कुछ कुछ खद्दर जैसी थी,
मखमली नहीं थी,
पर इस चादर से हम,
खूब काम लेते थे,
गर्मियों में बिछा लेते थे,
जाड़ों में ओढ़ लेते थे,
और कितनी भी आये आंधी पानी,
इसी चादर से ढक लेते थे।
इस अनोखी चादर की
कई परतें थीं,
और छिपी हुई थी हर परत में,
कितनी ही दास्तान,
कुछ से हम थोड़ा वाक़िफ़ थे,
कुछ से थे बिलकुल अनजान,
दफ्तर में बाबू की झिड़की,
घर में कम होता खाने का सामान,
कॉपी किताब के खर्चे,
बारिश में रिसता हुआ मकान,
रिश्तेदारों की खींचातानी,
और बिगड़ता सम्भलता सम्मान,
सब कैद हैं इस चादर की परतों में।
पर कभी चादर ने ये ज़ाहिर नहीं किया,
बार बार धुली, थापी से पीटी गयी,
निचोड़ी गयी, धूप में सेंकी गयी,
इसका रंग हल्का होता चला गया,
पर ये सिकुड़ी नहीं,
जिम्मेदारी से सदा व्याप्त रही,
और कितने ही बड़े हो गए हमारे पाँव,
हमेशा ये चादर पर्याप्त रही।
फिर धीरे धीरे चादर बूढी हो गयी,
और उधड़ कर,
फैलने लगे उसके धागे ज़मीन पर,
उस पुरानी चादर की बूढी कतरने,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें,
सफ़ेद धागे, झुर्रियों में सिमटे लम्हे,
लटकी चादर देखती रही धागों को गिरते,
उन धागों को इकट्ठा करने से फिर सुबह नहीं बनी,
कुछ रातें, कुछ दुपहरियाँ, कुछ सुबहें,
सफ़ेद धागे, झुर्रियों में सिमटे लम्हे,
लटकी चादर देखती रही धागों को गिरते,
उन धागों को इकट्ठा करने से फिर सुबह नहीं बनी,
एक चादर …… पीड़ा और उम्मीद से लड़ती,
टूटे धागों का समूह बन जाती है,
कितनी ही सोच, इच्छा, जिज्ञासा,
कितना कुछ…………… अधूरा,
फिर ख़ामोशी .... शान्ति,
चादर यहाँ थी भी और नहीं भी।
चादर यहाँ थी भी और नहीं भी।
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