जिसके श्रम पर नाज़ करता नभ ये सारा था,
वो जो बस टूटे हुए तारों से हारा था,
आत्मनिर्भर यूँ बना वो काली सड़कों का,
रात में जिसका सदा जुगनू सहारा था।
अब दिशाभ्रम है, तिमिर का जागता भय है,
और पैरों में कहाँ वो पहली सी लय है,
फंस चुकी है अब भंवर में इस कदर नौका,
किनारे पर पहुँचने के लिए अब डूबना तय है।
No comments:
Post a Comment