Saturday, May 23, 2020

वज़न हो शायरी, पर दर्द तोला जा नहीं सकता,
तुम्हारी महफ़िलों में भी वह बोला जा नहीं सकता,
किसी भी ज़िद्द के आगे झुक तो हम जाते हैं लेकिन,
ये कुछ राज़ ऐसा है कि खोला जा नहीं सकता।

किसी दिन बैठ तीरे देख लेंगे सूर्य का ढलना,
और लहर की गोद में फिर चाँद का पलना,
तब समझ जाना जो अब तक होंठ न बोले,
हाथ थामे रेत में तब दूर तक चलना।

कुछ राज़ हैं ऐसे जो अक्सर दिल में हैं सोते,
जब मिले हम सा कोई चुपचाप हैं रोते,
शोर कितना भी मचायें महफ़िलों में हम,
दिल के सबसे बोल मीठे मूक हैं होते।




Thursday, May 21, 2020

जैसे जैसे कोरोना के केस देश में बढ़ते जा रहे हैं, वैसे वैसे ही जीवन कुछ कुछ आम होता जा रहा है। अब हम उतनी सतर्कता भी नहीं बरत रहे हैं  जितनी शुरूआती दिनों में बरत रहे थे। अब अर्थव्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गयी है , शायद कहीं ज्यादा। जेबों में कुछ पैसे रहेंगे तो शायद लड़ सकें किसी भी बीमारी से। पर किनकी जेबों में ? खैर ! मुहँ ढंकने से ज़िंदगी तो नहीं ढंकी जा सकती।

घर बैठे ऑफिस का काम करते करते यह एहसास हुआ की वक़्त अब भी सीमित है, पहले की तरह।  घर के काम की अहमियत अब  भी नहीं है, पहले की तरह।  छत की टंकी का पानी अब भी ख़त्म हो जाता है, पहले की तरह।  और कुल मिलकर हम अब भी वहीँ हैं, जहाँ पहले थे, पहले की तरह।

पर कुछ तो बदला है, किसी के लिए तो बदला है।  उनके लिए बदला है जिनके घर के लोग पीड़ित हुए या पीड़ित के इलाज़ में सहयोग कर रहे हैं। उनके लिए बदला है जिनके पैरों में चलते चलते छाले पड़ गए।  उनके लिए बदला है जिनका भविष्य अपने भूतकाल में चला गया है।  कितनी ही कहानियाँ आगे सुनाने के लिए तैयार हो गयी हैं , हो रही हैं। अधिकतर दुखदायी हैं , न तो कोई राजकुमार घोड़े पर बैठ कर किसी को बचाने आता है, न ही कोई मेंढक किसी राजकुमारी के छूने से राजकुमार बनता है।  अलबत्ता लकड़हाड़े की कुल्हाड़ी ज़रूर खो जाती है..... और फिर मिलती नहीं।

बाहर लगे पौधे में रोज एक नया कड़ी पत्ता बढ़ जाता है ; हल्का और मुलायम , पर अपनी निश्चित महक लिए हुए।  ये किसी विश्वास की आशा है....या शायद आशा का विश्वास।

Monday, May 18, 2020



जिसके श्रम पर नाज़ करता नभ ये सारा था,
वो जो बस टूटे हुए तारों से हारा था,
आत्मनिर्भर यूँ बना वो काली सड़कों का,
रात में जिसका सदा जुगनू सहारा था।

​अब दिशाभ्रम है, तिमिर का जागता भय है,
और पैरों में कहाँ वो पहली सी लय  है,​
​फंस चुकी है अब भंवर में इस कदर ​नौका,
​किनारे पर पहुँचने के लिए अब डूबना तय है। ​
चाँद नींदों में कहीं ढलता तो होगा,
हाथ जो खाली रहे खलता तो होगा,
चाँदनी को जिस तरह सब ने दुलारा है,
सूर्य भी संताप में जलता तो होगा।

Sunday, May 17, 2020

एक दिन घर से निकल हम,
राह लम्बी पर चले थे,
थे ये पग छोटे हमारे,
हम भी दीवाने बड़े थे।

