Thursday, June 14, 2018

तुम मेरा उद्गम नहीं थे,
पर राह में जाने क्यों लगा,
शायद संगम हो तुम से,
मेरी आस, आस ही रही,
मैं फिर भी बहती रही अकेली,
धीमी रफ़्तार से,
इस उम्मीद में,
कि शायद तुम सागर बन जाओ,
पर  ...... क्या करती,
मै नदी थी,
मुझे कहीं तो मिलना था।

Monday, June 11, 2018

मेरे अपने हैं

तुम चले गए दूसरे देश पर तुम्हे याद रहा यहाँ का गर्म मौसम, यहाँ की धूल मिट्टी, यहाँ की बजबजाती बरसाती नालियां, सड़कों पर बेपरवाह हार्न बजाती गाड़ियाँ। याद रहा तुम्हे एक चरमराती व्यवस्था , दफ्तरों के चक्कर, घूसखोरों की मांगें, ट्रेन का शोर, प्लेटफार्म की आवाज़ें।

भूल गए तुम कि इसी व्यवस्था में बनवाया था तुमने पासपोर्ट, एकाध नकली दस्तावेज़, ली थी ट्रेनिंग किसी इंटरव्यू की, कि इतना ही सच बोलना है और इतना झूठ, और पहुँच गए थे एम्बेसी वीसा लेने। कितना गर्व हुआ था जब वीसा लग गया था।
आज भी तुम्हें वह सब याद है, तभी वहां हजारों मील दूर से भी तुम उलाहना देते हो, शिकायतें हैं भारतीय प्रशाशन से, यहाँ के मौसम से, यहाँ के लोगों से, उनकी अनपढ़ बातों से, उनके सलीके से, कुछ भी करने के तरीके से।  सब याद है तुम्हें।
पर तुम कुछ भूले भी। गर्म धरती पर बारिश की सोंधी महक भूल गए, बादलों के बीच पेड़ों पर झूले भूल गए, ढाबों की लस्सी भूल गए, कुल्हर के चाय की चुस्की भूल गए। भूल गए तुम माँ की हाथों के निवाले, भूल गए बहन की हाथों की मेहंदी, भूल गए भाई से जिद्द करना, भूल गए कैसे मिलजुल कर रहना।

सरलता भूल गए, तरलता भूल गए, जो तिल तिल कर बाप ने जोड़ी थी, वो अभूतपूर्व सफलता भूल गए। शायद याद हो तुम्हें वो जेठ की दुपहरी और अंजुरियों से पीना बाल्टी भर पानी। जहां पर अंतिम बार हथेलियों से पानी पिया था, वहां मिट्टी अब भी गीली है।
 अब वहाँ का सब अच्छा है, यहाँ सब असभ्य हैं ; अब तुम अलग हो, तुम्हारा देश भी अलग।  समझाने से कहते हो कि तुम क्या जानो ; शहर क्या होता है, लोग क्या होते हैं, व्यवस्था क्या होती है, शासन क्या होता है , तुम तो कभी रहे ही नहीं । पता नहीं सच क्या है ; जब हम आज़ाद हुए थे तब क्या जानते थे की गुलामी के माने बदल जायेंगे। तुम खीज कर कह देते हो मुझे की अंगूर खट्टे हैं।
मैं अब भी मुस्कुराता हूँ, चाहे कितने भी खट्टे हों, मेरे अपने हैं।