अक्सर जो चलती थीं मंद बयारें,
तुम्हारी दिशा से,
थम सी गयी हैं,
किसी अनदेखे कल से,
डर सी गयी हैं,
अब उन्हें मत रोको,
बह जाने दो,
जो कुछ रह गया था,
रह जाने दो;
कितना कुछ तो चला गया,
पर तुम जुआरी ही रही,
दिशाएँ भी कितनी बदली,
पर हवा कुंवारी ही रही;
वक़्त के बाद चल रहा हूँ,
शायद कहर दवाओं का है,
दिशाओं का क्या है,
असर तो हवाओं का है,
मंज़ूर है जो अब भी तुम कह दो वही,
तुम्हारा पूरब हमारा पच्छिम ही सही।
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