मृग से नयनों की आशा में,
या मरू की जटिल पिपासा में,
बन जाएं हम भी नट कोई,
फिर कह दें बात तमाशा में,
धुंधला बन किसी कुहासा में,
या वट की घनी दिलासा में,
या उन बातों का रस निचोड़,
हम दे दें किसी बताशा में,
भावों में,अभिलाषा में,
या बिन बोले जिज्ञासा में,
कैसे उनको चरितार्थ करें,
जो अर्थ छिप गए भाषा में;
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