी न सकुचाये,
गाड़ी रोकी कदम बढ़ाये,
जर्जर सी दीवार खड़ी थी,
जिस पर कालिख खूब चढ़ी थी,
उसपर सटी बांस की सीढ़ी,
जिसने देखी कितनी पीढ़ी,
क्रम में चार पड़ी थी खटिया,
सब पर एक बिछी थी पटिया,
हम भी इक खटिया पर बैठे,
मार पालथी थोड़ा ऐंठे,
पटिया को दे थोड़ा धक्का,
काला चश्मा उस पर रक्खा,
लगे देखने हम मोबाइल,
होठों पर आई स्माइल,
तभी एक आवाज़ ने रोका,
आँख उठा कर हमने देखा,
भाग्य बना था जिसका चालक,
सम्मुख था अबोध सा बालक,
आँखें बुझी हुई तारा सी,
उमर रही होगी बारह सी,
बाहें जैसे इक टहनी थी,
नेकर घुटनों तक पहनी थी,
काँधे पर मैला सा गमछा,
देख रहा था थोड़ा तिरछा,
बाल भी उसका बढ़ा हुआ था,
लिए गिलास जग खड़ा हुआ था,
भर गिलास में पानी आधा,
और जरा उचका कर कांधा ,
पूछा, साहेब क्या खाएंगे,
जो कहियेगा ले आएंगे,
हमने उसको ध्यान से देखा,
उसके माथे नहीं थी रेखा,
होती किस्मत ज्यादा, कम भी,
संभल गए थे अब तक हम भी,
जान भूख से जाने को है,
पूछा क्या क्या खाने को है,
भिंडी, पालक, आलू गोभी,
पीली दाल, छास भी होगी,
लेकिन राज़ की बात बताऊँ,
इच्छा हो तो बियर पिलाऊँ,
अपलक हमने उसको देखा,
माथे पर आ गयी थी रेखा,
हमने कहा नहीं, रहने दो,
रोटी दाल छास बहने दो,
अभी दूर जाना है हमको,
गाड़ी बहुत चलाना हमको,
जैसे तैसे खाना खाया,
रुपिया अस्सी नगद चुकाया,
सोचा मिले है क्या किसको भी,
रुपिया बीस दिया उसको भी,
रस्ते अपने बैठ सिकुड़ के,
एक बार देखा फिर मुड़ के,
गमछा टांग, पकड़ कर सीढ़ी
फूंक रहा था बालक बीड़ी,
एक दिवस जब जीवन पथ पर,
भूख लगी थी हमको कस कर ;

 

Tuesday, June 1, 2021

जब कि एक ही बगीचा,
दोनों को बराबर सींचा,
रखा दोनों के लिए,
एक ही भाव,
फिर क्यूँ हैं,
ये दो प्रभाव,
कैसे सीखा एक ने मुस्काना,
और दूसरे ने चुभ जाना;

बेशक दोनों को दिया,
समान प्यार, समान दुलार,
समान भाव,
पर दोनों के हैं,
पृथक स्वभाव,
जितना है ज़रूरी मुस्काना,
उतना ही ज़रूरी है चुभ जाना,
इस जगत में,
हर प्रभाव की ज़रूरत है,
और वास्तव में ये,
एक दूसरे का पूरक है;
स्वीकार करो कि हम सब,
एक ही प्रकृति की देन हैं,
​बेशक रखो,
सब के लिए समान भाव,
पर स्वीकार करो,
विभिन्न स्वभाव।