पर जो हम निकले अकेले,
सोच कर चलना अकेले,
राह  में मिलते रहेंगे,
इल्म न था इतने मेले।

रास्तों की दूरियों में,
कितने ही जन पास आये,
कितनो ने फिर राह बदली,
कितने ही चल साथ आये।

फूल कितनों ने बिखेरे,
कितनों ने काँटे बिछाये,
कितनों ने रोशन किया पथ,
कितनों ने मलहम लगाये।

जो सफ़र तय कर चुके हैं,
उसमें कुछ निश्चित नहीं था,
जो सफ़र अब बच गया है,
उसमें कुछ निश्चित नहीं है।

है ज़िन्दगी लेकिन बताती,
राह सब की तय है निश्चित,
दूरियाँ हों कम या ज्यादा,
इक सफ़र सब का सुनिश्चित।

एक दिन रुक जाएंगे हम,
नींद में सूत जाएंगे हम,
चाहे जितना तब पुकारो,
फिर नहीं चल पाएंगे हम।

तब न कुछ फ़रियाद रखना,
कुछ न दिल में बात रखना,
जो सफ़र थे संग चले हम,
उस सफर को याद रखना।

Friday, May 15, 2020

आज दूध फट गया ; सुबह की शुरुआत ने ही बता दिया की आज पनीर जैसा कुछ खायेंगे ; हम आसानी से स्वयं को ढाँढस दे देते हैं कि हर छोटी दुर्घटना में एक सुखद घटना छिपी है। यह आम इंसानी प्रवृत्ति है.....कुछ वैसे ही जैसे गर्मी में धुल भरी आंधी चलने पर घर की पुनः सफाई करनी पड़ती है पर हमें संतोष रहता है कि मौसम तो थोड़ा ठंडा हो गया।  आप सोचोगे कि दूध फटने की छोटी सी घटना को इतना तूल क्यों, पर यकीन मानिये, इस लॉकडाउन में दो लीटर दूध आसानी से नहीं आता।  आसानी से तो बस इन दिनों पसीना आता है और कोरोना के समाचार देखते देखते शरीर के अंदर तक सूख जाता है। कभी ध्यान से सोचा न था कि ये खारापन जो बाहर निकल रहा है, ये हमारे अंदर भरा हुआ है।

तीसरे लॉकडाउन की अवधि समाप्त होने को है ; चौथा एक सस्पेंस है जिसे मोदी जी ने पिछले प्रवचन में इसलिए नहीं बताया क्यूंकि उन्हें भी मालूम नहीं था। रोज़ वित्त मंत्री शाम चार बजे आर्थिक पैकेज को समझाती हैं और किसी को समझ नहीं आता ; खुद उन्हें भी नहीं।  किसी भी घोषणा का सबसे अहम् पहलु उसका क्रियान्वयन होता है और यहीं पहुंचकर हमारे राशन कार्ड ऑउटडेटेड हो जाते हैं।  मज़दूरों का पलायन इन सभी घोषणाओं से अनभिज्ञ रहता है ; सड़क की लम्बाई और परिवार की चौड़ाई नापना ही इस समय उनका उद्देश्य है और ज़रूरत भी।   किसी दिन अगर पेट भरा होगा तो पेट ढंकने की भी सोचेंगे ।

कितनी ही आशंकायें घिर आयी हैं जिनका जवाब महज़ अपनी अपनी समझ है ; क्या जीवन फिर वैसा हो पायेगा जैसा था? पर वैसा क्यों चाहते हो ; याद नहीं उस समय इसी जीवन को कितना कोसा करते थे।  कमी अहमियत का एहसास भी है और विज्ञान का आविष्कार भी। सांस लेने के लिए मास्क लगाना भी है और उतारना भी; समय की माँग जीने की लालसा के साथ एक एग्रीमेंट कर चुकी है।  इंसान एडजस्ट कर रहा है।  कभी फिर से वह प्रकृति पर भारी होगा; इतना आसान नहीं है हमें कोई पाठ पढ़ाना ।

कहीं दूर किसी गांव में एक परिवार दो हज़ार किलोमीटर का सफर कर अपने घर पहुँचता है।  हिम्मत अपनों से लिपट कर फफक कर रो पड़ती है।
दालान की कच्ची दीवार पर कुछ आँसुओं के धब्बे कई सालों तक नहीं सूखेंगें ।

