Monday, July 5, 2021

यूँ स्थिर से नहीं ठहरते और तनिक सा हम बढ़ लेते,
जिसे देखते हैं घाटी से, वही शिखर हम भी चढ़ लेते,
प्रेम झलकता अल्फ़ाज़ों में, नाम भी होता, और हमारी,
कागज़ में तस्वीर झलकती,जो हम थोड़ा लिख पढ़ लेते;

अपने इस सूने प्रांगड़ में एक चहक हम भी गढ़ लेते,
इंतज़ार की इस मुद्रा को प्रेम रत्न से हम मढ़ लेते,
नहीं विचरते आवारा से प्रणय सरीखी इन गलियों में,
कहीं दिलों में भी बस जाते,जो हम थोड़ा लिख पढ़ लेते;

 

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