उमड़ घुमड़ कर घिर आये बदरा,
सुधि में नैनन बह जाए कजरा,
विरह की बिजुरी अब तब चमके,
रैन भई है पिशाची रे,
कस अँखियन में सपन अनाना,
राज रंक भये एक समाना,
प्रिय वियोग में सब मिथ्या है,
सुख निद्रा ही साची रे,
मंद समीरण तन मन डोले,
अरुण हया के घूँघट खोले,
पृथक उषा का आशय जग में,
मोर पिया मोहे प्राची रे,
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