Wednesday, May 13, 2020

एक और गर्म दिन गुजरने की कगार पर है ; अब कुछ नया होता भी है तो नया नहीं लगता।  आज एक कारीगर जिसकी कुछ रकम बकाया थी, अचानक ही आ पहुंचा और अपना चेक लेकर गया।  लॉकडाउन के एकाकीपन में उसे मैं लगभग भूल ही गया था , पर चूँकि वह प्रवासी कारीगर नहीं था, इसलिए आ पहुंचा। कैसे हम देना भूल जाते हैं और लेना हमेशा याद रहता है।  पर पैसे की अहमियत इन दिनों वैसी नहीं रही जैसे पहले हुआ करती थी। पहले जो यकीन बचत में था अब वही बचत कम यकीन करने में है।  वक़्त की पगडण्डियों में अगर हम भीड़ में न चलें तो धूल हमारे पीछे ही उड़ती है।  थोड़ी सी आस है जो अभी संक्रमित नहीं हुई है ; इसी को रोज सैनिटाइज़ करते रहता हूँ। मोबाइल पर मैसेज बताता है कि मेरे अकाउंट से साढ़े छह हज़ार रुपये कम  हो गए।  गज़ब की फुर्ती दिखाई बैंक की कारीगिरी ने।  खैर दिन निकल ही गया ; ऊपर के कमरे का पंखा आज भी आराम न कर पाया।

कॉलोनी में किसी का जन्म दिन था और हर घर में उसने केक और वेजिटेबल पफ पहुंचा दिए।  कहने लगा की बाहर से आर्डर पर बनवाया है। मैंने भी ऐसी कृतज्ञ आँखों से उसे देखा जिससे उस की उम्र कम से कम एक लॉकडाउन जितनी तो बढ़ ही गयी होगी। अब जीभ का क्या है, चखती है तभी तो बोलती भी है। शाम की चाय तुलसी के सानिध्य में अदरक और थोड़ी सी काली मिर्च के साथ जब खौलती है तो और काली दिखती है ; पर दूध के आलिंगन से उसका भी रंग निखर जाता है। हमारे रंग साथ ढूँढ़ते हैं; उन रंगों का जो हमें हल्का या गाढ़ा कर सकें। यह सब इतना सरल है कि रोज़मर्रा में दिखाई ही नहीं देता।  सरलता सदा से अपनी मौजूदगी में अदृश्य रही है ; उन्हें कोई नहीं जानता जो खुद को दिखा नहीं पाते हैं। आज दिन भर एक  ए सी बंद होता और चलता रहा।  कृत्रिम ठंडक प्राकृतिक ग्रीष्मा से खिलवाड़ करती रही। अचानक मन में ख्याल आया की किसी समय यदि पारा हद से ज्यादा बढ़ जाए तो ये ए सी भी काम करना बंद कर देगा।  यूँ ही कोरोना न आया होगा। याद आया कि अभी हाल में पढ़ा था कहीं ; शायद हम इंसान इस धरती के वायरस हैं और कोरोना है वैक्सीन।

Tuesday, May 12, 2020

इस बार आयी गर्मी में पसीना नहीं रुकता , कितनी ही जगह आंधी और बारिश हुई पर मज़ाल है कि यहाँ सूर्य के समक्ष कोई टिक पाए।  आज कुछ बादल ज़रूर नज़र आये..... छिटके हुए जैसे मज़दूर पलायन कर रहे हों इन दिनों।  अचानक ही गायब भी हो गए , या फिर शायद कोई रेल की पटरी हो वहाँ भी ; आखिर मज़दूर तो कहीं भी मज़दूर ही रहता है।

