आमों की टहनियों में,
लटके हुए झूले,
उन घिरी घटाओं में,
बहुत भाये;
बेलपत्र, जौ की बालें,
धतूरा, मदार के फूल,
गाय का कच्चा दूध,
शिव चढ़ाये;
हर साल कांवड़िये,
कांवड़ में, नंगे पांव,
कितना ही गंगाजल,
कंधे पर लाये;
सिंकती हुई धरती पर,
रिमझिम फुहारों ने,
हरियाली ठंडक के,
रंग बिछाए;
पर जीवन के सावन,
जो एक बार बीत गए,
अनायास भी,
फिर नहीं आये।
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