कुछ मिथ्य भी, कर गठजोड़ गए
कुछ सारा भाव निचोड़ गए,
दो किस्म की हमको चाह रही,
कुछ लूट गए, कुछ जोड़ गए।
छत से लटके थे सब तारे,
पर भू को थे सारे प्यारे,
खुद के गुरुत्व की आंधी में,
कुछ टूट गए, कुछ तोड़ गए।
वो कशिश नवेली बातों में,
और राह कठिन, सौगातों में,
सीधा चलने की साज़िश में,
कुछ रूठ गए, कुछ मोड़ गए।
पर बात नियति ने कब मानी,
अँजुरि में रोपा था पानी,
चाहा था जिनको हद तक वे,
कुछ छूट गए, कुछ छोड़ गए।
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