कुछ रात पहले चाँद बहुत उज्जवल दिखाई दे रहा है, शायद करीब आ गया था  कुछ धरती से ; अब उसे भी सोशल डिस्टैन्सिंग के मायने पता लग गए।  ये समय जो करा दे कम है। मेरे मोबाइल फोन की बैटरी भीष्म पितामह बन चुकी है , मृत्यु शैय्या पर अक्सर उसे बिजली की ऊर्जा देकर जीवित रखना पड़ रहा है।  अंतिम साँसे तकलीफ भी हो सकती हैं और राहत भी ; ये इस पर निर्भर करता है की इन अंतिम घड़ियों में पहुँचने के लिए किस हद तक की पीड़ा से गुज़रना पड़ा है।  दूर कहीं मालगाड़ी की आवाज़ पटरियों को जीवित रखती है।

मोदी जी आये और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा कर चले गए ; कह गए की लोकल को ब्रांडेड बनाना है।  कह गए कि आपदा भी एक अवसर है खासकर के तब जब आपदा का जीवन काल निर्धारित नहीं हो।   मुझे लगता है कि  यह अवसर कम है और मज़बूरी अधिक ; पर सीमित विकल्पों के मध्य संयम कब तक अपनी ही परीक्षा लेता रहेगा। बीस लाख करोड़ रुपयों से एक देश की आत्मनिर्भरता की नींव रखी जायेगी; मुझे इसका मतलब नहीं पता। वाणिज्य और अर्थशास्त्र से मेरा नाता मेरे बैंक के खाते की पासबुक तक ही सीमित है..... और उसकी भी स्थिति कुछ कुछ मेरे मोबाइल फ़ोन की बैटरी जैसी ही है।

कहीं से दो पैग मिल जाते तो नींद को आत्मनिर्भर बना पाता। 

Monday, May 11, 2020

कभी इतना शोर नहीं था कि  कानों को सुनाई ही न पड़े; कभी ऐसा समां भी न था कि आँखों को दिखाई ही न पड़े। दहलीज़ की चौखट पर हथेलियों के निशान उभर आये हैं। किसी का भी तो इंतज़ार नहीं है, फिर वहां क्यूँ बैठे रहे जहाँ पायदान रहा करता था। वह सब जो इतना आसान था कि कभी उस बारे में सोचते भी न थे, अब अपना मुहं बाये खड़ा रहता है। आशंकाओं का दौर धीरे धीरे कोई हादसा बनकर पेशानी पर दिखाई देने लगा है।
सब चुप रहते हैं ; अनमने मन से अनमने से काम अपनी गति से अंजाम पाते रहते हैं। जिन बातों को करने में एक उम्र काम पड़ती थी वो कुछ दिनों में ही हमें खाली कर गयी। ये वक़्त की करवट है या इंसानी गुरुर की पर अब हर दिन का सूरज कुछ खिसियाया हुआ ही निकलता है। 
कहते हैं अब इसी के साथ जीना है, कहते हैं कि बहुत दिनों तक हमारे मुहँ ढके रहेंगे। कहते हैं कि बहुत दिनों तक ख़ामोशी की सांसें किसी कोलाहल का मोहताज़ रहेंगी।

Saturday, May 9, 2020

हमारे स्वप्न को मज़बूर ये भरपूर करता है,
इकठ्ठा हो गया था जो अहं वो चूर करता है,
कभी सोचा न था परदों से होगा इतना याराना,
ये कैसा रोग है नज़दीकियों को दूर करता है,

Thursday, May 7, 2020

जब परिन्दा पंख से ही बेखुदी कर ले,
या शमा भी शाम को ही ख़ुदकुशी कर ले,
डूब जाए यदि अमावस से ही पहले चाँद भी,
और ग़म अपने ही दिल से बुज़दिली कर ले,

तब किसी से मिल भी लें तो रूबरू क्या है,
तब ह्रदय में रौशनी की ज़ुस्तज़ू क्या है,
हार हमने मान ली जब खुद की ही खुद से,
तब आरज़ू क्या है, तब गुफ्तगू क्या है

पर अगर हम हौसलों से काम लेंगे पंख का,
और मन में प्रज्जवलित करते रहेंगे ये शमा,
फिर उजाले रात में नहीं चाँद का मोहताज़ होंगे,
दिल्लगी तारों से करके गम करेंगे हम ज़ुदा,

तब किसी से मिल भी लें तो रूबरू सुख है,
तब ह्रदय की रौशनी की ज़ुस्तज़ू सुख है,
हार जो हमने न मानी जब विषम में भी,
तब आरज़ू सुख है, तब गुफ्तगू सुख है

