खाद दिया, पानी दिया,
प्यार दिया ;
पर दूब नहीं आयी,
फिर पता लगा,
इस हिस्से में ओट है,
सूरज नहीं आता,
पर मैं तो आदमी था,
सूरज कहाँ से लाता।
वनस्पति इसके,
कि चाँद समझ लेता उस हिस्से को ,
मैं खोजता रहा सूरज,
भरी दुपहरी;
सब के हिस्से था,
थोड़ा थोड़ा सूरज,
बस नहीं था,
उस छोटे से बंजर के लिए।
आज भी खोज रहा हूँ,
वह थोड़ी सी ऊष्मा,
जो कर दे हरा,
मेरे उस अंश को,
कहते हैं ज़मीन घूमती है,
धूरी पर;
शायद वो हिस्सा भी आये,
सूरज की पकड़ में।
शायद ये विज्ञान के विरुद्ध है,
पर दिल,
नहीं मानता कोई ज्ञान,
बस बाट जोहता है सूरज की,
और यूँ भी,
ये तो बंजर ज़मीनों का नसीब है,
नाउम्मीदी भी रही,
और इंतज़ार भी ......