Saturday, January 25, 2020


ये जो तुम्हारी आँखें,
दिन भर लैपटॉप के आगे,
सज़ा पाती हैं न,
ये हर रात अपने लिए,
इंसाफ़ मांगती हैं;

सोचना चाहिए तुम्हें,
कुछ इनके भी बारे में,
क्यूंकि रोज़ फाँसी चढ़ती ये आँखें,
छीन लेंगी किसी दिन,
तुम्हारा सब कुछ ;

कहाँ से ला पाओगे फिर,
दोस्त, परिवार, रिश्तेदार,
प्रेम, समर्पण, वात्सल्य,
कहाँ ढूंढ़ पाओगे भूली हुई सुध को,
या खोये हुए खुद को;

फिर बैठना दिन रात,
लेकर इस नौकरी की सौगात,
देखना सारी दुनिया लैपटॉप में,
और करना मिन्नतें उससे,
कि लौटा दे तुम्हारी आँखें।