Wednesday, May 6, 2020

याद है उन दिनों जब शहतूत फलते थे,
गिलहरियों को पहले मिल जाते थे,
और हम हाथ मलते थे।
फिर हमने तरीका सीखा,
संतुष्टि को अँजुरियों में रोपना सीखा,
हमने सीखा कि,
गिलहरियों का भी अपना मान है,
और हमारी संतुष्टि में ही,
हमारा सम्मान है,
पर तब हम छोटे थे।

बड़े होते होते सीख लिया हमने,
खुद भी कमाना,
थोड़ा सा खर्च करना,
और बाकी को,
हया की ओट में छिपाना,
सोचा था खर्च करेंगे इसे,
जब आएगा अपना ज़माना,
सच छिपाया, झूठ छिपाया,
छिपाई कुछ बातें खरी,
पता था, नींद में है गिलहरी।

इतना छिपाया की भूल गए,
भूल गए कि कहाँ क्या रख दिया,
कहाँ रख दिया वो जाम जो तब न पिया,
वो आधा लड़कपन जो तब न जिया,
कहाँ रख दी सच की वो सादी कहानी,
कहाँ रख दी झूठी पर थोड़ी जवानी,
कहाँ रख दी कमाई जो की उम्र भर,
कहाँ रख दी शामें, कहाँ रख दी सहर ।

ये जो हम रख कर खर्च करना भूल गए,
ये वो लम्हे थे जो कमाए, पर फ़िज़ूल गए,
एक दिन नींद खुल जायेगी गिलहरी की,
और ढूंढ लेगी वो सारे अखरोट,
छिपा रखें थे जिन्हे,
इसकी ओट....उसकी ओट ।

Sunday, May 3, 2020


तब तक ही तो असल कांति है,
जब तक चारों ओर शांति है,
यदि विरोध ये बादल कर दें,
तब तुम सजल बरस जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ आंधी,
मेरा बवण्डर बन जाना। 

मन की गति कितनी अस्थिर है,
इसमें इच्छायें गर्भित हैं,
जब मनचला समय हो जाए,
तुम निर्विवाद संयम हो जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ हावी,
मेरा 'निरंतर' बन जाना।

आज सँजोया कितना कुछ है,
लेकिन ये क्षणभंगुर सुख है,
जब भी नियति ग्रास मुख खोले,
तब कुबेर तुम हो जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ त्यागी ,
मेरा समंदर बन जाना।

जब इंकार दिशाएं कर दें,
या हुंकार हवाएं भर दें,
जब आभास भी संभव न हो,
तब तुम धृव तारा हो जाना
जिस दिन मैं हो जाऊँ बागी,
मेरा दिगन्तर बन जाना।

एक दिवस जब सफर ओढ़ लें,
पैमानों से नज़र मोड़ लें,
जब रस्ता हो जाए कलंदर
साफ़ कमलजल बन जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ जोगी,
मेरा कमण्डल बन जाना। 

Saturday, May 2, 2020

अक्सर जो चलती थीं मंद बयारें,
तुम्हारी दिशा से,
थम सी गयी हैं,
किसी अनदेखे कल से,
डर सी गयी हैं,
​अब उन्हें मत रोको,
बह जाने दो,
जो कुछ रह गया था,
रह जाने दो;​
​कितना कुछ तो चला गया,
पर तुम जुआरी ही रही,
दिशाएँ भी कितनी बदली,
पर हवा कुंवारी ही रही;​
​वक़्त के बाद चल रहा हूँ,
शायद कहर दवाओं का है,
दिशाओं का क्या है,
असर तो हवाओं का है,
मंज़ूर है जो अब भी तुम कह दो वही,
तुम्हारा पूरब हमारा पच्छिम ही सही।

मई की शुरुआत है और दम निकलना चाहता है,
पर पसीना अब भी क्यों हमसे ये कहना चाहता है,
झेल लो कोविड की गर्मी से भरी कुछ दोपहर,
जैसे वो फिर से मेरा सूरज बदलना चाहता है।