Wednesday, July 28, 2021

 आमों की टहनियों में,
लटके हुए झूले,
उन घिरी घटाओं में,
बहुत भाये;

बेलपत्र, जौ की बालें,
धतूरा, मदार के फूल,
गाय का कच्चा दूध, 
शिव चढ़ाये;

हर साल कांवड़िये,
कांवड़ में, नंगे पांव,  ​
कितना ही गंगाजल,
कंधे पर लाये;​

सिंकती हुई धरती पर,
रिमझिम फुहारों ने,
हरियाली ठंडक के,
रंग बिछाए;

पर जीवन के सावन,
जो एक बार बीत गए,
अनायास भी,
फिर नहीं आये। 

Tuesday, July 27, 2021

 बात परस्पर सुने कहेंगे,
सुख लहरों में साथ बहेंगे,
सोचा था ऐसा ही होगा,
सोचा था सब साथ रहेंगे,

प्रेम किरण मतवाली होगी,
बेशक झोली खाली होगी,
कभी रात जो लम्बी आये,
विरह वेदना साथ सहेंगे,

देख नियति का यह सच कैसा,
कब सोचा था होगा ऐसा, 
झोली हरदम भरी रहेगी,
फिर भी खाली हाथ रहेंगे ; 

Wednesday, July 7, 2021

मृग से नयनों की आशा में,
या मरू की जटिल पिपासा में,
बन जाएं हम भी नट कोई,
फिर कह दें बात तमाशा में,

धुंधला बन किसी कुहासा में,
या वट की घनी दिलासा में,
या उन बातों का रस निचोड़,
हम दे दें किसी बताशा में,

भावों में,अभिलाषा में,
या बिन बोले जिज्ञासा में,
कैसे उनको चरितार्थ करें,
जो अर्थ छिप गए भाषा में;

 

Monday, July 5, 2021

यूँ स्थिर से नहीं ठहरते और तनिक सा हम बढ़ लेते,
जिसे देखते हैं घाटी से, वही शिखर हम भी चढ़ लेते,
प्रेम झलकता अल्फ़ाज़ों में, नाम भी होता, और हमारी,
कागज़ में तस्वीर झलकती,जो हम थोड़ा लिख पढ़ लेते;

अपने इस सूने प्रांगड़ में एक चहक हम भी गढ़ लेते,
इंतज़ार की इस मुद्रा को प्रेम रत्न से हम मढ़ लेते,
नहीं विचरते आवारा से प्रणय सरीखी इन गलियों में,
कहीं दिलों में भी बस जाते,जो हम थोड़ा लिख पढ़ लेते;