इस बार आयी गर्मी में पसीना नहीं रुकता , कितनी ही जगह आंधी और बारिश हुई पर मज़ाल है कि यहाँ सूर्य के समक्ष कोई टिक पाए। आज कुछ बादल ज़रूर नज़र आये..... छिटके हुए जैसे मज़दूर पलायन कर रहे हों इन दिनों। अचानक ही गायब भी हो गए , या फिर शायद कोई रेल की पटरी हो वहाँ भी ; आखिर मज़दूर तो कहीं भी मज़दूर ही रहता है।
कुछ रात पहले चाँद बहुत उज्जवल दिखाई दे रहा है, शायद करीब आ गया था कुछ धरती से ; अब उसे भी सोशल डिस्टैन्सिंग के मायने पता लग गए। ये समय जो करा दे कम है। मेरे मोबाइल फोन की बैटरी भीष्म पितामह बन चुकी है , मृत्यु शैय्या पर अक्सर उसे बिजली की ऊर्जा देकर जीवित रखना पड़ रहा है। अंतिम साँसे तकलीफ भी हो सकती हैं और राहत भी ; ये इस पर निर्भर करता है की इन अंतिम घड़ियों में पहुँचने के लिए किस हद तक की पीड़ा से गुज़रना पड़ा है। दूर कहीं मालगाड़ी की आवाज़ पटरियों को जीवित रखती है।
मोदी जी आये और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा कर चले गए ; कह गए की लोकल को ब्रांडेड बनाना है। कह गए कि आपदा भी एक अवसर है खासकर के तब जब आपदा का जीवन काल निर्धारित नहीं हो। मुझे लगता है कि यह अवसर कम है और मज़बूरी अधिक ; पर सीमित विकल्पों के मध्य संयम कब तक अपनी ही परीक्षा लेता रहेगा। बीस लाख करोड़ रुपयों से एक देश की आत्मनिर्भरता की नींव रखी जायेगी; मुझे इसका मतलब नहीं पता। वाणिज्य और अर्थशास्त्र से मेरा नाता मेरे बैंक के खाते की पासबुक तक ही सीमित है..... और उसकी भी स्थिति कुछ कुछ मेरे मोबाइल फ़ोन की बैटरी जैसी ही है।
कहीं से दो पैग मिल जाते तो नींद को आत्मनिर्भर बना पाता।
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