वज़न हो शायरी, पर दर्द तोला जा नहीं सकता,
तुम्हारी महफ़िलों में भी वह बोला जा नहीं सकता,
किसी भी ज़िद्द के आगे झुक तो हम जाते हैं लेकिन,
ये कुछ राज़ ऐसा है कि खोला जा नहीं सकता।
किसी दिन बैठ तीरे देख लेंगे सूर्य का ढलना,
और लहर की गोद में फिर चाँद का पलना,
तब समझ जाना जो अब तक होंठ न बोले,
हाथ थामे रेत में तब दूर तक चलना।
कुछ राज़ हैं ऐसे जो अक्सर दिल में हैं सोते,
जब मिले हम सा कोई चुपचाप हैं रोते,
शोर कितना भी मचायें महफ़िलों में हम,
दिल के सबसे बोल मीठे मूक हैं होते।
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