तब तक ही तो असल कांति है,
जब तक चारों ओर शांति है,
यदि विरोध ये बादल कर दें,
तब तुम सजल बरस जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ आंधी,
मेरा बवण्डर बन जाना।
मन की गति कितनी अस्थिर है,
इसमें इच्छायें गर्भित हैं,
जब मनचला समय हो जाए,
तुम निर्विवाद संयम हो जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ हावी,
मेरा 'निरंतर' बन जाना।
आज सँजोया कितना कुछ है,
लेकिन ये क्षणभंगुर सुख है,
जब भी नियति ग्रास मुख खोले,
तब कुबेर तुम हो जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ त्यागी ,
मेरा समंदर बन जाना।
जब इंकार दिशाएं कर दें,
या हुंकार हवाएं भर दें,
जब आभास भी संभव न हो,
तब तुम धृव तारा हो जाना
जिस दिन मैं हो जाऊँ बागी,
मेरा दिगन्तर बन जाना।
एक दिवस जब सफर ओढ़ लें,
पैमानों से नज़र मोड़ लें,
जब रस्ता हो जाए कलंदर
साफ़ कमलजल बन जाना,
जिस दिन मैं हो जाऊँ जोगी,
मेरा कमण्डल बन जाना।
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