एक और गर्म दिन गुजरने की कगार पर है ; अब कुछ नया होता भी है तो नया नहीं लगता। आज एक कारीगर जिसकी कुछ रकम बकाया थी, अचानक ही आ पहुंचा और अपना चेक लेकर गया। लॉकडाउन के एकाकीपन में उसे मैं लगभग भूल ही गया था , पर चूँकि वह प्रवासी कारीगर नहीं था, इसलिए आ पहुंचा। कैसे हम देना भूल जाते हैं और लेना हमेशा याद रहता है। पर पैसे की अहमियत इन दिनों वैसी नहीं रही जैसे पहले हुआ करती थी। पहले जो यकीन बचत में था अब वही बचत कम यकीन करने में है। वक़्त की पगडण्डियों में अगर हम भीड़ में न चलें तो धूल हमारे पीछे ही उड़ती है। थोड़ी सी आस है जो अभी संक्रमित नहीं हुई है ; इसी को रोज सैनिटाइज़ करते रहता हूँ। मोबाइल पर मैसेज बताता है कि मेरे अकाउंट से साढ़े छह हज़ार रुपये कम हो गए। गज़ब की फुर्ती दिखाई बैंक की कारीगिरी ने। खैर दिन निकल ही गया ; ऊपर के कमरे का पंखा आज भी आराम न कर पाया।
कॉलोनी में किसी का जन्म दिन था और हर घर में उसने केक और वेजिटेबल पफ पहुंचा दिए। कहने लगा की बाहर से आर्डर पर बनवाया है। मैंने भी ऐसी कृतज्ञ आँखों से उसे देखा जिससे उस की उम्र कम से कम एक लॉकडाउन जितनी तो बढ़ ही गयी होगी। अब जीभ का क्या है, चखती है तभी तो बोलती भी है। शाम की चाय तुलसी के सानिध्य में अदरक और थोड़ी सी काली मिर्च के साथ जब खौलती है तो और काली दिखती है ; पर दूध के आलिंगन से उसका भी रंग निखर जाता है। हमारे रंग साथ ढूँढ़ते हैं; उन रंगों का जो हमें हल्का या गाढ़ा कर सकें। यह सब इतना सरल है कि रोज़मर्रा में दिखाई ही नहीं देता। सरलता सदा से अपनी मौजूदगी में अदृश्य रही है ; उन्हें कोई नहीं जानता जो खुद को दिखा नहीं पाते हैं। आज दिन भर एक ए सी बंद होता और चलता रहा। कृत्रिम ठंडक प्राकृतिक ग्रीष्मा से खिलवाड़ करती रही। अचानक मन में ख्याल आया की किसी समय यदि पारा हद से ज्यादा बढ़ जाए तो ये ए सी भी काम करना बंद कर देगा। यूँ ही कोरोना न आया होगा। याद आया कि अभी हाल में पढ़ा था कहीं ; शायद हम इंसान इस धरती के वायरस हैं और कोरोना है वैक्सीन।
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